विद्युत विभव और विभवांतर
विद्युत बल संरक्षी है: A से B तक आवेश ले जाने का कार्य रास्ते पर निर्भर नहीं करता। इसलिए हर बिंदु को एक 'ऊँचाई' दी जा सकती है — विभव।
किसी बिंदु पर विभव V = इकाई धन आवेश को अनंत से उस बिंदु तक धीरे-धीरे (बिना त्वरण) लाने में बाहरी कार्य। V = W/q। मात्रक वोल्ट (1 V = 1 J/C)। यह अदिश है।
विभवांतर V_B − V_A = W_AB/q।
क्षेत्र से संबंध: E = −dV/dr। क्षेत्र ऊँचे विभव से नीचे विभव की ओर, सबसे तेज़ ढलान पर। एकसमान क्षेत्र में V = Ed।
बिंदु आवेश, द्विध्रुव और आवेशों के निकाय का विभव
बिंदु आवेश
इकाई आवेश को ∞ से r तक लाने का कार्य → V = kq/r। +q के पास धनात्मक, −q के पास ऋणात्मक, अनंत पर शून्य।
द्विध्रुव
दूर के बिंदु पर (दूरी r, अक्ष से कोण θ): V = kp cosθ / r²।
- अक्ष पर (θ = 0): V = kp/r² (अधिकतम)।
- निरक्ष रेखा पर (θ = 90°): V = 0, जबकि वहाँ E शून्य नहीं।
आवेशों का निकाय
विभव अदिश है, इसलिए चिह्न सहित सीधा जोड़ो: V = k(q₁/r₁ + q₂/r₂ + …)। न तीर, न कोण।
आवेशित गोलीय कोश
बाहर V = kq/r; अंदर और सतह पर V = kq/R, हर जगह बराबर (क्योंकि अंदर E = 0)।
समविभव पृष्ठ
समविभव पृष्ठ वह सतह है जिसके हर बिंदु पर विभव बराबर हो।
- इस पर आवेश चलाने में कार्य शून्य (ΔV = 0)।
- E हमेशा इसके लंबवत।
- दो समविभव सतहें कभी नहीं कटतीं।
- जहाँ सतहें पास-पास, वहाँ क्षेत्र तेज़।
आकृतियाँ: बिंदु आवेश → संकेंद्री गोले; एकसमान क्षेत्र → E के लंबवत समांतर तल; द्विध्रुव → वक्र सतहें, बीच का तल V = 0। संतुलन में चालक की सतह समविभव होती है।
दो आवेशों तथा क्षेत्र में द्विध्रुव की स्थितिज ऊर्जा
दो आवेश
q₂ को ∞ से q₁ से r दूरी तक लाने का कार्य जमा होता है: U = kq₁q₂/r। समान आवेश: U > 0; असमान: U < 0 (बंधा निकाय)। तीन आवेशों में हर जोड़ी की ऊर्जा जोड़ो।
बाहरी क्षेत्र में आवेश
U = qV(r)।
एकसमान क्षेत्र में द्विध्रुव
θ₁ से θ₂ तक घुमाने का कार्य W = pE(cosθ₁ − cosθ₂)। θ = 90° पर U = 0 मानकर: U = −pE cosθ = −p·E।
- θ = 0°: U = −pE न्यूनतम → स्थायी।
- θ = 180°: U = +pE अधिकतम → अस्थायी।
- 0° से 180° पलटने का कार्य = 2pE।
चालक और कुचालक (विद्युतरोधी)
चालकों (धातुओं) में बहुत से मुक्त इलेक्ट्रॉन होते हैं; कुचालक अपने इलेक्ट्रॉनों को कसकर पकड़े रहते हैं।
चालकों की स्थिरवैद्युतिकी
- चालक के अंदर E = 0।
- सतह के ठीक बाहर E सतह के लंबवत।
- कुल आवेश केवल बाहरी सतह पर।
- पूरा चालक एक ही विभव पर।
- सतह पर E = σ/ε₀; नुकीले सिरों पर आवेश घना।
- खोखले चालक के अंदर E = 0 — स्थिरवैद्युत परिरक्षण। इसी से कार या धातु का पिंजरा बिजली से बचाता है।
मुक्त और बंधे (बद्ध) आवेश
मुक्त आवेश पूरे पदार्थ में घूम सकते हैं — धातु के बाहरी इलेक्ट्रॉन। ये धारा ले जाते हैं और तब तक खिसकते हैं जब तक अंदर E शून्य न हो जाए।
बंधे आवेश अपने परमाणु/अणु से बँधे रहते हैं। क्षेत्र में ये बस थोड़ा खिसकते या घूमते हैं, बहते नहीं; फिर भी परावैद्युत की सतहों पर आवेश बना देते हैं।
परावैद्युत और ध्रुवण
परावैद्युत वह कुचालक है जो क्षेत्र में ध्रुवित हो जाता है (काँच, अभ्रक, कागज़, पानी)।
- अध्रुवी अणु (O₂, N₂, CO₂): + और − के केंद्र एक ही जगह। क्षेत्र उन्हें थोड़ा अलग करता है → प्रेरित द्विध्रुव।
- ध्रुवी अणु (H₂O, HCl): पहले से द्विध्रुव, बेतरतीब दिशाओं में। क्षेत्र उन्हें कुछ हद तक एक पंक्ति में लाता है।
ध्रुवण P = प्रति इकाई आयतन द्विध्रुव आघूर्ण। पंक्तिबद्ध द्विध्रुव एक सतह पर − और दूसरी पर + आवेश छोड़ते हैं, जो E₀ के उल्टा क्षेत्र बनाते हैं। इसलिए अंदर E = E₀/K। K (परावैद्युतांक) = ε/ε₀ > 1 (पानी के लिए ≈ 80)।
संधारित्र और धारिता
संधारित्र = कुचालक से अलग किए गए दो चालक। +Q और −Q देने पर विभवांतर V बनता है और Q ∝ V। C = Q/V धारिता है। मात्रक फ़ैरड (1 F = 1 C/V), बहुत बड़ा — असल में µF, nF, pF। C केवल आकार, दूरी और बीच के पदार्थ पर निर्भर है, Q या V पर नहीं।
परावैद्युत सहित और रहित समांतर प्लेट संधारित्र
क्षेत्रफल A, दूरी d की दो प्लेटें। बीच में एकसमान क्षेत्र E = σ/ε₀ = Q/(ε₀A); V = Ed = Qd/(ε₀A)। इसलिए
C₀ = ε₀A/d (निर्वात/हवा)।
पूरा परावैद्युत भरा हो
क्षेत्र E₀/K, उसी Q के लिए V भी K गुना कम: C = Kε₀A/d = KC₀।
t मोटाई की पट्टी (t < d)
C = ε₀A / (d − t + t/K)। धातु की पट्टी (K → ∞) के लिए C = ε₀A/(d − t)।
बैटरी जुड़ी है या नहीं?
- जुड़ी हो (V स्थिर): C, Q और U, K गुना बढ़ते हैं।
- हटा दी हो (Q स्थिर): C, K गुना बढ़ती; V और U, K गुना घटते हैं।
संधारित्रों का संयोजन: श्रेणी और पार्श्व क्रम
श्रेणी क्रम
हर संधारित्र पर एक ही आवेश Q। वोल्टता जुड़ती है: V = Q/C₁ + Q/C₂ + …। इसलिए 1/C = 1/C₁ + 1/C₂ + 1/C₃ + …। C_eq सबसे छोटे से भी छोटी। दो के लिए C = C₁C₂/(C₁ + C₂)।
पार्श्व (समांतर) क्रम
हर संधारित्र पर एक ही V। आवेश जुड़ते हैं। इसलिए C = C₁ + C₂ + C₃ + …।
ध्यान दो: यह प्रतिरोधों का उल्टा है।
संधारित्र में संचित ऊर्जा
संधारित्र भरते समय बढ़ती वोल्टता के विरुद्ध आवेश धकेलना पड़ता है। यह कार्य प्लेटों के बीच क्षेत्र में ऊर्जा बनकर जमा होता है:
U = ½CV² = Q²/(2C) = ½QV।
ऊर्जा घनत्व u = ½ε₀E²। पाठ्यक्रम में केवल सूत्र माँगा गया है।
घर पर करके देखो
फ़ोन को रसोई की एल्युमिनियम फ़ॉयल की दो परतों में पूरी तरह लपेटो (कोई छेद नहीं) और उस पर कॉल करो। अक्सर कॉल नहीं लगती: फ़ॉयल चालक कोश है और अंदर को परिरक्षित करती है। खोलो तो कॉल आ जाती है।
3D में d = 2 mm से 4 mm करो: C आधी। फिर K = 5 करो: C पाँच गुना।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- V = W/q; V_B − V_A = W_AB/q; E = −dV/dr
- बिंदु आवेश V = kq/r; द्विध्रुव V = kp cosθ / r²
- निकाय: V = k Σ qᵢ/rᵢ
- U (दो आवेश) = kq₁q₂/r; U (द्विध्रुव) = −pE cosθ
- C = Q/V; समांतर प्लेट C = Kε₀A/d
- पट्टी: C = ε₀A/(d − t + t/K)
- श्रेणी 1/C = 1/C₁ + 1/C₂ + …; पार्श्व C = C₁ + C₂ + …
- U = ½CV² = Q²/2C = ½QV
हल किए गए उदाहरण
1. +4 nC आवेश से 9 cm पर विभव?
V = 9 × 10⁹ × 4 × 10⁻⁹ / 0.09 = 400 V।
2. 2 µC आवेश को 10 V वाले बिंदु से 60 V वाले बिंदु तक ले जाने का कार्य?
W = q(V_B − V_A) = 2 × 10⁻⁶ × 50 = 1 × 10⁻⁴ J।
3. 6 cm रेखा के सिरों पर +3 nC और −3 nC। मध्य बिंदु पर V और क्या वहाँ E शून्य है?
V = k(3 × 10⁻⁹)/0.03 − k(3 × 10⁻⁹)/0.03 = 0। पर E शून्य नहीं: दोनों क्षेत्र −3 nC की ओर, इसलिए जुड़ते हैं।
4. 20 cm दूर +2 µC और −4 µC की स्थितिज ऊर्जा?
U = 9 × 10⁹ × 2 × 10⁻⁶ × (−4 × 10⁻⁶)/0.2 = −0.36 J (ऋणात्मक: आकर्षण, बंधा निकाय)।
5. p = 2 × 10⁻⁸ C m का द्विध्रुव 5 × 10⁴ N/C क्षेत्र के समांतर है। 180° घुमाने का कार्य?
W = 2pE = 2 × 2 × 10⁻⁸ × 5 × 10⁴ = 2 × 10⁻³ J।
6. 0.02 m² प्लेटें, हवा में दूरी 1 mm। C? अभ्रक (K = 6) भरने पर?
C₀ = 8.85 × 10⁻¹² × 0.02 / 10⁻³ = 177 pF। अभ्रक से 6 × 177 = 1062 pF ≈ 1.06 nF।
7. 2 µF, 3 µF, 6 µF श्रेणी में 12 V से जुड़े। C_eq, Q और हर एक पर V?
1/C = 1/2 + 1/3 + 1/6 = 1 → C = 1 µF। Q = 12 µC (सब पर)। V₁ = 6 V, V₂ = 4 V, V₃ = 2 V।
8. वही तीनों पार्श्व में 12 V से। C_eq, आवेश और ऊर्जा?
C = 11 µF। Q₁ = 24, Q₂ = 36, Q₃ = 72 µC। U = ½ × 11 × 10⁻⁶ × 144 = 7.92 × 10⁻⁴ J।
9. 10 µF संधारित्र 100 V तक भरकर बैटरी हटा दी। अब K = 5 की पट्टी पूरी भर दी। नई C, V और ऊर्जा?
Q = 1 mC स्थिर। C = 50 µF, V = 20 V। U पहले 0.05 J, बाद में 0.01 J (K गुना कम)।
10. A क्षेत्रफल, d दूरी वाले संधारित्र में K = 4, मोटाई d/2 की पट्टी। नई C की C₀ से तुलना?
C = ε₀A/(d − d/2 + d/8) = ε₀A/(5d/8) = 1.6 C₀।
आम गलतियाँ
- विभवों को सदिश की तरह जोड़ना — विभव अदिश है, बस चिह्न सहित जोड़ो।
- V = 0 का मतलब E = 0 समझना (द्विध्रुव की निरक्ष रेखा पर V = 0 पर E ≠ 0), या E = 0 का मतलब V = 0 (कोश के अंदर V स्थिर है, शून्य नहीं)।
- संधारित्रों पर प्रतिरोध वाले नियम लगाना — श्रेणी में 1/C जुड़ते हैं, पार्श्व में C।
- यह भूलना कि परावैद्युत डालते समय बैटरी जुड़ी है या नहीं: जुड़ी हो तो V स्थिर, हटी हो तो Q स्थिर।