China 高二 Physics
अध्याय: 9
1. Selective 1 Ch.1 Momentum
Momentum; impulse; momentum theorem · Conservation of momentum · Elastic and inelastic collisions; recoil, rockets
- जड़त्व, पहला नियम, संवेग, दूसरा नियम और आवेग – कोई वस्तु अपनी विराम या एकसमान गति की अवस्था तब तक नहीं बदलती जब तक उस पर कोई नेट बाहरी बल न लगे (पहला नियम)। बदलाव का यह विरोध जड़त्व है और द्रव्यमान इसका माप है। संवेग p = mv. संवेग बदलने की दर नेट बल के बराबर है: F = dp/dt, द्रव्यमान स्थिर हो तो F = ma (दूसरा नियम)। आवेग J = F × Δt = Δp; रुकने में ज़्यादा समय लगे तो बल कम लगता है।
- तीसरा नियम, संवेग संरक्षण और बलों का संतुलन – बल हमेशा जोड़े में होते हैं: A ने B पर बल लगाया तो उसी पल B भी A पर बराबर और उलटा बल लगाता है (तीसरा नियम)। यह जोड़ा अलग-अलग वस्तुओं पर लगता है। जिस निकाय पर कोई नेट बाहरी बल न हो, उसका कुल रैखिक संवेग स्थिर रहता है; इससे प्रतिक्षेप, रॉकेट और टक्करें समझ आती हैं। कोई कण संतुलन में है जब उस पर सारे बलों का योग शून्य हो; संतुलन वाले तीन संगामी बल एक बंद त्रिभुज बनाते हैं।
- एक और दो विमाओं में प्रत्यास्थ और अप्रत्यास्थ संघट्ट – हर संघट्ट (टक्कर) में कुल संवेग संरक्षित रहता है (छोटी सी टक्कर में बाहरी बल नहीं)। प्रत्यास्थ संघट्ट में गतिज ऊर्जा भी संरक्षित रहती है। अप्रत्यास्थ में कुछ गतिज ऊर्जा ऊष्मा, ध्वनि या पिचकने में जाती है; वस्तुएँ चिपक जाएँ तो पूर्णतः अप्रत्यास्थ। 1D प्रत्यास्थ में (वस्तु 2 रुकी हो): v₁ = (m₁ − m₂)u₁/(m₁ + m₂), v₂ = 2m₁u₁/(m₁ + m₂)। 2D में x और y दोनों दिशाओं में अलग-अलग संवेग संरक्षित।
2. Selective 1 Ch.2 Oscillations
Simple harmonic motion · Pendulum; measuring g · Forced oscillation; resonance
- सरल आवर्त गति (SHM) – जो गति तय समय के बाद बार-बार दोहराती है, वह आवर्ती गति है। अगर वस्तु बीच की जगह के इधर-उधर आती-जाती है और वापस खींचने वाला बल दूरी के अनुपात में है (F = −kx), तो वह सरल आवर्त गति है। इसकी स्थिति x = A sin(ωt + φ) है, जहाँ ω = 2π/T = 2πf। बीच में चाल सबसे ज़्यादा, सिरों पर त्वरण सबसे ज़्यादा, और कुल ऊर्जा ½kA² हमेशा वही रहती है।
- स्प्रिंग के दोलन और सरल लोलक – स्प्रिंग से बँधा गुटका F = −kx का खिंचाव महसूस करता है, जहाँ k बल नियतांक (कठोरता) है। यह SHM करता है, T = 2π√(m/k)। सरल लोलक छोटे झूलों में mg sinθ ≈ mgθ का खिंचाव महसूस करता है और SHM करता है, T = 2π√(L/g)। लोलक का आवर्तकाल गोलक के द्रव्यमान पर और (छोटे झूलों में) आयाम पर निर्भर नहीं करता।
- अनुनाद और प्रणोदित कंपन – हर वस्तु की एक प्राकृतिक आवृत्ति होती है जिस पर वह कंपन करना पसंद करती है। अगर बाहर से बार-बार लगने वाले धक्के की आवृत्ति अलग हो, तो वस्तु धक्के की आवृत्ति पर थोड़ा-सा कंपन करती है: प्रणोदित कंपन। अगर धक्के की आवृत्ति प्राकृतिक आवृत्ति के बराबर हो, तो झूला बहुत बड़ा हो जाता है: अनुनाद। घर्षण (अवमंदन) इसे हमेशा बढ़ने से रोकता है।
3. Selective 1 Ch.3 Mechanical waves
Formation and description of waves · Reflection, refraction, diffraction, interference · Doppler effect
- प्रगामी तरंगें: प्रकार, चाल और समीकरण – तरंग ऊर्जा को एक जगह से दूसरी जगह ले जाती है, पदार्थ को नहीं। अनुप्रस्थ तरंग में कण तरंग की दिशा के लंबवत हिलते हैं; अनुदैर्ध्य में उसी दिशा में। चाल v = fλ। डोरी पर v = √(T/μ); गैस में ध्वनि के लिए v = √(γP/ρ)। +x की ओर जाती तरंग y = A sin(kx − ωt), जहाँ k = 2π/λ और ω = 2πf।
- व्यतिकरण (यंग का द्वि-झिरी प्रयोग) और एकल झिरी विवर्तन – दो कला-संबद्ध स्रोत (समान आवृत्ति, स्थिर कलांतर) दीप्त और अदीप्त फ्रिंजों का स्थिर पैटर्न बनाते हैं। पर्दे के किसी बिंदु पर पथांतर Δ = yd/D: Δ = nλ पर दीप्त, Δ = (n + ½)λ पर अदीप्त। सभी फ्रिंज समान चौड़ाई β = λD/d के होते हैं। a चौड़ाई की एकल झिरी विवर्तन देती है: 2λD/a चौड़ा चमकीला केंद्रीय उच्चिष्ठ, पहला निम्निष्ठ a sin θ = λ पर, और हल्के पार्श्व उच्चिष्ठ।
- तरंगों के गुण: परावर्तन, अपवर्तन, विवर्तन और व्यतिकरण – हर तरंग (पानी, ध्वनि, प्रकाश) चार काम करती है। दीवार से टकराकर लौटती है (परावर्तन)। चाल बदलने पर मुड़ जाती है (अपवर्तन)। दरार या किनारे के बाद फैल जाती है (विवर्तन)। और दो तरंगें मिलें तो जुड़ जाती हैं (अध्यारोपण): शिखर + शिखर = बड़ी तरंग (संपोषी व्यतिकरण), शिखर + गर्त = शांत (विनाशी व्यतिकरण)। नियम: पथांतर = nλ हो तो तेज़, (n + ½)λ हो तो शांत। दो झिरियों के लिए फ्रिंज की दूरी Δx = λD/d।
- डॉप्लर प्रभाव – जब तरंग का स्रोत और प्रेक्षक (सुनने वाला) एक-दूसरे की ओर या एक-दूसरे से दूर चलते हैं, तो सुनी गई आवृत्ति बदल जाती है। इसे डॉप्लर प्रभाव कहते हैं। पास आने पर शिखर पास-पास दबते हैं: छोटी तरंगदैर्घ्य, ज़्यादा आवृत्ति, ऊँचा तारत्व। दूर जाने पर शिखर फैलते हैं: कम आवृत्ति। ध्वनि के लिए f′ = f × (v ± vo) ÷ (v ∓ vs), पास आने पर ऊपर वाले चिह्न। इसका उपयोग स्पीड गन, मौसम रडार, खून के बहाव का अल्ट्रासाउंड, चमगादड़ों में और खगोल विज्ञान (रेड शिफ्ट, ब्लू शिफ्ट) में होता है।
4. Selective 1 Ch.4 Light
Refraction; refractive index · Total internal reflection; optical fibre · Interference; double-slit wavelength · Diffraction; polarisation; lasers
- प्रकाश का अपवर्तन: नियम, अपवर्तनांक और काँच का स्लैब – प्रकाश जब एक पारदर्शी माध्यम से दूसरे में जाता है तो उसकी चाल बदलती है, इसलिए वह सीमा पर मुड़ जाता है (अगर अभिलंब के साथ न गिरे)। प्रकाशिक सघन माध्यम में जाते समय वह धीमा होकर अभिलंब की ओर मुड़ता है, और बाहर आते समय तेज़ होकर अभिलंब से दूर। दो माध्यमों के लिए sin i / sin r स्थिर रहता है (स्नेल का नियम); यही स्थिरांक अपवर्तनांक है, जो प्रकाश की चालों का अनुपात भी है: n = c/v। आयताकार काँच के स्लैब से निकली किरण आपतित किरण के समांतर होती है, पर थोड़ी खिसकी हुई (पार्श्विक विस्थापन)।
- अपवर्तन, पूर्ण आंतरिक परावर्तन और प्रिज़्म – एक माध्यम से दूसरे में जाते समय प्रकाश मुड़ता है: n₁ sin i = n₂ sin r। सघन से विरल में जाते समय यह अभिलंब से दूर मुड़ता है; क्रांतिक कोण C (sin C = 1/n) से बड़े कोण पर प्रकाश बाहर नहीं निकलता, पूरा लौट आता है: पूर्ण आंतरिक परावर्तन। प्रकाशीय तंतु इसी से प्रकाश ले जाते हैं। प्रिज़्म में r₁ + r₂ = A और विचलन δ = i + e − A; न्यूनतम विचलन पर n = sin((A + δm)/2) / sin(A/2)।
- व्यतिकरण (यंग का द्वि-झिरी प्रयोग) और एकल झिरी विवर्तन – दो कला-संबद्ध स्रोत (समान आवृत्ति, स्थिर कलांतर) दीप्त और अदीप्त फ्रिंजों का स्थिर पैटर्न बनाते हैं। पर्दे के किसी बिंदु पर पथांतर Δ = yd/D: Δ = nλ पर दीप्त, Δ = (n + ½)λ पर अदीप्त। सभी फ्रिंज समान चौड़ाई β = λD/d के होते हैं। a चौड़ाई की एकल झिरी विवर्तन देती है: 2λD/a चौड़ा चमकीला केंद्रीय उच्चिष्ठ, पहला निम्निष्ठ a sin θ = λ पर, और हल्के पार्श्व उच्चिष्ठ।
- प्रकाश का ध्रुवण (Polarisation) – प्रकाश एक अनुप्रस्थ (transverse) तरंग है: इसका विद्युत क्षेत्र चलने की दिशा के लंबवत कंपन करता है। साधारण प्रकाश में यह कंपन हर दिशा में होता है। पोलेरॉइड केवल एक दिशा का कंपन आगे जाने देता है, इसलिए प्रकाश समतल ध्रुवित हो जाता है और उसकी तीव्रता आधी रह जाती है। दूसरा पोलेरॉइड कोण θ पर हो तो I = I₀cos²θ (मैलस का नियम)।
5. Selective 2 Ch.1 Ampère and Lorentz forces
Force on current-carrying wire · Force on moving charges; circular motion in B · Mass spectrometer and cyclotron
- लॉरेंज़ बल, धारा लूप पर बल-आघूर्ण और चल कुंडली गैल्वेनोमीटर – वेग v से चलते आवेश q पर बल F = q(E + v × B) लगता है, यही लॉरेंज़ बल है। चुंबकीय भाग qvB sinθ हमेशा v के लंबवत है, इसलिए पथ वृत्त बन जाता है (r = mv/qB) और चाल नहीं बदलती। तार पर F = IL × B। एक दिशा की समांतर धाराएँ आकर्षित करती हैं: F/L = μ₀I₁I₂/2πd। क्षेत्र में लूप पर बल-आघूर्ण τ = m × B, m = NIA, यानी लूप चुंबकीय द्विध्रुव है। गैल्वेनोमीटर में विक्षेप φ = (NAB/k)I। छोटा शंट ऐमीटर बनाता है, बड़ा श्रेणी प्रतिरोध वोल्टमीटर।
- द्रव्यमान स्पेक्ट्रोमीटर और साइक्लोट्रॉन – चुंबकीय बल हमेशा गति की दिशा से समकोण पर लगता है, इसलिए चुंबकीय क्षेत्र में आवेश वृत्त में घूमता है, जिसकी त्रिज्या r = mv/qB होती है। द्रव्यमान स्पेक्ट्रोमीटर में पहले वोल्टता V से आयन को तेज़ करते हैं, फिर क्षेत्र B में मोड़ते हैं। भारी आयन बड़ा वृत्त बनाता है (r = (1/B)√(2mV/q)), इसलिए द्रव्यमान पता चल जाता है। साइक्लोट्रॉन में कण दो D-आकार के डिब्बों में घूमता है और हर बार गैप पार करने पर धक्का पाता है। हर आधे चक्कर का समय बराबर रहता है, इसलिए कण की ऊर्जा बढ़ती है और वृत्त बड़ा होता जाता है (f = qB/2πm)।
6. Selective 2 Ch.2 Electromagnetic induction
Lenz's law · Faraday's law · Eddy currents; mutual and self-induction
- विद्युत चुंबकीय प्रेरण – जब किसी कुंडली से गुजरने वाला चुंबकीय फ्लक्स बदलता है, तो उसमें emf पैदा होता है: ε = −N dΦ/dt (फैराडे)। ऋण चिह्न लेन्ज़ का नियम है: प्रेरित धारा हमेशा उस बदलाव का विरोध करती है जिससे वह बनी। चुंबकीय क्षेत्र में छड़ चलाने पर गतिक emf ε = Blv मिलता है। बदलती धारा अपनी ही कुंडली में (स्वप्रेरण, L) और पास की कुंडली में (अन्योन्य प्रेरण, M) emf बनाती है।
- धारावाही चालक पर बल, विद्युत मोटर और प्रेरण – चुंबकीय क्षेत्र में रखे धारावाही तार पर एक धक्का यानी बल लगता है। तार क्षेत्र से 90° पर हो तो बल सबसे ज़्यादा, और क्षेत्र के समांतर हो तो शून्य। बल की दिशा फ्लेमिंग के वामहस्त नियम से मिलती है। मोटर इसी बल से कुंडली घुमाती है; जनित्र उल्टा काम करके गति से धारा बनाता है।
7. Selective 2 Ch.3 Alternating current
AC and its description · Transformers · Power transmission
- प्रत्यावर्ती धारा – प्रत्यावर्ती धारा (AC) बार-बार अपना मान और दिशा बदलती है: I = I₀ sin ωt। इसका rms मान I₀/√2 है, यानी वह स्थिर DC जो उतनी ही गर्मी दे। प्रतिरोध में V और I साथ चलते हैं; प्रेरक में I 90° पीछे (Xʟ = ωL); संधारित्र में I 90° आगे (Xᴄ = 1/ωC)। श्रेणी LCR में Z = √(R² + (Xʟ − Xᴄ)²), Xʟ = Xᴄ पर अनुनाद होता है, और औसत शक्ति P = Vrms Irms cos φ।
- धारावाही चालक पर बल, विद्युत मोटर और प्रेरण – चुंबकीय क्षेत्र में रखे धारावाही तार पर एक धक्का यानी बल लगता है। तार क्षेत्र से 90° पर हो तो बल सबसे ज़्यादा, और क्षेत्र के समांतर हो तो शून्य। बल की दिशा फ्लेमिंग के वामहस्त नियम से मिलती है। मोटर इसी बल से कुंडली घुमाती है; जनित्र उल्टा काम करके गति से धारा बनाता है।
- AC जनित्र और ट्रांसफ़ॉर्मर – AC जनित्र चुंबकीय क्षेत्र में एक कुंडली घुमाता है। उससे गुजरता फ्लक्स लगातार बदलता है, इसलिए emf e = NBAω sin ωt बनता है, शिखर NBAω। ट्रांसफ़ॉर्मर एक लोहे के क्रोड पर लिपटी दो कुंडलियों के अन्योन्य प्रेरण से चलता है: Vs/Vp = Ns/Np। उच्चायी (स्टेप-अप) वोल्टता बढ़ाता, धारा घटाता है; अपचायी (स्टेप-डाउन) उल्टा। शक्ति लगभग वही रहती है (Vp Ip ≈ Vs Is)।
8. Selective 2 Ch.4 EM oscillations and waves
LC oscillation; Maxwell's theory · Transmission and reception of radio waves · EM spectrum
- LC दोलन – LC परिपथ में एक संधारित्र (C) और एक कुंडली यानी प्रेरक (L) जुड़े होते हैं। आवेशित संधारित्र कुंडली से धारा भेजता है; कुंडली धारा को चलाए रखती है और संधारित्र को उल्टा आवेशित कर देती है। ऊर्जा संधारित्र के विद्युत क्षेत्र और कुंडली के चुंबकीय क्षेत्र के बीच झूलती रहती है। प्रतिरोध न हो तो यह कभी नहीं रुकती। आवर्तकाल T = 2π√(LC) (थॉमसन सूत्र) और आवृत्ति f = 1 / (2π√(LC))। प्रतिरोध से दोलन अवमंदित होते हैं; ट्रांजिस्टर वाला जनित्र ऊर्जा भरकर उन्हें चालू रखता है।
- रेडियो तरंगों का प्रेषण और ग्रहण – ध्वनि धीमा संकेत है और अपने आप दूर तक नहीं जा सकती। रेडियो स्टेशन उसे तेज़ वाहक तरंग पर चढ़ाता है, इसे मॉड्युलेशन कहते हैं। आयाम मॉड्युलन (AM) में वाहक की ऊँचाई ध्वनि के आकार की नकल करती है। एंटीना से यह रेडियो तरंग बनकर निकलती है। घर में एंटीना कई स्टेशन एक साथ पकड़ता है; ट्यून किया LC परिपथ, f = 1/(2π√LC), एक स्टेशन चुनता है। फिर डायोड और फ़िल्टर डिमॉड्युलेशन करके वाहक में से ध्वनि निकालते हैं और स्पीकर उसे बजाता है।
- विद्युत चुंबकीय तरंगें – बदलता हुआ विद्युत क्षेत्र धारा जैसा काम करता है। इसे विस्थापन धारा कहते हैं और यह चुंबकीय क्षेत्र बनाती है। बदलता चुंबकीय क्षेत्र विद्युत क्षेत्र बनाता है। दोनों मिलकर विद्युत चुंबकीय तरंग बनकर c = 3 × 10⁸ m/s से चलते हैं, खाली जगह में भी। E और B एक-दूसरे से और चलने की दिशा से 90° पर होते हैं, इसलिए ये तरंगें अनुप्रस्थ हैं। तरंगदैर्घ्य के क्रम में: रेडियो, सूक्ष्म तरंग, अवरक्त, दृश्य, पराबैंगनी, एक्स-किरणें, गामा किरणें।
9. Selective 2 Ch.5 Sensors
Sensors and simple automatic control
- सेंसर: मशीनें दुनिया को कैसे महसूस करती हैं – सेंसर किसी भौतिक राशि (प्रकाश, तापमान, दूरी, नमी, ध्वनि, दाब) को विद्युत संकेत में बदलता है। एनालॉग सेंसर लगातार बदलता वोल्टेज देता है; ADC उसे संख्या में बदलता है जिसे कंप्यूटर समझता है। नियंत्रक संख्या को थ्रेशोल्ड (सीमा) से मिलाकर एक्चुएटर को, अक्सर रिले के ज़रिए, चालू-बंद करता है। तय समय पर बार-बार पढ़ना डेटा लॉगिंग है। अच्छे सेंसर की सही रेंज, संवेदनशीलता, शुद्धता और प्रतिक्रिया-समय होता है।