CBSE कक्षा 12 मनोविज्ञान
अध्याय: 7
1. मनोवैज्ञानिक गुणों में विभिन्नताएँ
वैयक्तिक भिन्नताएँ और मूल्यांकन · बुद्धि · अभिक्षमता और सृजनात्मकता
- वैयक्तिक भिन्नताएँ और मूल्यांकन – कोई भी दो लोग एक जैसे नहीं होते। वैयक्तिक भिन्नता यानी शरीर, मन और व्यवहार में लोगों के अलग-अलग होने के खास तरीके। व्यवहार व्यक्ति (शीलगुण) और परिस्थिति दोनों से बनता है। मनोवैज्ञानिक पाँच मुख्य गुण पढ़ते हैं: बुद्धि, अभिक्षमता, रुचि, व्यक्तित्व और मूल्य। मूल्यांकन यानी इन गुणों को निष्पक्ष, मानक तरीकों से मापना: परीक्षण, साक्षात्कार, व्यक्ति अध्ययन, प्रेक्षण और आत्म-प्रतिवेदन। ज़्यादातर अंक बीच में आते हैं और घंटी जैसा वक्र बनता है।
- बुद्धि: सिद्धांत, बुद्धि-लब्धि और संवेगात्मक बुद्धि – बुद्धि दुनिया को समझने, साफ़ सोचने और चुनौती में साधनों का ठीक उपयोग करने की योग्यता है। मनोमितिक सिद्धांत इसे कारकों में बाँटते हैं: स्पीयरमैन के g और s, थर्स्टन की सात प्राथमिक योग्यताएँ, गिलफ़र्ड की अनेक योग्यताएँ। गार्डनर आठ अलग बुद्धियाँ बताते हैं। स्टर्नबर्ग के त्रिचापीय सिद्धांत में घटकीय, आनुभविक और सांदर्भिक भाग हैं। PASS मॉडल बुद्धि को योजना, अवधान-भ्रांति और सहकालिक-आनुक्रमिक प्रक्रमण मानता है। बुद्धि-लब्धि = मानसिक आयु ÷ कालानुक्रमिक आयु × 100; ज़्यादातर लोग 90-110 पर। संस्कृति तय करती है कि क्या बुद्धिमानी है। संवेगात्मक बुद्धि भावनाओं को जानने और सँभालने का कौशल है।
- अभिक्षमता और सृजनात्मकता – अभिक्षमता प्रशिक्षण से कोई खास कौशल सीख लेने की छिपी योग्यता है। अभिक्षमता और रुचि मिलकर किसी क्षेत्र में सफलता का अनुमान देती हैं। इसे एकल अभिक्षमता परीक्षण या विभेदक अभिक्षमता परीक्षण जैसी बैटरी से मापते हैं, जो कई योग्यताओं की रूपरेखा देती है। सृजनात्मकता नए और उपयोगी विचार या चीज़ें बनाने की योग्यता है। यह अपसारी चिंतन में दिखती है: प्रवाह, लचीलापन, मौलिकता और विस्तारण। सृजनात्मकता के लिए कुछ बुद्धि चाहिए, पर ऊँची बुद्धि अकेले किसी को सृजनशील नहीं बनाती।
2. आत्म एवं व्यक्तित्व
आत्म · व्यक्तित्व
- आत्म: संप्रत्यय, सम्मान और संस्कृति – आत्म हमारे अपने बारे में सारे अनुभवों, विचारों और भावनाओं का जोड़ है। इसमें व्यक्तिगत पहचान (जो मुझे अनोखा बनाए) और सामाजिक पहचान (जिन समूहों का मैं हिस्सा हूँ) है। आत्म जानने वाला (कर्ता) भी है और जाना जाने वाला (कर्म) भी। आत्म-संप्रत्यय यानी हम खुद को कैसे देखते हैं; आत्म-सम्मान यानी पढ़ाई, दोस्त, शरीर और परिवार में हम खुद को कितना मूल्य देते हैं। आत्म-सक्षमता सफल हो सकने का विश्वास है; आत्म-नियमन अपने व्यवहार को सँभालना है, जिसमें आत्म-प्रेक्षण, आत्म-अनुदेश और आत्म-प्रबलन मदद करते हैं। भारतीय संस्कृति में आत्म की सीमा लचीली है जिसमें परिवार और समुदाय आते हैं; पाश्चात्य संस्कृति में व्यक्ति के चारों ओर पक्की सीमा है।
- व्यक्तित्व: उपागम और मूल्यांकन – व्यक्तित्व अलग-अलग परिस्थितियों में सोचने, महसूस करने और करने का व्यक्ति का स्थिर, खास ढंग है। प्रकार उपागम लोगों को समूहों में बाँटते हैं (टाइप A और B, अंतर्मुखी और बहिर्मुखी)। शीलगुण उपागम कई आयामों पर वर्णन करते हैं (ऑलपोर्ट, कैटेल, आइज़ेंक, पाँच-कारक)। फ्रायड का मनोगतिक उपागम अचेतन, इड, अहं, पराहम् और रक्षा युक्तियों को देखता है; नव-फ्रायडवादी (युंग, हॉर्नी, एडलर, फ्रॉम, एरिक्सन) सामाजिक और लक्ष्य वाली शक्तियों पर ज़ोर देते हैं। व्यवहारवादी उपागम कहता है व्यक्तित्व सीखा जाता है। सांस्कृतिक उपागम इसे पारिस्थितिकी और जीवन-शैली से जोड़ता है। मानवतावादी (रोजर्स, मैस्लो) विकास और आत्मसिद्धि पर ज़ोर देते हैं। मूल्यांकन आत्म-प्रतिवेदन, प्रक्षेपी तकनीक और व्यवहारात्मक विधियों से होता है।
3. जीवन की चुनौतियों का सामना
दबाव · सामना और कल्याण
- दबाव: स्वरूप, स्रोत और स्वास्थ्य पर प्रभाव – दबाव (stress) उन घटनाओं के प्रति शरीर और मन की अनुक्रियाओं का पैटर्न है जो संतुलन बिगाड़ें और हमारी सामना करने की क्षमता से ज़्यादा लगें। दबाव पैदा करने वाली घटना दबावकारक है। दबाव सुखद (eustress) या कष्टप्रद (distress) हो सकता है। लाज़ारस ने दिखाया कि दबाव मूल्यांकन पर टिका है: क्या यह खतरा है, और क्या मैं सँभाल सकता हूँ? दबाव भौतिक-पर्यावरणीय, मनोवैज्ञानिक (कुंठा, द्वंद्व, आंतरिक और सामाजिक दबाव) या सामाजिक हो सकता है। स्रोत हैं जीवन की बड़ी घटनाएँ, रोज़ की छोटी उलझनें और अभिघातज घटनाएँ। यह भावना, शरीर, सोच और व्यवहार पर असर डालता है; लंबा दबाव बर्नआउट ला सकता है। सेली के सामान्य अनुकूलन संलक्षण के तीन चरण: सचेत प्रतिक्रिया, प्रतिरोध और परिश्रांति। लंबा दबाव प्रतिरक्षा तंत्र कमज़ोर करता है। स्वस्थ जीवन-शैली बचाती है।
- सामना, जीवन कौशल और सकारात्मक स्वास्थ्य – सामना (coping) यानी दबाव सँभालने के लिए सोच और कर्म से किया गया प्रयास। सामना कार्य-अभिविन्यस्त (समस्या हल करना), संवेग-अभिविन्यस्त (भावनाएँ सँभालना) या परिहार-अभिविन्यस्त (नकारना या भागना) हो सकता है। लाज़ारस और फ़ोकमैन समस्या-केंद्रित और संवेग-केंद्रित सामना की बात करते हैं। दबाव प्रबंधन तकनीकें: विश्रांति, ध्यान, जैवप्रतिप्राप्ति, सृजनात्मक मानस-चित्रण, दबाव टीकाकरण जैसी संज्ञानात्मक-व्यवहारात्मक विधियाँ और व्यायाम। दृढ़ग्राहिता, समय प्रबंधन, तर्कसंगत चिंतन, अच्छे संबंध, आत्म-देखभाल और बुरी आदतों पर काबू जैसे जीवन कौशल चुनौतियों में मदद करते हैं। सकारात्मक स्वास्थ्य आहार, व्यायाम, सकारात्मक अभिवृत्ति, सकारात्मक चिंतन और सामाजिक अवलंब पर टिका है। संहृष्ट, लचीले लोग दबाव से वापस उभर आते हैं।
4. मनोवैज्ञानिक विकार
असामान्यता और वर्गीकरण · प्रमुख विकार
- असामान्यता और मनोवैज्ञानिक विकारों का वर्गीकरण – व्यवहार तब असामान्य कहलाता है जब उसमें 4 D दिखें: विचलन (बहुत अलग), कष्ट (व्यक्ति को दुख), दुष्क्रिया (रोज़ का जीवन बिगड़ना) और कभी-कभी ख़तरा। बहुत पहले लोग आत्माओं को दोष देते थे, यूनानियों ने शरीर को कारण माना, बाद में सुधारकों ने दयालु देखभाल शुरू की, और आज जैव-मनो-सामाजिक दृष्टि अपनाई जाती है। विशेषज्ञ दो पुस्तिकाओं से वर्गीकरण करते हैं: DSM-5-TR (अमेरिकी मनोरोग संघ) और ICD-11 (विश्व स्वास्थ्य संगठन)। विकार जैविक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक-सांस्कृतिक कारकों के मेल से बनते हैं। प्रवणता-दबाव मॉडल कहता है: जन्मजात कमज़ोरी और पर्याप्त दबाव मिलकर विकार ला सकते हैं।
- प्रमुख मनोवैज्ञानिक विकार: प्रकार, लक्षण और उदाहरण – मनोवैज्ञानिक विकार परिवारों में बँटते हैं। दुश्चिंता विकार में बहुत ज़्यादा डर होता है (सामान्यीकृत दुश्चिंता, आतंक, दुर्भीति, वियोग दुश्चिंता)। OCD में अनचाहे विचार और बार-बार के कार्य फँसा लेते हैं। PTSD जैसे आघात विकार किसी भयानक घटना के बाद आते हैं। कायिक विकार शरीर की शिकायतों के रूप में दिखते हैं; विघटनशील विकार में स्मृति या पहचान बँट जाती है। अवसाद हफ़्तों तक मूड गिराता है; द्विध्रुवी विकार उन्माद और अवसाद के बीच झुलाता है। मनोविदलन कुछ अनुभव जोड़ता (विभ्रम, भ्रमासक्ति) और कुछ घटाता (भावना, इच्छा) है। तंत्रिका-विकासात्मक विकार (ADHD, स्वलीनता, बौद्धिक अक्षमता, अधिगम विकार) और आचरण समस्याएँ बचपन में शुरू होती हैं। भोजन और मादक द्रव्य संबंधी विकार शरीर और जीवन को हानि पहुँचाते हैं।
5. चिकित्सा उपागम
मनश्चिकित्सा · पुनर्वास
- मनश्चिकित्सा: प्रक्रिया, प्रकार, उपचार कारक और नैतिकता – मनश्चिकित्सा सेवार्थी और प्रशिक्षित चिकित्सक के बीच एक स्वैच्छिक, भरोसेमंद संबंध है जो भावनाओं, विचारों और व्यवहार को बदलने में मदद करता है। यह चरणों में चलती है और चिकित्सात्मक संबंध पर टिकी है: भरोसा, सम्मान, तदनुभूति और गोपनीयता। मनोगतिक चिकित्सा छिपे द्वंद्व खोजती है। व्यवहार चिकित्सा ग़लत आदतें भुलाती है (विश्रांति, क्रमिक विसंवेदीकरण, टोकन अर्थव्यवस्था, मॉडलिंग)। संज्ञानात्मक चिकित्सा अविवेकी विश्वास बदलती है (एलिस का ABC, बेक की CBT)। मानवतावादी-अस्तित्वपरक चिकित्सा विकास और अर्थ में मदद करती है (रोजर्स, फ्रैंकल, गेस्टाल्ट)। वैकल्पिक चिकित्सा योग, श्वास और ध्यान अपनाती है। उपचार तकनीक, संबंध, विरेचन और सेवार्थी व चिकित्सक के गुणों से होता है। नैतिकता चिकित्सा को सुरक्षित रखती है।
- मानसिक रोग से पीड़ित लोगों का पुनर्वास – उपचार (दवा और चिकित्सा) लक्षण घटाता है, पर मनोविदलन जैसे गंभीर मानसिक रोग वाले व्यक्ति को काम करने, दोस्त बनाने या अपनी देखभाल में फिर भी कठिनाई हो सकती है। पुनर्वास उसे उत्पादक और आत्मनिर्भर बनाने में मदद करता है। इसमें व्यावसायिक चिकित्सा (दिनचर्या बनाने वाले सरल काम), सामाजिक कौशल प्रशिक्षण (रोज़ की सामाजिक स्थितियों का भूमिका-अभिनय), संज्ञानात्मक पुनर्प्रशिक्षण (ध्यान, स्मृति और योजना के अभ्यास) और व्यावसायिक प्रशिक्षण (नौकरी के कौशल और मदद) शामिल हैं। परिवार की शिक्षा, डे-केयर, स्वयं-सहायता समूह और कलंक से लड़ाई व्यक्ति को समुदाय में सम्मानित जीवन देते हैं।
6. अभिवृत्ति तथा सामाजिक संज्ञान
अभिवृत्तियाँ · पूर्वाग्रह और भेदभाव
- अभिवृत्ति तथा सामाजिक संज्ञान: घटक, निर्माण और परिवर्तन – सामाजिक मनोविज्ञान बताता है कि दूसरे लोग हमारी सोच, भावना और व्यवहार पर कैसे असर डालते हैं। सामाजिक संज्ञान यानी हम लोगों को कैसे समझते हैं: स्कीमा (मन के फ़ोल्डर) से, छवि बनाकर और व्यवहार का कारण (गुणारोपण) सोचकर। अभिवृत्ति किसी विषय के बारे में मन की अवस्था है, जिसके तीन घटक हैं: भावात्मक, व्यवहारात्मक और संज्ञानात्मक। अभिवृत्तियाँ कर्षण, चरम सीमा, सरलता/जटिलता और केंद्रिकता में अलग होती हैं। ये साहचर्य, पुरस्कार-दंड, प्रतिरूपण, समूह मानकों और सूचना से सीखी जाती हैं। ये संतुलन लौटाने (हाइडर), असंवादिता मिटाने (फेस्टिंगर) या पसंदीदा स्रोत से दो चरणों में (मोहसिन) बदलती हैं; स्रोत, संदेश और लक्ष्य सब असर डालते हैं। अभिवृत्ति व्यवहार की भविष्यवाणी कुछ ही स्थितियों में करती है।
- पूर्वाग्रह और भेदभाव: स्रोत और उन्हें कम करने के उपाय – रूढ़धारणा किसी पूरे समूह के बारे में जमा हुआ, बहुत सरल विश्वास है (संज्ञानात्मक भाग)। पूर्वाग्रह किसी समूह के प्रति नकारात्मक अभिवृत्ति या भावना है, जो अक्सर रूढ़धारणा पर टिकी होती है (भावात्मक भाग)। भेदभाव उस समूह के सदस्यों के साथ अनुचित व्यवहार है (व्यवहारात्मक भाग)। पूर्वाग्रह सीखने (परिवार, मित्र, मीडिया), मज़बूत सामाजिक पहचान और अंतःसमूह अभिनति, बलि का बकरा बनाने, सत्य के अंश की धारणा और स्वतः पूर्ण भविष्यवाणी से आता है। इसे शिक्षा, सही शर्तों (समान दर्जा, साझा लक्ष्य, सहयोग, नेताओं का समर्थन) वाले अंतरसमूह संपर्क, व्यक्तिगत पहचान को उभारने और बड़ी साझा पहचान बनाने से घटाया जा सकता है।
7. सामाजिक प्रभाव एवं समूह प्रक्रियाएँ
समूह
- समूह: कैसे बनते हैं और हमें कैसे बदलते हैं – समूह दो या अधिक लोगों का ऐसा मेल है जिसमें वे आपस में बात करते हैं, एक लक्ष्य रखते हैं, मानक मानते हैं और 'हम' महसूस करते हैं। लोग सुरक्षा, प्रतिष्ठा, आत्म-सम्मान, ज़रूरतों और लक्ष्यों के लिए समूह में जुड़ते हैं। समूह पाँच चरणों से गुज़रता है: निर्माण, विप्लव, प्रतिमान, निष्पादन, समापन। संरचना में भूमिका, मानक, प्रतिष्ठा और संसक्तता होते हैं। प्रकार: प्राथमिक/द्वितीयक, औपचारिक/अनौपचारिक, अंतःसमूह/बाह्यसमूह। समूह हमारा व्यवहार भी बदलता है: सामाजिक स्वैराचार में साझा काम में हर व्यक्ति कम मेहनत करता है; समूह ध्रुवीकरण में चर्चा के बाद समूह की राय और चरम हो जाती है।