आँख पर कोण और निकट बिंदु
रेटिना पर प्रतिबिंब का आकार दर्शन कोण पर निर्भर है — वस्तु आँख पर जो कोण बनाती है। सिक्का पास लाएँ तो कोण बढ़ता है, वह बड़ा दिखता है। पर सामान्य आँख निकट बिंदु D = 25 सेमी से पास फोकस नहीं कर सकती। इसलिए बिना सहायता, सबसे बड़ा साफ़ कोण वस्तु के 25 सेमी पर होने पर बनता है।
प्रकाशिक यंत्र यह कोण बढ़ाता है। इसकी आवर्धन क्षमता:
m = (यंत्र के साथ कोण) ÷ (यंत्र के बिना कोण, वस्तु D पर या बहुत दूर)
सरल सूक्ष्मदर्शी
सरल सूक्ष्मदर्शी (आवर्धक लेंस) छोटी फोकस दूरी f वाला एक उत्तल लेंस है। वस्तु F के अंदर, लेंस के पास रखी जाती है, और आँख दूसरी ओर लेंस के पास।
प्रतिबिंब निकट बिंदु (D) पर
v = −D। लेंस सूत्र से m = v/u = 1 − v/f = 1 + D/f। इससे सबसे अधिक आवर्धन मिलता है, पर आँख पर थोड़ा ज़ोर पड़ता है।
प्रतिबिंब अनंत पर (आराम से देखती आँख)
वस्तु F पर है। लेंस के साथ कोण h/f; बिना लेंस (D पर) h/D। इसलिए m = D/f।
f = 5 सेमी वाला लेंस m = 6 (D पर) या 5 (∞ पर) देता है। बहुत छोटी f वाले लेंस धुंधला करते हैं, इसलिए एक लेंस से लगभग 10× से अधिक नहीं मिलता।
संयुक्त सूक्ष्मदर्शी
संयुक्त सूक्ष्मदर्शी में एक नली में दो उत्तल लेंस होते हैं:
- अभिदृश्यक: बहुत छोटी फोकस दूरी fₒ, वस्तु के पास। वस्तु Fₒ से थोड़ा आगे रखी जाती है, इसलिए बड़ा, वास्तविक, उल्टा प्रतिबिंब बनता है।
- नेत्रिका: छोटी फोकस दूरी fₑ। यह उस पहले प्रतिबिंब पर सरल सूक्ष्मदर्शी की तरह काम करती है।
आवर्धन क्षमता
m = mₒ × mₑ। अभिदृश्यक का आवर्धन mₒ = vₒ/uₒ ≈ L/fₒ, जहाँ L नली की लंबाई है (अभिदृश्यक के दूसरे फोकस और नेत्रिका के पहले फोकस के बीच की दूरी)। अंतिम प्रतिबिंब अनंत पर हो तो mₑ = D/fₑ। अतः
m ≈ (L/fₒ) × (D/fₑ) (प्रतिबिंब अनंत पर)
अंतिम प्रतिबिंब D पर हो तो mₑ = 1 + D/fₑ। अंतिम प्रतिबिंब वस्तु की तुलना में उल्टा होता है। अधिक आवर्धन के लिए fₒ और fₑ दोनों छोटी हों; fₒ < fₑ।
खगोलीय (अपवर्ती) दूरदर्शक
दूरदर्शक चाँद जैसी दूर की वस्तुओं के लिए कोण बढ़ाता है। अभिदृश्यक की फोकस दूरी fₒ बड़ी और द्वारक बड़ा (अधिक प्रकाश इकट्ठा करने के लिए) होता है। नेत्रिका की फोकस दूरी fₑ छोटी होती है।
दूर की वस्तु से समांतर किरणें α कोण बनाती हैं। अभिदृश्यक अपने फोकस पर वास्तविक, उल्टा प्रतिबिंब बनाता है। सामान्य समायोजन में यही प्रतिबिंब नेत्रिका के फोकस पर भी है, इसलिए अंतिम किरणें बड़े कोण β पर समांतर निकलती हैं, और अंतिम प्रतिबिंब अनंत पर होता है।
m = β/α = fₒ/fₑ, नली की लंबाई L = fₒ + fₑ।
अंतिम प्रतिबिंब D पर हो तो: m = (fₒ/fₑ)(1 + fₑ/D)। बड़ा द्वारक चमकीला प्रतिबिंब और बारीक विवरण (अच्छी विभेदन क्षमता) भी देता है।
परावर्ती दूरदर्शक
बहुत बड़े लेंस भारी होते हैं, अपने ही भार से झुकते हैं और रंग अलग करते हैं (वर्ण विपथन)। इसलिए बड़े दूरदर्शकों में अभिदृश्यक अवतल दर्पण होता है। कैसेग्रेन डिज़ाइन में बड़ा अवतल प्राथमिक दर्पण प्रकाश को छोटे उत्तल द्वितीयक दर्पण पर भेजता है, जो उसे प्राथमिक दर्पण के छेद से नेत्रिका तक लौटाता है।
लाभ: वर्ण विपथन नहीं, परवलयिक दर्पण गोलीय विपथन हटाता है, और दर्पण को पीछे से सहारा दिया जा सकता है, इसलिए बहुत बड़ा बन सकता है। आवर्धन क्षमता फिर भी fₒ/fₑ है, जहाँ fₒ = दर्पण का R/2।
करके देखें: दो लेंसों से दूरदर्शक
एक कमज़ोर उत्तल लेंस (जैसे +2 D पढ़ने के चश्मे का लेंस, f = 50 सेमी) और एक तेज़ आवर्धक (f = 5 सेमी) लें। कमज़ोर लेंस दूर की इमारत की ओर रखें और उसके पीछे तेज़ लेंस से देखें। दोनों को आगे-पीछे करें जब तक दृश्य साफ़ न हो: दूरी लगभग fₒ + fₑ = 55 सेमी होगी, और इमारत लगभग 10 गुना बड़ी और उल्टी दिखेगी। इसे कभी सूरज की ओर न करें। 3D में जाँचें कि अधिक आवर्धन के लिए कौन-सी फोकस दूरी बदलनी चाहिए।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- सरल सूक्ष्मदर्शी: m = 1 + D/f (प्रतिबिंब D पर); m = D/f (∞ पर)
- संयुक्त सूक्ष्मदर्शी: m = mₒ × mₑ ≈ (L/fₒ)(D/fₑ)
- संयुक्त सूक्ष्मदर्शी, प्रतिबिंब D पर: m ≈ (L/fₒ)(1 + D/fₑ)
- दूरदर्शक (सामान्य समायोजन): m = fₒ/fₑ, L = fₒ + fₑ
- दूरदर्शक, प्रतिबिंब D पर: m = (fₒ/fₑ)(1 + fₑ/D)
- D = 25 सेमी (स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी)
हल किए गए उदाहरण
1. आवर्धक लेंस की f = 5 सेमी है। प्रतिबिंब निकट बिंदु पर और अनंत पर हो तो आवर्धन क्षमता बताएँ।
चरण 1: D पर m = 1 + 25/5 = 6। चरण 2: ∞ पर m = 25/5 = 5।
2. सरल सूक्ष्मदर्शी D = 25 सेमी पर प्रतिबिंब के साथ m = 11 देता है। फोकस दूरी बताएँ।
चरण 1: 1 + 25/f = 11। चरण 2: 25/f = 10। चरण 3: f = 2.5 सेमी।
3. संयुक्त सूक्ष्मदर्शी में fₒ = 1 सेमी, fₑ = 5 सेमी, नली की लंबाई 20 सेमी है। अंतिम प्रतिबिंब अनंत पर हो तो m बताएँ।
चरण 1: mₒ ≈ 20/1 = 20। चरण 2: mₑ = 25/5 = 5। चरण 3: m = 100।
4. संयुक्त सूक्ष्मदर्शी में वस्तु fₒ = 1.25 सेमी वाले अभिदृश्यक से 1.5 सेमी दूर है। fₑ = 5 सेमी, अंतिम प्रतिबिंब 25 सेमी पर। कुल आवर्धन बताएँ।
चरण 1: 1/vₒ = 1/1.25 − 1/1.5 = 0.133, vₒ = 7.5 सेमी। चरण 2: mₒ = 7.5/−1.5 = −5। चरण 3: mₑ = 1 + 25/5 = 6। चरण 4: m = −30 (परिमाण 30, उल्टा)।
5. दूरदर्शक के अभिदृश्यक की f = 100 सेमी और नेत्रिका की 5 सेमी है। सामान्य समायोजन में आवर्धन और नली की लंबाई बताएँ।
चरण 1: m = 100/5 = 20। चरण 2: L = 105 सेमी।
6. वही दूरदर्शक (fₒ = 100, fₑ = 5 सेमी) अंतिम प्रतिबिंब 25 सेमी पर बनाता है। आवर्धन क्षमता बताएँ।
चरण 1: m = (fₒ/fₑ)(1 + fₑ/D)। चरण 2: = 20 × 1.2। चरण 3: m = 24।
7. fₒ = 15 मी और fₑ = 1 सेमी वाला दूरदर्शक चाँद (व्यास 3.48 × 10⁶ मी, दूरी 3.8 × 10⁸ मी) देखता है। अभिदृश्यक द्वारा बने प्रतिबिंब का व्यास बताएँ।
चरण 1: α = 3.48 × 10⁶ / 3.8 × 10⁸ ≈ 9.16 × 10⁻³ रेडियन। चरण 2: प्रतिबिंब = α × fₒ = 9.16 × 10⁻³ × 15। चरण 3: ≈ 0.137 मी = 13.7 सेमी। आवर्धन 15/0.01 = 1500।
8. आपके पास 100 सेमी, 4 सेमी और 1 सेमी फोकस दूरी के लेंस हैं। दूरदर्शक और सूक्ष्मदर्शी के लिए कौन-से दो चुनेंगे?
चरण 1: दूरदर्शक: लंबा fₒ, छोटा fₑ → 100 सेमी अभिदृश्यक, 1 सेमी नेत्रिका, m = 100। चरण 2: सूक्ष्मदर्शी: दोनों छोटे, fₒ सबसे छोटा → 1 सेमी अभिदृश्यक, 4 सेमी नेत्रिका।
आम गलतियाँ
- दूरदर्शक के लेंस उलट देना। दूरदर्शक में अभिदृश्यक की f बड़ी; सूक्ष्मदर्शी में अभिदृश्यक की f छोटी।
- प्रतिबिंब निकट बिंदु पर होने पर m = D/f लगाना। D पर यह 1 + D/f है।
- दूरदर्शक की नली की लंबाई fₒ − fₑ लिखना। सामान्य समायोजन में fₒ + fₑ है।
- यह मानना कि दूरदर्शक तारों को आकार में बड़ा दिखाता है। तारे बिंदु ही रहते हैं; दूरदर्शक अधिक प्रकाश इकट्ठा करता है और पास-पास के तारों को अलग दिखाता है।