प्रत्यावर्ती धारा क्या है?
दिष्ट धारा (DC) एक ही दिशा में बहती है, जैसे सेल से। प्रत्यावर्ती धारा (AC) बार-बार दिशा बदलती है। भारत में यह हर सेकंड 100 बार दिशा बदलती है (50 पूरे चक्र, यानी f = 50 Hz)।
V = V₀ sin ωt और I = I₀ sin ωt लिखते हैं। V₀ और I₀ शिखर मान (सबसे बड़े मान) हैं। ω = 2πf कोणीय आवृत्ति है। एक चक्र का समय T = 1/f।
शिखर, माध्य और rms मान
एक पूरे चक्र में AC आधे समय धनात्मक और आधे समय ऋणात्मक है, इसलिए इसका औसत शून्य है। इससे कुछ काम की बात पता नहीं चलती।
इसलिए हम rms मान (वर्ग माध्य मूल) लेते हैं: मानों का वर्ग करो, औसत लो, फिर वर्गमूल। साइन तरंग के लिए: Irms = I₀/√2 ≈ 0.707 I₀ और Vrms = V₀/√2।
अर्थ: rms मान वह स्थिर DC है जो प्रतिरोध को उसी दर से गर्म करे। मीटर और बल्ब rms मान ही दिखाते हैं। आधे चक्र का माध्य 2I₀/π ≈ 0.637 I₀ है।
फेज़र: तरंग के लिए घूमता तीर
फेज़र लंबाई V₀ का एक तीर है जो कोणीय चाल ω से वामावर्त घूमता है। किसी भी समय उसका ऊर्ध्वाधर प्रक्षेप V₀ sin ωt है। इस तरह घूमता तीर तरंग बनाता है।
वोल्टता और धारा के फेज़र साथ बनाते हैं। उनके बीच का कोण कलांतर φ है।
R, L और C में AC: प्रतिघात
केवल प्रतिरोध
V और I समान कला में (φ = 0)। V₀ = I₀ R।
केवल प्रेरक
प्रेरक धारा के हर बदलाव का विरोध करता है, इसलिए धारा वोल्टता से 90° पीछे रहती है। इसका विरोध प्रेरकीय प्रतिघात Xʟ = ωL (ओम) है। आवृत्ति बढ़े → Xʟ बढ़े। DC (ω = 0) के लिए Xʟ = 0।
केवल संधारित्र
संधारित्र पहले आवेशित होता है, तब उसकी वोल्टता बनती है, इसलिए धारा 90° आगे रहती है। धारितीय प्रतिघात Xᴄ = 1/(ωC)। आवृत्ति बढ़े → Xᴄ घटे। संधारित्र DC को रोकता है (Xᴄ → ∞)।
श्रेणी LCR परिपथ और प्रतिबाधा
श्रेणी में R, L और C सबमें एक ही धारा बहती है। पहले धारा का फेज़र बनाइए। Vʀ उसी के अनुदिश, Vʟ 90° आगे, Vᴄ 90° पीछे। Vʟ और Vᴄ उल्टी दिशा में हैं, इसलिए कुछ कट जाते हैं।
V² = Vʀ² + (Vʟ − Vᴄ)², इससे प्रतिबाधा Z = √(R² + (Xʟ − Xᴄ)²)। फिर I = V/Z।
कलांतर: tan φ = (Xʟ − Xᴄ)/R। Xʟ > Xᴄ हो तो परिपथ प्रेरकीय (धारा पीछे); Xᴄ > Xʟ हो तो धारितीय (धारा आगे)।
श्रेणी LCR परिपथ में अनुनाद
आवृत्ति बदलने पर Xʟ बढ़ता है और Xᴄ घटता है। एक आवृत्ति पर दोनों बराबर हो जाते हैं: ω₀L = 1/(ω₀C), तो ω₀ = 1/√(LC) और f₀ = 1/(2π√LC)।
अनुनाद पर Z = R (सबसे कम), धारा सबसे अधिक, और V तथा I समान कला में। Vʟ और Vᴄ अलग-अलग सप्लाई से बहुत बड़े हो सकते हैं, पर आपस में कट जाते हैं।
तीक्ष्णता: कम R से ऊँचा और पतला शिखर मिलता है। गुणता गुणांक Q = ω₀L/R इसे मापता है। रेडियो को एक स्टेशन चुनने के लिए तीक्ष्ण शिखर चाहिए। अनुनाद के लिए L और C दोनों चाहिए; RL या RC में अनुनाद नहीं होता।
शक्ति और शक्ति गुणांक
AC परिपथ में औसत शक्ति: P = Vrms Irms cos φ। cos φ = R/Z को शक्ति गुणांक कहते हैं।
- केवल R: φ = 0, cos φ = 1, पूरी शक्ति।
- केवल L या केवल C: φ = 90°, cos φ = 0, औसत शक्ति शून्य।
- अनुनाद पर LCR: cos φ = 1।
ऊर्जा केवल प्रतिरोध खर्च करता है। आदर्श L या C चौथाई चक्र में ऊर्जा लेकर अगले चौथाई में लौटा देते हैं।
कम शक्ति गुणांक का मतलब उतनी ही उपयोगी शक्ति के लिए ज़्यादा धारा, जिससे तारों में I²R ऊष्मा के रूप में ऊर्जा बर्बाद होती है। उचित संधारित्र लगाकर शक्ति गुणांक बढ़ाते हैं।
वाटहीन धारा
धारा के फेज़र को दो भागों में बाँटिए: वोल्टता के अनुदिश I cos φ और उससे 90° पर I sin φ।
भाग Irms sin φ कोई औसत कार्य नहीं करता, क्योंकि यह वोल्टता से 90° कला में अलग है। इसे वाटहीन धारा कहते हैं। शुद्ध प्रेरक या संधारित्र में पूरी धारा वाटहीन है। पंखे के रेगुलेटर की चोक कुंडली इसी से लगभग बिना ऊर्जा हानि के धारा घटाती है।
करके देखें: एक प्रयोग
करके देखें: 3D में "LCR श्रेणी" चुनें, 30 Hz से शुरू करें। स्लाइडर हिलाने से पहले अनुमान लगाइए: 50 Hz की ओर जाने पर धारा बढ़ेगी या घटेगी? अब धीरे-धीरे खिसकाएँ और Irms देखें। जिस आवृत्ति पर बैंगनी "अनुनाद" टैग आए उसे लिखें और f₀ = 1/(2π√LC) = 1/(2π√(0.2 × 50×10⁻⁶)) ≈ 50 Hz से मिलाएँ। फिर "केवल L" चुनकर देखें कि P = 0 W है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- V = V₀ sin ωt, I = I₀ sin(ωt − φ), ω = 2πf
- I_rms = I₀/√2 ≈ 0.707 I₀; V_rms = V₀/√2
- प्रेरकीय प्रतिघात: Xʟ = ωL = 2πfL
- धारितीय प्रतिघात: Xᴄ = 1/(ωC) = 1/(2πfC)
- प्रतिबाधा: Z = √(R² + (Xʟ − Xᴄ)²)
- कलांतर: tan φ = (Xʟ − Xᴄ)/R
- अनुनाद: ω₀ = 1/√(LC), f₀ = 1/(2π√LC), Z = R
- गुणता गुणांक: Q = ω₀L/R
- औसत शक्ति: P = V_rms I_rms cos φ; शक्ति गुणांक cos φ = R/Z
- वाटहीन धारा = I_rms sin φ
हल किए गए उदाहरण
1. मेन सप्लाई 230 V rms है। शिखर मान ज्ञात करें।
V₀ = √2 × 230 = 1.414 × 230 ≈ 325 V।
2. 100 Ω का प्रतिरोध 220 V, 50 Hz AC से जुड़ा है। I_rms, I₀ और शक्ति ज्ञात करें।
I_rms = 220/100 = 2.2 A। I₀ = √2 × 2.2 ≈ 3.11 A। P = 220 × 2.2 = 484 W (φ = 0)।
3. 50 Hz पर 0.5 H प्रेरक का प्रतिघात और 220 V से rms धारा ज्ञात करें।
Xʟ = 2πfL = 2 × 3.14 × 50 × 0.5 ≈ 157 Ω। I_rms = 220/157 ≈ 1.4 A। शक्ति = 0 (धारा 90° पीछे)।
4. 50 Hz पर 20 µF संधारित्र का प्रतिघात ज्ञात करें।
Xᴄ = 1/(2 × 3.14 × 50 × 20 × 10⁻⁶) = 1/0.00628 ≈ 159 Ω।
5. श्रेणी LCR में R = 30 Ω, Xʟ = 80 Ω, Xᴄ = 40 Ω, V_rms = 200 V। Z, I, φ और शक्ति गुणांक ज्ञात करें।
Z = √(900 + 1600) = 50 Ω। I = 200/50 = 4 A। tan φ = 40/30, φ ≈ 53° (धारा पीछे)। cos φ = 30/50 = 0.6।
6. ऊपर के परिपथ के लिए औसत शक्ति और वाटहीन धारा ज्ञात करें।
P = 200 × 4 × 0.6 = 480 W (जाँच: I²R = 16 × 30 = 480 W)। sin φ = 0.8, वाटहीन धारा = 4 × 0.8 = 3.2 A।
7. L = 0.1 H, C = 10 µF और R = 10 Ω श्रेणी में हैं। अनुनाद आवृत्ति और 100 V से अनुनाद पर धारा ज्ञात करें।
ω₀ = 1/√(10⁻⁶) = 1000 rad/s। f₀ = 1000/(2π) ≈ 159 Hz। अनुनाद पर Z = R = 10 Ω, तो I = 10 A।
8. ऊपर के अनुनाद परिपथ के लिए Q और प्रेरक पर वोल्टता ज्ञात करें।
Q = ω₀L/R = 1000 × 0.1/10 = 10। Xʟ = 100 Ω, Vʟ = 10 × 100 = 1000 V, सप्लाई का दस गुना! Vᴄ भी 1000 V है और दोनों कट जाते हैं।
आम गलतियाँ
- LCR में वोल्टताओं को सीधे जोड़ना (Vʀ + Vʟ + Vᴄ)। वे अलग कला में हैं; फेज़र की तरह जोड़ें।
- P = VI cos φ में शिखर मान लगाना। rms मान लगाएँ (या P = ½ V₀ I₀ cos φ)।
- सोचना कि प्रेरक DC के लिए बड़ा प्रतिघात रखता है। DC में ω = 0, तो Xʟ = 0; DC को संधारित्र रोकता है।
- कहना कि अनुनाद पर धारा शून्य होती है। अनुनाद पर Z सबसे कम है, इसलिए धारा सबसे अधिक।