CBSE कक्षा 12 भौतिकी
अध्याय: 9
1. स्थिरवैद्युतिकी
वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र · स्थिरवैद्युत विभव तथा धारिता
- वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र – आवेश दो तरह का होता है, संरक्षित रहता है और e = 1.6 × 10⁻¹⁹ C के पूरे पैकेटों में आता है। दो बिंदु आवेश F = kq₁q₂/r² बल से धकेलते या खींचते हैं (k = 9 × 10⁹ N m² C⁻²)। कई आवेशों के बल और क्षेत्र सदिश की तरह जुड़ते हैं (अध्यारोपण)। बिंदु आवेश का क्षेत्र E = kq/r² है। द्विध्रुव (±q, दूरी 2a) का आघूर्ण p = q·2a है; एकसमान क्षेत्र में उस पर कुल बल शून्य पर बल-आघूर्ण τ = pE sinθ होता है। फ्लक्स Φ = E·A, और गाउस नियम: किसी बंद सतह से कुल फ्लक्स = अंदर का आवेश/ε₀। इससे तार (λ/2πε₀r), समतल चादर (σ/2ε₀) और पतले गोलीय कोश (बाहर kq/r², अंदर 0) का क्षेत्र मिलता है।
- स्थिरवैद्युत विभव तथा धारिता – किसी बिंदु पर विभव V = इकाई धन आवेश को अनंत से उस बिंदु तक लाने में किया गया कार्य। बिंदु आवेश के लिए V = kq/r; कई आवेशों के विभव सीधे (अदिश) जुड़ते हैं। विभवांतर V_B − V_A = W/q। समविभव सतहों पर V बराबर होता है; E उनके लंबवत और E = −dV/dr। दो आवेशों की स्थितिज ऊर्जा U = kq₁q₂/r, द्विध्रुव की U = −pE cosθ। चालक में मुक्त आवेश (अंदर E = 0), परावैद्युत में बंधे आवेश ध्रुवित होकर क्षेत्र को E₀/K कर देते हैं। संधारित्र Q = CV; समांतर प्लेट C = ε₀A/d, परावैद्युत के साथ KC। श्रेणी: 1/C = 1/C₁ + 1/C₂ + …; पार्श्व: C = C₁ + C₂ + …। संचित ऊर्जा U = ½CV² = Q²/2C।
2. विद्युत धारा
विद्युत धारा
- धातु में धारा: अपवाह वेग और गतिशीलता – धातु में मुक्त इलेक्ट्रॉन बहुत तेज़ी से पर बेतरतीब (random) दिशाओं में भागते हैं, इसलिए औसतन कहीं नहीं जाते। विद्युत क्षेत्र लगाने पर उन्हें क्षेत्र के उल्टी दिशा में एक छोटा, स्थिर खिसकाव मिलता है: अपवाह वेग vd = eEτ/m. धारा I = n e A vd और धारा घनत्व j = n e vd. गतिशीलता μ = vd/E बताती है कि आवेश कितनी आसानी से खिसकता है। अपवाह वेग लगभग 1 mm/s ही है, फिर भी बल्ब तुरंत जलता है क्योंकि क्षेत्र पूरे तार में लगभग तुरंत बन जाता है।
- विद्युत वाहक बल, आंतरिक प्रतिरोध, शक्ति और सेलों का संयोजन – सेल आवेशों पर कार्य करता है; प्रति कूलॉम कार्य उसका विद्युत वाहक बल (emf) ε है। सेल के अंदर एक छोटा आंतरिक प्रतिरोध r होता है। धारा I बहने पर टर्मिनल वोल्टता V = ε − Ir और I = ε/(R + r). विद्युत शक्ति P = VI = I²R = V²/R, ऊर्जा W = Pt. R = r होने पर R को अधिकतम शक्ति मिलती है। श्रेणी में: εeq = ε1 + ε2, req = r1 + r2. समांतर में: εeq = (ε1r2 + ε2r1)/(r1 + r2), 1/req = 1/r1 + 1/r2.
- किरचॉफ के नियम और व्हीटस्टोन सेतु – संधि नियम: किसी भी संधि पर आने वाली धाराओं का योग = जाने वाली धाराओं का योग (ΣI = 0), क्योंकि आवेश संरक्षित है। लूप नियम: किसी भी बंद लूप में विभव परिवर्तनों का बीजगणितीय योग शून्य (ΣΔV = 0), क्योंकि ऊर्जा संरक्षित है। चिह्न: धारा की दिशा में प्रतिरोधक पार करने पर −IR; सेल को − से + पार करने पर +ε. चार प्रतिरोधकों P, Q, R, S वाला व्हीटस्टोन सेतु तब संतुलित होता है (गैल्वेनोमीटर में धारा नहीं) जब P/Q = R/S; इससे अज्ञात प्रतिरोध ज्ञात होता है, जैसे मीटर सेतु में।
- ओम का नियम, प्रतिरोधकता और ताप का प्रभाव – अपवाह वेग से V = IR मिलता है, जहाँ R = ml/(ne²τA) = ρl/A. प्रतिरोधकता ρ = m/(ne²τ) सिर्फ़ पदार्थ और ताप पर निर्भर है; चालकता σ = 1/ρ. सदिश रूप: j = σE. धातु के तार और प्रतिरोधक सीधी V–I रेखा देते हैं (ओमीय); बल्ब, डायोड और GaAs जैसे युक्तियाँ मुड़ा या एकदिशीय ग्राफ़ देती हैं (अनओमीय)। धातुओं में ताप बढ़ने पर ρ बढ़ता है: ρT = ρ0[1 + α(T − T0)]; नाइक्रोम जैसी मिश्रधातुओं में बहुत कम बदलता है; अर्धचालकों में ρ घटता है।
3. विद्युत धारा के चुंबकीय प्रभाव और चुंबकत्व
गतिमान आवेश और चुंबकत्व · चुंबकत्व एवं द्रव्य
- लॉरेंज़ बल, धारा लूप पर बल-आघूर्ण और चल कुंडली गैल्वेनोमीटर – वेग v से चलते आवेश q पर बल F = q(E + v × B) लगता है, यही लॉरेंज़ बल है। चुंबकीय भाग qvB sinθ हमेशा v के लंबवत है, इसलिए पथ वृत्त बन जाता है (r = mv/qB) और चाल नहीं बदलती। तार पर F = IL × B। एक दिशा की समांतर धाराएँ आकर्षित करती हैं: F/L = μ₀I₁I₂/2πd। क्षेत्र में लूप पर बल-आघूर्ण τ = m × B, m = NIA, यानी लूप चुंबकीय द्विध्रुव है। गैल्वेनोमीटर में विक्षेप φ = (NAB/k)I। छोटा शंट ऐमीटर बनाता है, बड़ा श्रेणी प्रतिरोध वोल्टमीटर।
- धारा के कारण चुंबकीय क्षेत्र: बायो-सावर्ट नियम और ऐम्पियर नियम – धारा अपने चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र बनाती है (ऑर्स्टेड, 1820)। बायो-सावर्ट नियम तार के छोटे टुकड़े का क्षेत्र देता है: dB = (μ₀/4π)·I dl sinθ / r²। वृत्ताकार लूप के केंद्र पर B = μ₀NI / 2R और अक्ष पर B = μ₀NIR² / 2(R² + x²)^{3/2}। ऐम्पियर का परिपथीय नियम ∮B·dl = μ₀I लंबे सीधे तार के लिए B = μ₀I / 2πr देता है। लंबी परिनालिका के अंदर क्षेत्र प्रबल और एकसमान है: B = μ₀nI।
- चुंबकत्व एवं द्रव्य – छड़ चुंबक परिनालिका जैसा व्यवहार करता है: इसके अंदर इलेक्ट्रॉनों के छोटे धारा लूप एक दिशा में होते हैं। समान दूरी पर अक्ष पर क्षेत्र निरक्ष (विषुवत) पर क्षेत्र का दोगुना और उलटी दिशा में होता है। एकसमान क्षेत्र में चुंबक पर बल-आघूर्ण τ = m × B लगता है। क्षेत्र रेखाएँ बंद लूप हैं, कभी नहीं कटतीं। प्रतिचुंबकीय पदार्थ क्षेत्र से बाहर धकेले जाते हैं (χ छोटा ऋण), अनुचुंबकीय थोड़े खिंचते हैं (χ छोटा धन), लौहचुंबकीय बहुत खिंचते हैं (χ बहुत बड़ा)। चुंबकन M = प्रति एकांक आयतन चुंबकीय आघूर्ण; B = μ₀(H + M), χ = M/H, μᵣ = 1 + χ। ताप बढ़ने पर चुंबकत्व घटता है: क्यूरी नियम χ = C/T; क्यूरी ताप से ऊपर लौहचुंबक अनुचुंबक बन जाता है।
4. विद्युत चुंबकीय प्रेरण और प्रत्यावर्ती धारा
वैद्युत चुंबकीय प्रेरण · प्रत्यावर्ती धारा
- विद्युत चुंबकीय प्रेरण – जब किसी कुंडली से गुजरने वाला चुंबकीय फ्लक्स बदलता है, तो उसमें emf पैदा होता है: ε = −N dΦ/dt (फैराडे)। ऋण चिह्न लेन्ज़ का नियम है: प्रेरित धारा हमेशा उस बदलाव का विरोध करती है जिससे वह बनी। चुंबकीय क्षेत्र में छड़ चलाने पर गतिक emf ε = Blv मिलता है। बदलती धारा अपनी ही कुंडली में (स्वप्रेरण, L) और पास की कुंडली में (अन्योन्य प्रेरण, M) emf बनाती है।
- AC जनित्र और ट्रांसफ़ॉर्मर – AC जनित्र चुंबकीय क्षेत्र में एक कुंडली घुमाता है। उससे गुजरता फ्लक्स लगातार बदलता है, इसलिए emf e = NBAω sin ωt बनता है, शिखर NBAω। ट्रांसफ़ॉर्मर एक लोहे के क्रोड पर लिपटी दो कुंडलियों के अन्योन्य प्रेरण से चलता है: Vs/Vp = Ns/Np। उच्चायी (स्टेप-अप) वोल्टता बढ़ाता, धारा घटाता है; अपचायी (स्टेप-डाउन) उल्टा। शक्ति लगभग वही रहती है (Vp Ip ≈ Vs Is)।
- प्रत्यावर्ती धारा – प्रत्यावर्ती धारा (AC) बार-बार अपना मान और दिशा बदलती है: I = I₀ sin ωt। इसका rms मान I₀/√2 है, यानी वह स्थिर DC जो उतनी ही गर्मी दे। प्रतिरोध में V और I साथ चलते हैं; प्रेरक में I 90° पीछे (Xʟ = ωL); संधारित्र में I 90° आगे (Xᴄ = 1/ωC)। श्रेणी LCR में Z = √(R² + (Xʟ − Xᴄ)²), Xʟ = Xᴄ पर अनुनाद होता है, और औसत शक्ति P = Vrms Irms cos φ।
5. विद्युत चुंबकीय तरंगें
वैद्युत चुंबकीय तरंगें
- विद्युत चुंबकीय तरंगें – बदलता हुआ विद्युत क्षेत्र धारा जैसा काम करता है। इसे विस्थापन धारा कहते हैं और यह चुंबकीय क्षेत्र बनाती है। बदलता चुंबकीय क्षेत्र विद्युत क्षेत्र बनाता है। दोनों मिलकर विद्युत चुंबकीय तरंग बनकर c = 3 × 10⁸ m/s से चलते हैं, खाली जगह में भी। E और B एक-दूसरे से और चलने की दिशा से 90° पर होते हैं, इसलिए ये तरंगें अनुप्रस्थ हैं। तरंगदैर्घ्य के क्रम में: रेडियो, सूक्ष्म तरंग, अवरक्त, दृश्य, पराबैंगनी, एक्स-किरणें, गामा किरणें।
6. प्रकाशिकी
किरण प्रकाशिकी एवं प्रकाशिक यंत्र · तरंग प्रकाशिकी
- गोलीय दर्पण और दर्पण सूत्र – गोलीय दर्पण एक चमकदार खोखले गोले का टुकड़ा है। इसकी फोकस दूरी वक्रता त्रिज्या की आधी होती है (f = R/2)। कार्तीय चिह्न परिपाटी से वस्तु दूरी u, प्रतिबिंब दूरी v और फोकस दूरी f में संबंध है 1/v + 1/u = 1/f, और आवर्धन m = h′/h = −v/u। अवतल दर्पण की f ऋणात्मक, उत्तल की धनात्मक होती है।
- प्रकाशिक यंत्र: सूक्ष्मदर्शी और दूरदर्शक – कोई चीज़ कितनी बड़ी दिखती है, यह आँख पर बने कोण पर निर्भर है। सरल सूक्ष्मदर्शी (एक उत्तल लेंस) m = 1 + D/f (प्रतिबिंब D पर) या D/f (अनंत पर) देता है। संयुक्त सूक्ष्मदर्शी में छोटी फोकस दूरी का अभिदृश्यक और नेत्रिका: m = mₒ × mₑ ≈ (L/fₒ)(D/fₑ)। खगोलीय दूरदर्शक में लंबी फोकस दूरी का अभिदृश्यक और छोटी की नेत्रिका: सामान्य समायोजन में m = fₒ/fₑ, नली की लंबाई fₒ + fₑ। परावर्ती दूरदर्शक में अभिदृश्यक अवतल दर्पण होता है।
- पतले लेंस: लेंस मेकर सूत्र, लेंस सूत्र और क्षमता – एक गोलीय सतह पर n₂/v − n₁/u = (n₂ − n₁)/R। ऐसी दो सतहें मिलकर पतला लेंस बनाती हैं: 1/f = (n − 1)(1/R₁ − 1/R₂) (लेंस मेकर सूत्र)। वस्तु और प्रतिबिंब दूरी 1/v − 1/u = 1/f मानती हैं, आवर्धन m = v/u, क्षमता P = 1/f (f मीटर में हो तो डायोप्टर में), और संपर्क में रखे पतले लेंसों की क्षमताएँ जुड़ती हैं: P = P₁ + P₂।
- अपवर्तन, पूर्ण आंतरिक परावर्तन और प्रिज़्म – एक माध्यम से दूसरे में जाते समय प्रकाश मुड़ता है: n₁ sin i = n₂ sin r। सघन से विरल में जाते समय यह अभिलंब से दूर मुड़ता है; क्रांतिक कोण C (sin C = 1/n) से बड़े कोण पर प्रकाश बाहर नहीं निकलता, पूरा लौट आता है: पूर्ण आंतरिक परावर्तन। प्रकाशीय तंतु इसी से प्रकाश ले जाते हैं। प्रिज़्म में r₁ + r₂ = A और विचलन δ = i + e − A; न्यूनतम विचलन पर n = sin((A + δm)/2) / sin(A/2)।
- तरंगाग्र और हाइगेंस का सिद्धांत – तरंगाग्र वह सतह है जिस पर तरंग के सभी बिंदु समान कला में हों। बिंदु स्रोत से गोलीय तरंगाग्र, दूर स्रोत से समतल तरंगाग्र; किरणें तरंगाग्र के लंबवत् होती हैं। हाइगेंस सिद्धांत: तरंगाग्र का हर बिंदु द्वितीयक तरंगिकाओं का स्रोत है, और इनका अग्र आवरण नया तरंगाग्र है। इससे परावर्तन में i = r और अपवर्तन में sin i / sin r = v₁/v₂ = n₂/n₁ सिद्ध होता है।
- व्यतिकरण (यंग का द्वि-झिरी प्रयोग) और एकल झिरी विवर्तन – दो कला-संबद्ध स्रोत (समान आवृत्ति, स्थिर कलांतर) दीप्त और अदीप्त फ्रिंजों का स्थिर पैटर्न बनाते हैं। पर्दे के किसी बिंदु पर पथांतर Δ = yd/D: Δ = nλ पर दीप्त, Δ = (n + ½)λ पर अदीप्त। सभी फ्रिंज समान चौड़ाई β = λD/d के होते हैं। a चौड़ाई की एकल झिरी विवर्तन देती है: 2λD/a चौड़ा चमकीला केंद्रीय उच्चिष्ठ, पहला निम्निष्ठ a sin θ = λ पर, और हल्के पार्श्व उच्चिष्ठ।
7. विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति
विकिरण तथा द्रव्य की द्वैत प्रकृति
- द्रव्य तरंगें और दे ब्रॉग्ली संबंध – प्रकाश तरंग की तरह भी चलता है और कण की तरह भी। 1924 में लुई दे ब्रॉग्ली ने कहा कि द्रव्य भी ऐसा ही करता है: हर गतिमान कण के साथ एक तरंग होती है, जिसकी तरंगदैर्ध्य λ = h/p = h/mv। गतिज ऊर्जा K वाले कण के लिए λ = h/√(2mK); V वोल्ट से त्वरित इलेक्ट्रॉन के लिए λ = 1.227/√V nm। रोज़ की चीज़ों की λ बहुत ही छोटी होती है, पर इलेक्ट्रॉन की λ परमाणु के आकार जितनी होती है।
- प्रकाश विद्युत प्रभाव और आइंस्टीन का समीकरण – जब काफ़ी ऊँची आवृत्ति का प्रकाश किसी धातु पर पड़ता है, तो उसमें से इलेक्ट्रॉन तुरंत बाहर निकल आते हैं। प्रकाश छोटे-छोटे पैकेटों में आता है, जिन्हें फोटॉन कहते हैं; हर फोटॉन की ऊर्जा E = hν है। एक फोटॉन अपनी पूरी ऊर्जा एक इलेक्ट्रॉन को देता है: hν = φ + KEmax, जहाँ φ कार्य फलन है। देहली आवृत्ति ν₀ = φ/h से कम आवृत्ति पर, प्रकाश कितना भी तेज़ हो, कोई इलेक्ट्रॉन नहीं निकलता।
8. परमाणु एवं नाभिक
परमाणु · नाभिक
- परमाणु: अल्फा कण प्रकीर्णन से बोर मॉडल तक – रदरफोर्ड ने सोने की पतली पन्नी पर अल्फा कण फेंके और पाया कि परमाणु ज़्यादातर खाली है, बीच में एक बहुत छोटा, भारी, धनावेशित नाभिक है। फिर बोर ने कहा कि हाइड्रोजन का इलेक्ट्रॉन सिर्फ़ उन्हीं कक्षाओं में घूम सकता है जहाँ कोणीय संवेग nh/2π हो। n वीं कक्षा में त्रिज्या 0.529 n² Å, चाल (2.19 × 10⁶)/n m/s और ऊर्जा −13.6/n² eV होती है। इलेक्ट्रॉन नीचे कूदता है तो ऊर्जा का अंतर एक खास रंग के प्रकाश के रूप में निकलता है — यही हाइड्रोजन का रेखा स्पेक्ट्रम है।
- नाभिक: आकार, नाभिकीय बल, बंधन ऊर्जा, विखंडन और संलयन – नाभिक में Z प्रोटॉन और N न्यूट्रॉन होते हैं (A = Z + N न्यूक्लिऑन)। इसकी त्रिज्या R = R₀A^(1/3), R₀ ≈ 1.2 fm, इसलिए सब नाभिकों का घनत्व लगभग एक जैसा और बहुत ज़्यादा है। एक बहुत तेज़, कम दूरी वाला नाभिकीय बल न्यूक्लिऑनों को बाँधे रखता है। नाभिक अपने अलग-अलग कणों से थोड़ा हल्का होता है; यह द्रव्यमान क्षति Δm ही बंधन ऊर्जा है, E = Δm c² (1 u = 931.5 MeV)। प्रति न्यूक्लिऑन बंधन ऊर्जा लोहे (A ≈ 56) के पास सबसे ज़्यादा है, इसलिए भारी नाभिक टूटकर (विखंडन) और हल्के नाभिक जुड़कर (संलयन) ऊर्जा देते हैं।
9. इलेक्ट्रॉनिक युक्तियाँ
अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी: पदार्थ, युक्तियाँ तथा सरल परिपथ
- अर्धचालक और p-n संधि डायोड – अर्धचालक में ऊर्जा अंतराल छोटा (लगभग 1 eV) होता है, इसलिए थोड़ी गर्मी से कुछ इलेक्ट्रॉन मुक्त हो जाते हैं। शुद्ध सिलिकॉन नैज है (इलेक्ट्रॉन = होल)। 5 संयोजकता वाला परमाणु मिलाने से n-प्रकार, 3 वाला मिलाने से p-प्रकार बनता है। p और n जोड़ने पर ह्रास परत और लगभग 0.7 V का विभव प्राचीर बनता है। डायोड अग्र बायस में धारा चलाता है, पश्च में लगभग नहीं, इसलिए यह AC को DC में बदल सकता है।