चुंबक, चुंबकीय क्षेत्र और दिक्सूचक
हर चुंबक के दो सिरे होते हैं जिन्हें ध्रुव कहते हैं: उत्तरोमुखी ध्रुव (N) और दक्षिणोमुखी ध्रुव (S)। समान ध्रुव एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं और असमान ध्रुव आकर्षित करते हैं। चुंबक के आसपास का वह स्थान जहाँ उसका बल महसूस होता है, उसका चुंबकीय क्षेत्र कहलाता है। इसमें परिमाण और दिशा दोनों होते हैं, इसलिए यह सदिश राशि है।
दिक्सूचक (कम्पास) असल में एक छोटा चुंबक (सुई) है जो आसानी से घूम सकता है। उसका N सिरा उस जगह के क्षेत्र की दिशा में ठहरता है। पास में कोई चुंबक या धारा न हो तो यह पृथ्वी के भौगोलिक उत्तर की ओर रहता है, क्योंकि पृथ्वी खुद एक बड़े चुंबक जैसी है।
क्षेत्र दिखाई नहीं देता, इसलिए हम चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ खींचते हैं: वह रास्ता जिस पर एक छोटा स्वतंत्र उत्तर ध्रुव चलेगा। चुंबक के ऊपर गत्ते पर लोहे का बुरादा छिड़ककर हल्का ठोको, बुरादा इन्हीं रेखाओं में सज जाता है।
चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं के गुण
- दिशा: चुंबक के बाहर N से S की ओर, और चुंबक के अंदर S से वापस N की ओर।
- बंद वक्र: इसलिए हर रेखा एक बंद लूप है, जिसका न शुरुआत है न अंत।
- कभी नहीं कटतीं: अगर दो रेखाएँ कटें तो उस बिंदु पर दिक्सूचक को एक साथ दो दिशाओं में इशारा करना पड़ेगा, जो असंभव है।
- घनत्व = प्रबलता: जहाँ रेखाएँ पास-पास हैं वहाँ क्षेत्र प्रबल है (ध्रुवों के पास), जहाँ फैली हैं वहाँ दुर्बल।
- किसी बिंदु पर रेखा की स्पर्श रेखा उस बिंदु पर क्षेत्र की दिशा बताती है।
सीधे धारावाही चालक के चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र
1820 में हैंस क्रिश्चियन ऑर्स्टेड ने देखा कि पास के तार में धारा बहते ही दिक्सूचक की सुई घूम जाती है। इससे पता चला कि विद्युत धारा चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करती है, यानी विद्युत और चुंबकत्व आपस में जुड़े हैं।
लंबे सीधे तार के चारों ओर क्षेत्र रेखाएँ तार को केंद्र मानकर संकेंद्री वृत्त होती हैं, जो तार के लंबवत तलों में होती हैं।
दक्षिण-हस्त अंगुष्ठ नियम
तार को दाएँ हाथ में ऐसे पकड़ो कि अँगूठा धारा की दिशा में हो। मुड़ी हुई उँगलियाँ क्षेत्र रेखाओं की दिशा बताती हैं। धारा उलटो तो क्षेत्र भी उलट जाता है और दिक्सूचक दूसरी ओर घूमता है।
क्षेत्र की प्रबलता किस पर निर्भर है
धारा जितनी अधिक, क्षेत्र उतना प्रबल; और तार से दूर जाने पर क्षेत्र दुर्बल होता है। तार के पास वृत्त घने हैं, दूर जाकर फैल जाते हैं। (क्षेत्र धारा के अनुक्रमानुपाती और दूरी के व्युत्क्रमानुपाती है।)
वृत्ताकार पाश (लूप) के कारण चुंबकीय क्षेत्र
सीधे तार को मोड़कर वृत्त बना दो। लूप का हर छोटा हिस्सा अपने चारों ओर वृत्त बनाता है। तार के पास ये छोटे वृत्त हैं, केंद्र की ओर बड़े होते जाते हैं, और केंद्र पर लूप के सभी हिस्सों की रेखाएँ एक ही दिशा में होकर लगभग सीधी रेखा जैसी दिखती हैं।
धारा या फेरों की संख्या बढ़ाने पर केंद्र पर क्षेत्र प्रबल होता है (n फेरे = एक फेरे का लगभग n गुना)। छोटी त्रिज्या का लूप भी केंद्र पर प्रबल क्षेत्र देता है। किसी मुख से देखने पर वामावर्त धारा उस मुख को N ध्रुव और दक्षिणावर्त धारा S ध्रुव बनाती है।
परिनालिका: छड़ चुंबक जैसी कुंडली
परिनालिका (solenoid) विद्युतरोधी ताँबे के तार के पास-पास लिपटे अनेक फेरों वाली लंबी बेलनाकार कुंडली है। धारा बहने पर इसका क्षेत्र-पैटर्न छड़ चुंबक जैसा होता है: एक सिरा N और दूसरा S की तरह काम करता है।
लंबी परिनालिका के अंदर क्षेत्र रेखाएँ सीधी, समांतर और बराबर दूरी पर होती हैं। इसका मतलब अंदर क्षेत्र एकसमान है: हर बिंदु पर एक ही परिमाण और दिशा। N सिरा जानने के लिए दाएँ हाथ की उँगलियाँ फेरों में धारा की दिशा में मोड़ो, अँगूठा N सिरे की ओर होगा।
क्षेत्र प्रबल होता है: (1) फेरे बढ़ाने से, (2) धारा बढ़ाने से, (3) अंदर नर्म लोहे की क्रोड रखने से।
विद्युत चुंबक बनाम स्थायी चुंबक
परिनालिका के अंदर नर्म लोहे की छड़ रखकर धारा बहाओ, तो छड़ प्रबल चुंबक बन जाती है। इसे विद्युत चुंबक कहते हैं। धारा बंद करते ही इसका चुंबकत्व लगभग खत्म हो जाता है।
| विद्युत चुंबक | स्थायी चुंबक |
|---|---|
| केवल धारा बहने तक चुंबक | हमेशा चुंबकित रहता है |
| प्रबलता बदली जा सकती है (धारा, फेरे) | प्रबलता निश्चित |
| धारा उलटकर ध्रुव उलटे जा सकते हैं | ध्रुव निश्चित |
| क्रोड: नर्म लोहा | स्टील, ऐल्निको, फेराइट, नियोडिमियम से बनता है |
| बहुत प्रबल बनाया जा सकता है | आमतौर पर कम प्रबल |
उपयोग: कबाड़ उठाने वाली क्रेन, बिजली की घंटी, रिले, लाउडस्पीकर, मोटर, MRI मशीन और मैग्लेव ट्रेन। स्थायी चुंबक के लिए स्टील लिया जाता है क्योंकि वह चुंबकत्व बनाए रखता है; विद्युत चुंबक के लिए नर्म लोहा, क्योंकि वह जल्दी चुंबकत्व खो देता है।
बोर्ड परीक्षा में क्या पूछा जाता है
क्षेत्र रेखाओं के चित्र (छड़ चुंबक, सीधा तार, लूप, परिनालिका), दक्षिण-हस्त अंगुष्ठ नियम, रेखाएँ क्यों नहीं कटतीं, क्षेत्र की प्रबलता किन बातों पर निर्भर है, और विद्युत चुंबक व स्थायी चुंबक में अंतर। ये आमतौर पर 1 से 3 अंक के प्रश्न होते हैं; चित्र में दिशा के तीर जरूर बनाओ, उन पर अंक मिलते हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- सीधा तार: क्षेत्र B ∝ I और B ∝ 1/r (r = तार से दूरी)
- वृत्ताकार लूप (केंद्र पर): B ∝ n I / r (n फेरे, त्रिज्या r)
- परिनालिका (अंदर): B ∝ प्रति एकांक लंबाई फेरे × I; क्षेत्र एकसमान
- चुंबकीय क्षेत्र का SI मात्रक: टेस्ला (T)
- दक्षिण-हस्त अंगुष्ठ नियम: अँगूठा = धारा, मुड़ी उँगलियाँ = क्षेत्र
- कुंडली का मुख: वामावर्त धारा = N, दक्षिणावर्त धारा = S
हल किए गए उदाहरण
1. एक खड़े तार के ठीक पूर्व में दिक्सूचक रखा है। तार में धारा ऊपर की ओर है। ऊपर से देखने पर सुई का N सिरा किधर होगा?
दक्षिण-हस्त अंगुष्ठ नियम: अँगूठा ऊपर, तो ऊपर से देखने पर उँगलियाँ वामावर्त मुड़ती हैं। पूर्व वाली जगह पर वामावर्त चलना उत्तर की ओर है। इसलिए N सिरा उत्तर की ओर रहेगा (यहाँ तार का और पृथ्वी का क्षेत्र एक ही दिशा में हैं)।
2. लंबे सीधे तार से 5 cm पर क्षेत्र B है। यदि दूरी 10 cm कर दें और साथ में धारा दोगुनी कर दें, तो क्षेत्र कितना होगा?
B ∝ I/r। धारा दोगुनी से B दोगुना, दूरी दोगुनी से B आधा। कुल 2 × ½ = 1, यानी क्षेत्र B ही रहेगा।
3. कुंडली के एक मुख पर धारा दक्षिणावर्त दिख रही है। यह मुख कौन-सा ध्रुव है? धारा उलटने पर क्या होगा?
दक्षिणावर्त धारा से वह मुख S ध्रुव है। धारा उलटने पर वह वामावर्त हो जाएगी और मुख N ध्रुव बन जाएगा।
4. कुंडली की लंबाई बदले बिना परिनालिका का क्षेत्र प्रबल करने के दो तरीके बताओ।
धारा बढ़ाओ, फेरे बढ़ाओ, या अंदर नर्म लोहे की क्रोड रखो। इनमें से कोई दो।
5. लंबी परिनालिका के अंदर क्षेत्र एकसमान क्यों होता है, जबकि एक फेरे वाले लूप में नहीं?
लंबी परिनालिका में बहुत से फेरों के क्षेत्र साथ-साथ जुड़ते हैं। अंदर रेखाओं को मोड़ने वाले हिस्से एक-दूसरे को रद्द कर देते हैं, इसलिए रेखाएँ सीधी, समांतर और बराबर दूरी पर हो जाती हैं। एक लूप में रेखाएँ केवल केंद्र के पास सीधी होती हैं, बाकी जगह मुड़ी रहती हैं।
आम गलतियाँ
- ऐसी रेखाएँ बनाना जो एक-दूसरे को काटें या हवा में शुरू-खत्म हों। क्षेत्र रेखाएँ हमेशा बंद लूप होती हैं और कभी नहीं कटतीं।
- अंगुष्ठ नियम के लिए बायाँ हाथ लेना। तार के क्षेत्र की दिशा के लिए दक्षिण-हस्त (दायाँ हाथ) अंगुष्ठ नियम है; फ्लेमिंग का वाम-हस्त नियम तार पर लगने वाले बल के लिए है (अगला पाठ)।
- यह कहना कि छड़ चुंबक के अंदर रेखाएँ N से S जाती हैं। अंदर वे S से N जाती हैं; केवल बाहर N से S।
- यह समझना कि नर्म लोहे की क्रोड स्थायी चुंबक बनाती है। धारा बंद होते ही नर्म लोहा चुंबकत्व खो देता है; स्टील उसे बनाए रखता है।