तंत्रिका तंत्र और उसके भाग
तंत्रिका तंत्र शरीर का तेज़ संदेश-जाल है। इसके दो मुख्य भाग हैं।
- केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (CNS): मस्तिष्क और मेरुरज्जु। मस्तिष्क निर्णय लेता है। मेरुरज्जु संदेश ले जाता-लाता है और सरल प्रतिवर्त (reflex) चलाता है।
- परिधीय तंत्रिका तंत्र (PNS): बाकी सारी नसें। इसकी दो शाखाएँ हैं।
कायिक और स्वायत्त
- कायिक (somatic): मर्ज़ी से चलने वाली मांसपेशियाँ चलाता है और इंद्रियों (स्पर्श, दृष्टि) की ख़बर CNS तक लाता है।
- स्वायत्त (autonomic): अंगों को अपने-आप चलाता है, बिना सोचे (दिल, आँतें, साँस की दर)। इसके दो उलटे काम करने वाले हिस्से हैं:
- अनुकंपी (sympathetic): शरीर को काम के लिए तेज़ करता है।
- परानुकंपी (parasympathetic): शरीर को शांत करता है ("आराम करो, पचाओ")।
न्यूरॉन और सिनैप्टिक संचरण
न्यूरॉन तंत्रिका कोशिका है। इसके तीन प्रकार हैं:
- संवेदी न्यूरॉन: इंद्रियों से CNS तक संदेश।
- रिले (संयोजक) न्यूरॉन: CNS के अंदर न्यूरॉनों को जोड़ते हैं।
- प्रेरक न्यूरॉन: CNS से मांसपेशियों और ग्रंथियों तक।
न्यूरॉन के भाग: केंद्रक वाला कोशिका-काय, संकेत लेने वाले द्रुमिका (dendrites), संकेत ले जाने वाला तंत्रिकाक्ष (axon), उस पर चर्बी की परत माइलिन आवरण जो गति बढ़ाती है, और सिरे पर टर्मिनल बटन।
सिनैप्स पार करना
- विद्युत संकेत (क्रिया विभव) axon के सिरे तक पहुँचता है।
- छोटी थैलियाँ (वेसिकल) एक रसायन, न्यूरोट्रांसमीटर, दरार में छोड़ती हैं।
- रसायन दरार पार करके अगले न्यूरॉन के ग्राही (receptors) से जुड़ता है।
- फिर वह तोड़ दिया जाता है या वापस सोख लिया जाता है (reuptake)।
संचरण सिर्फ़ एक दिशा में होता है, क्योंकि वेसिकल केवल भेजने वाली ओर और ग्राही केवल पाने वाली ओर होते हैं।
उत्तेजना और निरोध
उत्तेजक न्यूरोट्रांसमीटर (जैसे एड्रेनालिन) अगले न्यूरॉन के संकेत भेजने की संभावना बढ़ाते हैं। निरोधी (जैसे सेरोटोनिन, GABA) घटाते हैं। अगला न्यूरॉन सबको जोड़ता है (summation) और कुल उत्तेजना काफ़ी हो तभी संकेत भेजता है।
अंतःस्रावी तंत्र और लड़ो या भागो
अंतःस्रावी तंत्र उन ग्रंथियों का समूह है जो खून में हॉर्मोन छोड़ती हैं। हॉर्मोन नस के संकेत से धीमे हैं, पर असर ज़्यादा देर रहता है।
- पीयूष ग्रंथि (pituitary): "मास्टर ग्रंथि", हाइपोथैलेमस के नियंत्रण में, बाकी ग्रंथियों को निर्देश देती है।
- अधिवृक्क (adrenal) ग्रंथियाँ: एड्रेनालिन (और लंबे तनाव में कॉर्टिसोल)।
- थायरॉइड: थायरॉक्सिन ऊर्जा-उपयोग की गति तय करता है। पीनियल ग्रंथि: नींद के लिए मेलाटोनिन।
लड़ो या भागो, क्रम से
- मस्तिष्क (एमिग्डाला) ख़तरा पहचानकर हाइपोथैलेमस को बताता है।
- हाइपोथैलेमस अनुकंपी शाखा चालू करता है।
- अधिवृक्क मज्जा खून में एड्रेनालिन छोड़ती है।
- धड़कन और साँस तेज़, पुतलियाँ चौड़ी, पाचन धीमा, ऊर्जा के लिए शर्करा निकलती है।
- ख़तरा टलने पर परानुकंपी शाखा शरीर को शांत करती है।
कुछ शोधकर्ता तीसरी प्रतिक्रिया भी बताते हैं: "देखभाल और मेल" (tend and befriend), यानी दूसरों की रक्षा और सहारा ढूँढना, जो महिलाओं में ज़्यादा दिखी। कई लोग जम (freeze) भी जाते हैं।
स्थानीयकरण, पार्श्वीकरण और स्प्लिट-ब्रेन शोध
स्थानीयकरण (localisation) यानी कुछ काम मस्तिष्क के ख़ास क्षेत्र करते हैं।
- प्रेरक क्षेत्र (अग्र पालि): गति की योजना और शुरुआत।
- कायसंवेदी क्षेत्र (पार्श्विका पालि): स्पर्श, गर्मी, दर्द।
- दृष्टि क्षेत्र (पश्चकपाल पालि, पीछे) और श्रवण क्षेत्र (शंख पालि)।
- ब्रोका क्षेत्र (बायाँ अग्र भाग): बोलना। क्षति से धीमी, अटकती बोली।
- वर्निके क्षेत्र (बायाँ शंख भाग): भाषा समझना। क्षति से धाराप्रवाह पर अर्थहीन बोली।
सब कुछ स्थानीय नहीं है: स्मृति जैसे जटिल काम पूरे मस्तिष्क में फैले माने जाते हैं (समग्र मत)।
पार्श्वीकरण
मस्तिष्क के दो आधे भाग (अर्धगोल) हैं। पार्श्वीकरण यानी कुछ काम मुख्य रूप से एक भाग करता है। भाषा प्रायः बाएँ में; चेहरे पहचानना और स्थान-बोध दाएँ में ज़्यादा। बायाँ भाग शरीर का दायाँ हिस्सा चलाता है, और उल्टा भी।
स्प्लिट-ब्रेन शोध
गंभीर मिर्गी वाले कुछ मरीज़ों का कॉर्पस कैलोसम (दोनों भागों का पुल) काटा गया। शोधकर्ताओं ने चित्र केवल एक दृष्टि-क्षेत्र में दिखाया। दाएँ भाग को दिखाया शब्द वे बोल नहीं पाए (बोली बाएँ में है), पर बायाँ हाथ छूकर सही वस्तु उठा लेता था। यह पार्श्वीकरण का समर्थन है। सीमा: मरीज़ बहुत कम थे, और ऑपरेशन से पहले उनके मस्तिष्क सामान्य नहीं थे।
प्लास्टिसिटी और कार्यात्मक सुधार
प्लास्टिसिटी यानी अनुभव और सीखने से मस्तिष्क की बनावट बदलती है। नए जोड़ बनते हैं; बेकार जोड़ हट जाते हैं। बड़े शहर की गलियाँ याद करने वाले टैक्सी चालकों में स्मृति-क्षेत्र (हिप्पोकैम्पस) बड़ा मिला। लंबे ध्यान और जगलिंग सीखने से भी ग्रे मैटर बदलता है।
क्षति के बाद सुधार
स्ट्रोक या चोट के बाद मस्तिष्क खोया काम स्वस्थ हिस्सों को दे सकता है:
- Axon sprouting: नए तंत्रिका सिरे उगकर स्वस्थ कोशिकाएँ जोड़ते हैं।
- मिलते-जुलते क्षेत्र की भर्ती: दूसरी ओर का वैसा ही क्षेत्र काम सँभालता है।
- नई रक्त वाहिकाएँ उस हिस्से को पोषण देती हैं।
कम उम्र, ज़्यादा पढ़ाई ("संज्ञानात्मक भंडार") और थेरेपी-अभ्यास से सुधार प्रायः बेहतर होता है।
मस्तिष्क को पढ़ने के तरीके
दो मुख्य बातें: स्थानिक विभेदन (spatial resolution) = कितनी सही तरह पता चले कि गतिविधि कहाँ है; कालिक विभेदन (temporal resolution) = कितनी सही तरह पता चले कि कब।
- fMRI: सक्रिय हिस्सों में खून की ऑक्सीजन का बदलाव। कहाँ बहुत अच्छा (1-2 mm), कब कमज़ोर (1-4 सेकंड देर)। सुरक्षित, विकिरण नहीं; महँगा; केवल संबंध दिखाता है, कारण नहीं।
- EEG: खोपड़ी पर इलेक्ट्रोड पूरी विद्युत तरंगें लेते हैं। कब बहुत अच्छा (मिलीसेकंड), कहाँ कमज़ोर। सस्ता; नींद और मिर्गी में उपयोगी।
- ERP: एक ही उद्दीपन पर कई EEG लेकर औसत निकालते हैं, ताकि उस एक घटना की प्रतिक्रिया दिखे। कब अच्छा; ध्यान और प्रत्यक्षण के अध्ययन में; बाहरी शोर समस्या है।
- शव-परीक्षण (post-mortem): मृत्यु के बाद मस्तिष्क देखकर जीवन के व्यवहार से मिलाना (जैसे ब्रोका का मरीज़)। बनावट बहुत बारीक; पर जीवित गतिविधि नहीं, और क्षति के दूसरे कारण भी हो सकते हैं।
जैविक लय, पेसमेकर और ज़ाइटगेबर
- सर्केडियन लय: लगभग 24 घंटे। जैसे सोना-जागना, शरीर का ताप (सुबह-सुबह सबसे कम, दोपहर बाद सबसे ज़्यादा)।
- अल्ट्राडियन: 24 घंटे में एक से ज़्यादा चक्र। जैसे नींद के चरण लगभग हर 90 मिनट दोहराते हैं।
- इन्फ्राडियन: 24 घंटे से लंबी। जैसे मासिक धर्म चक्र; मौसम के साथ मूड बदलना (सर्दियों में उदासी)।
पेसमेकर और ज़ाइटगेबर
अंतर्जात पेसमेकर भीतरी घड़ियाँ हैं। मुख्य घड़ी हाइपोथैलेमस का SCN (सुप्राकियास्मैटिक केंद्रक) है। यह आँखों से रोशनी की ख़बर लेता है और पीनियल ग्रंथि को बताता है कब मेलाटोनिन (नींद का हॉर्मोन, अँधेरे में ज़्यादा) बनाना है।
बहिर्जात ज़ाइटगेबर (जर्मन में "समय-देने वाले") बाहरी संकेत हैं जो घड़ी ठीक करते हैं। रोशनी सबसे ताकतवर है; भोजन का समय और सामाजिक आदतें भी। गुफा-अध्ययनों में, जहाँ लोग दिन की रोशनी के बिना रहे, उनका चक्र लगभग 25 घंटे का हो गया। यानी भीतरी घड़ी को 24 पर टिकाने के लिए रोशनी चाहिए।
घर पर करके देखें
तीन दिन लिखिए कि आप कब सबसे चुस्त और कब सबसे उनींदे होते हैं। फिर देखिए कमरा कब अँधेरा होता है। क्या नींद का समय अँधेरे के पीछे-पीछे चलता है?
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- CNS = मस्तिष्क + मेरुरज्जु; PNS = कायिक + स्वायत्त।
- स्वायत्त: अनुकंपी = उत्तेजना (लड़ो या भागो); परानुकंपी = आराम और पाचन।
- सिनैप्स: क्रिया विभव → वेसिकल न्यूरोट्रांसमीटर छोड़ते हैं → ग्राही → उत्तेजक या निरोधी → summation।
- लड़ो या भागो: एमिग्डाला → हाइपोथैलेमस → अनुकंपी → अधिवृक्क मज्जा → एड्रेनालिन।
- ब्रोका क्षेत्र = बोलना; वर्निके क्षेत्र = भाषा समझना।
- fMRI: कहाँ अच्छा; EEG/ERP: कब अच्छा; शव-परीक्षण: मृत्यु के बाद बनावट।
- सर्केडियन ≈ 24 घंटे; अल्ट्राडियन < 24 घंटे; इन्फ्राडियन > 24 घंटे।
- SCN = मुख्य अंतर्जात पेसमेकर; रोशनी = मुख्य बहिर्जात ज़ाइटगेबर।
हल किए गए उदाहरण
1. एक छात्रा अपनी ओर दौड़ता कुत्ता देखती है और उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगता है। शरीर में क्या हुआ, समझाइए।
1) एमिग्डाला ने ख़तरा पहचाना और हाइपोथैलेमस को संकेत दिया। 2) हाइपोथैलेमस ने अनुकंपी तंत्र चालू किया। 3) अधिवृक्क मज्जा ने खून में एड्रेनालिन छोड़ा। 4) एड्रेनालिन ने धड़कन और साँस तेज़ की और मांसपेशियों को खून भेजा, ताकि वह भाग सके। 5) सुरक्षित होने पर परानुकंपी शाखा ने दिल फिर धीमा किया।
2. एक मरीज़ बात समझ लेता है, पर टूटे-टूटे शब्दों में धीरे बोलता है। कौन-सा क्षेत्र क्षतिग्रस्त होगा, और जीवित व्यक्ति में कौन-सा तरीका पुष्टि करेगा?
ब्रोका क्षेत्र (बोलना, बायाँ अग्र भाग) क्षतिग्रस्त होगा, क्योंकि समझना (वर्निके) ठीक है। fMRI स्कैन दिखा सकता है कि बोलने की कोशिश में कौन-सा क्षेत्र सक्रिय नहीं होता, क्योंकि fMRI का स्थानिक विभेदन अच्छा है।
3. मुंबई की रात-पाली वाली नर्स दिन में ठीक से सो नहीं पाती। पेसमेकर और ज़ाइटगेबर से समझाइए।
उसका SCN (अंतर्जात पेसमेकर) दिन की रोशनी (मुख्य ज़ाइटगेबर) से ठीक होता है। दिन में रोशनी मेलाटोनिन कम रखती है, इसलिए शरीर "जागो" कहता है, भले वह सोना चाहे। शरीर का ताप भी दिन में ऊँचा होता है। मोटे पर्दे (रोशनी का संकेत हटाना) और तय दिनचर्या घड़ी को बदलने में मदद करते हैं।
आम गलतियाँ
- अनुकंपी तंत्र को कायिक तंत्र का भाग कहना। यह स्वायत्त तंत्र का भाग है।
- सोचना कि सिनैप्स पर संदेश दोनों ओर जा सकता है। यह केवल एक ओर जाता है: वेसिकल एक ओर, ग्राही दूसरी ओर।
- ब्रोका (बोलना) और वर्निके (समझना) को आपस में उलझाना।
- कहना कि EEG ठीक-ठीक बताता है गतिविधि कहाँ है। EEG 'कब' में अच्छा है, fMRI 'कहाँ' में।