तरंगाग्र क्या है?
प्रकाश एक तरंग है। किसी पल, उन सभी बिंदुओं को जोड़ें जहाँ तरंग समान कला में है (जैसे सभी शिखर)। जो सतह बनती है वह तरंगाग्र है। तरंगाग्र तरंग की चाल से आगे बढ़ता है।
- गोलीय तरंगाग्र: बिंदु स्रोत से; स्रोत केंद्र वाले गोले।
- बेलनाकार तरंगाग्र: रेखीय स्रोत से, जैसे पीछे से प्रकाशित पतली झिरी।
- समतल तरंगाग्र: बहुत दूर के स्रोत (जैसे सूर्य) से; बहुत बड़े गोले का छोटा हिस्सा लगभग सपाट।
किरण वह दिशा है जिसमें तरंग चलती है। यह हमेशा तरंगाग्र के लंबवत् होती है। समांतर किरणें = समतल तरंगाग्र; फैलती किरणें = गोलीय तरंगाग्र।
हाइगेंस का सिद्धांत
क्रिस्टियान हाइगेंस (1678) ने यह जानने का आसान तरीका दिया कि समय t बाद तरंगाग्र कहाँ होगा:
- तरंगाग्र का हर बिंदु द्वितीयक तरंगिकाओं का नया स्रोत है। ये तरंग की चाल से आगे की ओर फैलती हैं।
- समय t बाद हर तरंगिका की त्रिज्या v t है। आगे की ओर इन सबको छूने वाली सतह (अग्र आवरण) नया तरंगाग्र है।
पीछे की ओर तरंग क्यों नहीं? हाइगेंस ने उसे छोड़ दिया; बाद के सिद्धांत (फ्रेनेल, किरखॉफ़) ने दिखाया कि पीछे वाली तरंग कट जाती है।
समतल तरंग का परावर्तन: i = r की उपपत्ति
समतल तरंगाग्र AB दर्पण MN से i कोण पर मिलता है। सिरा A पहले दर्पण छूता है।
चरण 1
B को दर्पण तक BC दूरी तय करनी है। इसमें समय t लगता है, BC = v t।
चरण 2
इसी समय में A की तरंगिका त्रिज्या AE = v t तक बढ़ती है (वही माध्यम, वही चाल)।
चरण 3
C से इस तरंगिका पर स्पर्श रेखा CE खींचें। CE परावर्तित तरंगाग्र है।
चरण 4
त्रिभुज ABC और CEA दोनों समकोण (B और E पर) हैं, AC उभयनिष्ठ है, और BC = AE। इसलिए ये सर्वांगसम हैं, जिससे कोण BAC = कोण ECA।
आपतित तरंगाग्र और दर्पण के बीच कोण i है; परावर्तित तरंगाग्र और दर्पण के बीच r। अतः i = r। दोनों किरणें और अभिलंब एक तल में हैं — दूसरा नियम।
समतल तरंग का अपवर्तन: स्नेल नियम की उपपत्ति
माध्यम 1 (चाल v₁) में समतल तरंगाग्र AB, माध्यम 2 (चाल v₂) की सतह से i कोण पर मिलता है।
चरण 1
सिरा B माध्यम 1 में BC = v₁ t चलकर सतह पर पहुँचता है।
चरण 2
इस बीच A की तरंगिका माध्यम 2 में AE = v₂ t चलती है।
चरण 3
स्पर्श रेखा CE अपवर्तित तरंगाग्र है। यह सतह से r कोण बनाती है।
चरण 4
त्रिभुज ABC में: sin i = BC/AC = v₁t/AC। त्रिभुज AEC में: sin r = AE/AC = v₂t/AC।
चरण 5
sin i / sin r = v₁ / v₂। n = c/v से v₁/v₂ = n₂/n₁, अतः n₁ sin i = n₂ sin r — स्नेल का नियम।
v₂ < v₁ (सघन माध्यम) हो तो r < i: किरण अभिलंब की ओर मुड़ती है। दोनों माध्यमों में आवृत्ति वही रहती है (स्रोत तय करता है), इसलिए तरंगदैर्ध्य बदलती है: λ₂ = λ₁ v₂/v₁।
सघन से विरल, और क्या नहीं बदलता
प्रकाश धीमे (सघन) से तेज़ माध्यम में जाए तो माध्यम 2 में A की तरंगिका BC से बड़ी होती है, इसलिए r > i। जब A की तरंगिका इतनी बड़ी हो कि C से स्पर्श रेखा न खिंच सके (v₂t > AC), तो अपवर्तित तरंगाग्र नहीं बनता — यही पूर्ण आंतरिक परावर्तन है, और सीमा से sin C = v₁/v₂ मिलता है।
तरंगाग्र लेंस और दर्पण को भी समझाते हैं: उत्तल लेंस समतल तरंगाग्र के बीच के हिस्से को (मोटे काँच के कारण) अधिक धीमा करता है, इसलिए तरंगाग्र मुड़कर फोकस की ओर अभिसरित होता है।
करके देखें: थाली में लहरें
स्टील की सपाट थाली में थोड़ा पानी भरें। बीच में उँगली से छुएँ: वृत्त फैलते हैं — वृत्ताकार तरंगाग्र। अब एक किनारे पर पैमाना डुबोकर धीरे धकेलें: सीधी लहरें — समतल तरंगाग्र। आधे हिस्से में मोटी काँच की प्लेट रखकर पानी उथला करें: लहरें धीमी होकर पार करते समय मुड़ती हैं, अपवर्तन की तरह। 3D में समय स्लाइडर चलाएँ और तरंगिकाओं से नया तरंगाग्र बनता देखें।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- किरण ⟂ तरंगाग्र
- नया तरंगाग्र = v t त्रिज्या वाली तरंगिकाओं का अग्र आवरण
- परावर्तन: i = r
- अपवर्तन: sin i / sin r = v₁/v₂ = n₂/n₁ = λ₁/λ₂
- आवृत्ति दोनों माध्यमों में समान; λ₂ = λ₁ v₂/v₁ = λ₁ n₁/n₂
- n = c / v
हल किए गए उदाहरण
1. (a) छोटे बल्ब, (b) प्रकाशित पतली झिरी, (c) सूर्य से किस आकार का तरंगाग्र आता है?
चरण 1: बिंदु स्रोत → गोलीय। चरण 2: रेखीय स्रोत (झिरी) → बेलनाकार। चरण 3: सूर्य बहुत दूर है, हम तक पहुँचने वाला भाग समतल तरंगाग्र है।
2. हवा में 600 nm तरंगदैर्ध्य का प्रकाश पानी (n = 4/3) में जाता है। पानी में चाल, तरंगदैर्ध्य और आवृत्ति बताएँ।
चरण 1: आवृत्ति = c/λ = 3 × 10⁸ / 600 × 10⁻⁹ = 5 × 10¹⁴ Hz (पानी में भी वही)। चरण 2: v = c/n = 2.25 × 10⁸ मी/से। चरण 3: λ = 600 × 3/4 = 450 nm।
3. हवा में समतल तरंग काँच (n = 1.5) पर 60° पर पड़ती है। तरंगाग्र परिणाम से अपवर्तन कोण बताएँ।
चरण 1: sin i / sin r = n₂/n₁ = 1.5। चरण 2: sin r = 0.866/1.5 = 0.577। चरण 3: r ≈ 35.3°।
4. अपवर्तन की हाइगेंस रचना में हवा में BC = 6 सेमी है। उतने ही समय में काँच (n = 1.5) में A की तरंगिका कितनी चलती है?
चरण 1: AE/BC = v₂/v₁ = 1/1.5। चरण 2: AE = 4 सेमी। काँच में तरंगिका छोटी है, इसलिए तरंगाग्र मुड़ता है।
5. प्रकाश काँच (v = 2 × 10⁸ मी/से) से पानी (v = 2.25 × 10⁸ मी/से) में जाता है। तरंगाग्र से क्रांतिक कोण बताएँ।
चरण 1: sin C = v₁/v₂ (धीमे से तेज़)। चरण 2: = 2/2.25 = 0.889। चरण 3: C ≈ 62.7°।
6. उत्तल लेंस पर समतल तरंगाग्र पड़ता है। हाइगेंस के विचार से बताएँ कि कैसा तरंगाग्र निकलता है।
चरण 1: तरंगाग्र का बीच वाला भाग सबसे मोटे काँच से गुज़रता है और सबसे अधिक धीमा होता है। चरण 2: किनारे पतले काँच से निकलकर आगे हो जाते हैं। चरण 3: तरंगाग्र एक बिंदु की ओर मुड़ा गोलीय बन जाता है — फोकस पर अभिसरित होता है।
आम गलतियाँ
- यह मानना कि नए माध्यम में तरंगदैर्ध्य और आवृत्ति दोनों बदलते हैं। आवृत्ति वही रहती है; केवल चाल और तरंगदैर्ध्य बदलते हैं।
- किरणें तरंगाग्र के समांतर खींचना। किरणें हमेशा उसके लंबवत् होती हैं।
- sin i / sin r = v₂/v₁ लिखना। यह v₁/v₂ है (पहले माध्यम की चाल ऊपर)।
- पीछे वाले आवरण को भी नया तरंगाग्र मानना। केवल अग्र आवरण गिना जाता है।