प्रकाश विद्युत प्रभाव क्या है?
धातुओं में बहुत से मुक्त इलेक्ट्रॉन होते हैं। उन्हें एक छोटी ऊर्जा की 'दीवार' धातु के अंदर रोके रखती है। जब सही तरह का प्रकाश साफ़ धातु की सतह पर पड़ता है, तो कुछ इलेक्ट्रॉन इतनी ऊर्जा पा लेते हैं कि दीवार पार करके बाहर निकल जाते हैं। इसे प्रकाश विद्युत प्रभाव कहते हैं। निकलने वाले इलेक्ट्रॉन प्रकाश इलेक्ट्रॉन कहलाते हैं और उनका बहाव प्रकाश विद्युत धारा बनाता है।
कार्य फलन (φ): धातु की सतह से एक इलेक्ट्रॉन को बाहर निकालने के लिए ज़रूरी न्यूनतम ऊर्जा। हर धातु का मान अलग होता है, जैसे सोडियम का लगभग 2.3 eV और ताँबे का लगभग 4.7 eV। 1 eV = 1.6 × 10⁻¹⁹ J।
हर्ट्ज़ और लेनार्ड के प्रेक्षण
1887 में हेनरिक हर्ट्ज़ दो धातु की गेंदों के बीच चिंगारी पैदा कर रहे थे। उन्होंने देखा कि जब गेंदों पर पराबैंगनी (UV) प्रकाश पड़ता है, तो चिंगारी आसानी से कूदती है। यानी प्रकाश आवेश को धातु से निकलने में मदद कर रहा था।
लगभग 1902 में फिलिप लेनार्ड ने निर्वात नली में इसे ध्यान से जाँचा। उन्होंने पाया:
- UV प्रकाश पड़ने पर निर्वात में दो प्लेटों के बीच धारा बहती है; प्रकाश हटाओ तो धारा बंद।
- निकलने वाले कण ऋणावेशित थे (बाद में पता चला, इलेक्ट्रॉन)।
- कुछ धातुओं पर दृश्य प्रकाश भी काम करता है, कुछ पर केवल UV।
- इलेक्ट्रॉन की गति प्रकाश के रंग (आवृत्ति) पर निर्भर थी, चमक पर नहीं।
हालवाक्स ने भी देखा कि ऋणावेशित जस्ते की प्लेट पर UV डालने से उसका आवेश खत्म हो जाता है।
प्रकाश विद्युत प्रभाव का प्रायोगिक अध्ययन
उपकरण: निर्वातित काँच की नली जिसमें क्वार्ट्ज़ की खिड़की है (क्वार्ट्ज़ UV को जाने देता है)। अंदर उत्सर्जक प्लेट C (प्रकाश-सुग्राही धातु) और संग्राहक प्लेट A। बैटरी और विभव विभाजक से A का वोल्टेज बदलते हैं, दिक्परिवर्तक से A को धनात्मक या ऋणात्मक करते हैं। माइक्रोऐमीटर धारा नापता है।
1. तीव्रता का प्रभाव
आवृत्ति और वोल्टेज स्थिर रखो। प्रकाश विद्युत धारा तीव्रता के अनुक्रमानुपाती है। चमक दोगुनी → धारा दोगुनी। कारण: हर सेकंड ज़्यादा फोटॉन, ज़्यादा इलेक्ट्रॉन।
2. वोल्टेज का प्रभाव (I–V ग्राफ)
A को धीरे-धीरे अधिक धनात्मक करो: धारा बढ़ती है, फिर स्थिर हो जाती है। यह संतृप्त धारा है: निकला हर इलेक्ट्रॉन पकड़ा जा रहा है। अब A को ऋणात्मक करो: धारा घटती है और एक वोल्टेज −V₀ पर शून्य हो जाती है। V₀ को निरोधी विभव (अंतक विभव) कहते हैं। यहाँ eV₀ = KEmax।
एक ही आवृत्ति पर अलग तीव्रता के वक्रों की संतृप्त धारा अलग होती है, पर निरोधी विभव एक ही रहता है। यानी KEmax तीव्रता पर निर्भर नहीं।
3. आवृत्ति का प्रभाव
एक ही तीव्रता पर आवृत्ति बढ़ाओ तो निरोधी विभव बढ़ता है; संतृप्त धारा वही रहती है। यानी KEmax आवृत्ति के साथ बढ़ती है।
4. देहली आवृत्ति
V₀ और ν का ग्राफ एक सीधी रेखा है। यह ν-अक्ष को ν₀ पर काटती है, जिसे देहली आवृत्ति कहते हैं। ν₀ से कम आवृत्ति पर कोई इलेक्ट्रॉन नहीं निकलता, चाहे प्रकाश कितना भी तेज़ हो। रेखा का ढाल h/e है, जो हर धातु के लिए समान है।
5. कोई समय-पश्चता नहीं
प्रकाश डालते ही लगभग 10⁻⁹ s में इलेक्ट्रॉन निकलने लगते हैं, मंद प्रकाश में भी।
प्रकाश का तरंग सिद्धांत क्यों असफल हुआ
अगर प्रकाश केवल फैली हुई तरंग होता, तो:
- किसी भी रंग का तेज़ प्रकाश कुछ देर में इलेक्ट्रॉन को काफ़ी ऊर्जा दे देता। पर लाल प्रकाश सोडियम पर कभी काम नहीं करता। ✗
- तेज़ प्रकाश से तेज़ इलेक्ट्रॉन निकलते। पर KEmax चमक से नहीं बदलती। ✗
- मंद प्रकाश में ऊर्जा 'भरने' में समय लगता। पर कोई देरी नहीं होती। ✗
इसलिए तरंग मॉडल इस प्रयोग को नहीं समझा पाता।
आइंस्टीन का प्रकाश विद्युत समीकरण
1905 में आइंस्टीन ने कहा: प्रकाश की ऊर्जा छोटे पैकेटों में आती है, जिन्हें क्वांटा या फोटॉन कहते हैं। आवृत्ति ν के फोटॉन की ऊर्जा E = hν, जहाँ h = 6.63 × 10⁻³⁴ J s (प्लांक नियतांक)।
एक फोटॉन को एक इलेक्ट्रॉन पूरा का पूरा, एक बार में सोख लेता है। इलेक्ट्रॉन बाहर निकलने में φ खर्च करता है। बाकी उसकी गतिज ऊर्जा है:
KEmax = hν − φ, या hν = φ + ½mv²max
क्योंकि KEmax = eV₀: eV₀ = hν − φ, यानी V₀ = (h/e)ν − φ/e। यही V₀–ν ग्राफ की सीधी रेखा है।
KEmax = 0 रखो: φ = hν₀। तो ν₀ = φ/h और देहली तरंगदैर्ध्य λ₀ = hc/φ।
यह समीकरण सब समझा देता है: देहली (फोटॉन की ऊर्जा φ से ज़्यादा होनी चाहिए), KEmax केवल ν पर निर्भर (एक फोटॉन, एक इलेक्ट्रॉन), धारा तीव्रता पर निर्भर (फोटॉनों की संख्या), और कोई देरी नहीं (एक ही टक्कर)।
छोटा तरीका: E (eV में) = 1240 / λ (nm में)।
प्रकाश की कण प्रकृति: फोटॉन
फोटॉन प्रकाश ऊर्जा का एक छोटा पैकेट है। इसके गुण:
- ऊर्जा E = hν = hc/λ।
- संवेग p = hν/c = h/λ।
- निर्वात में हमेशा c = 3 × 10⁸ m/s की चाल से चलता है। इसका विराम द्रव्यमान शून्य है।
- इस पर कोई आवेश नहीं, इसलिए विद्युत या चुंबकीय क्षेत्र इसे नहीं मोड़ते।
- एक ही रंग का तेज़ प्रकाश = हर सेकंड ज़्यादा फोटॉन, बड़े फोटॉन नहीं।
- फोटॉन बन या सोखे जा सकते हैं, पर टक्कर में कुल ऊर्जा और संवेग संरक्षित रहते हैं।
प्रकाश तरंग की तरह फैलता और व्यतिकरण करता है, पर ऊर्जा कण की तरह लेता-देता है। यही विकिरण की द्वैत प्रकृति है।
करके देखो: पहले अनुमान, फिर जाँच
- 3D में आवृत्ति 5 × 10¹⁴ Hz रखो। अनुमान लगाओ: क्या तेज़ प्रकाश (तीव्रता 10) से धारा बहेगी? फिर जाँचो।
- आवृत्ति 9 × 10¹⁴ Hz, वोल्टेज +1 V रखो। तीव्रता 2 से 8 करो। धारा का क्या हुआ? KEmax का?
- वोल्टेज धीरे-धीरे ऋणात्मक करो। जिस वोल्टेज पर ग्राफ का हरा बिंदु शून्य पर पहुँचे, उसे लिखो और eV में KEmax से मिलाओ।
- घर पर: सोलर गार्डन लाइट या कैलकुलेटर का सोलर सेल धूप और तेज़ सफ़ेद LED में चलता है, पर मंद लाल बल्ब में ठीक से नहीं। करके देखो और फोटॉन ऊर्जा के बारे में सोचो।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- E = hν = hc/λ; E(eV) = 1240/λ(nm)
- hν = φ + KEmax (आइंस्टीन समीकरण)
- KEmax = ½mv²max = eV₀
- φ = hν₀ = hc/λ₀
- V₀ = (h/e)ν − φ/e (ढाल h/e)
- प्रति सेकंड फोटॉन n = P/(hν); फोटॉन का संवेग p = h/λ
हल किए गए उदाहरण
1. 500 nm तरंगदैर्ध्य के फोटॉन की ऊर्जा जूल और eV में निकालो।
चरण 1: E = hc/λ = (6.63 × 10⁻³⁴ × 3 × 10⁸) / (500 × 10⁻⁹)। चरण 2: E = 1.989 × 10⁻²⁵ / 5 × 10⁻⁷ = 3.98 × 10⁻¹⁹ J। चरण 3: eV में: 3.98 × 10⁻¹⁹ / 1.6 × 10⁻¹⁹ ≈ 2.49 eV। छोटे तरीके से जाँच: 1240/500 = 2.48 eV।
2. किसी धातु का कार्य फलन 2.0 eV है। उसकी देहली आवृत्ति और देहली तरंगदैर्ध्य ज्ञात करो।
चरण 1: φ = 2.0 × 1.6 × 10⁻¹⁹ = 3.2 × 10⁻¹⁹ J। चरण 2: ν₀ = φ/h = 3.2 × 10⁻¹⁹ / 6.63 × 10⁻³⁴ ≈ 4.83 × 10¹⁴ Hz। चरण 3: λ₀ = c/ν₀ = 3 × 10⁸ / 4.83 × 10¹⁴ ≈ 620 nm (नारंगी-लाल प्रकाश)।
3. 4.0 eV ऊर्जा वाले फोटॉन φ = 2.5 eV वाली धातु पर पड़ते हैं। KEmax और निरोधी विभव निकालो।
चरण 1: KEmax = hν − φ = 4.0 − 2.5 = 1.5 eV। चरण 2: eV₀ = KEmax, इसलिए V₀ = 1.5 V। चरण 3: जूल में KEmax = 1.5 × 1.6 × 10⁻¹⁹ = 2.4 × 10⁻¹⁹ J।
4. 310 nm का प्रकाश φ = 2.2 eV वाली धातु पर पड़ता है। प्रकाश इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम चाल निकालो (m = 9.1 × 10⁻³¹ kg)।
चरण 1: फोटॉन ऊर्जा = 1240/310 = 4.0 eV। चरण 2: KEmax = 4.0 − 2.2 = 1.8 eV = 2.88 × 10⁻¹⁹ J। चरण 3: ½mv² = KEmax → v² = 2 × 2.88 × 10⁻¹⁹ / 9.1 × 10⁻³¹ = 6.33 × 10¹¹। चरण 4: v ≈ 7.96 × 10⁵ m/s।
5. 10 W का लैंप 600 nm का प्रकाश देता है। वह हर सेकंड कितने फोटॉन भेजता है?
चरण 1: एक फोटॉन की ऊर्जा E = hc/λ = 1.989 × 10⁻²⁵ / 6 × 10⁻⁷ = 3.315 × 10⁻¹⁹ J। चरण 2: n = P/E = 10 / 3.315 × 10⁻¹⁹। चरण 3: n ≈ 3.0 × 10¹⁹ फोटॉन प्रति सेकंड।
6. किसी धातु के लिए 8 × 10¹⁴ Hz पर निरोधी विभव 1.2 V और 12.8 × 10¹⁴ Hz पर 3.2 V है। प्लांक नियतांक और कार्य फलन निकालो।
चरण 1: दोनों के लिए eV₀ = hν − φ। घटाने पर: e(3.2 − 1.2) = h(12.8 − 8) × 10¹⁴। चरण 2: h = 1.6 × 10⁻¹⁹ × 2 / 4.8 × 10¹⁴ ≈ 6.67 × 10⁻³⁴ J s। चरण 3: φ = hν − eV₀ = 5.34 × 10⁻¹⁹ − 1.92 × 10⁻¹⁹ = 3.42 × 10⁻¹⁹ J ≈ 2.13 eV।
7. किसी धातु की देहली तरंगदैर्ध्य 540 nm है। उस पर 360 nm का प्रकाश पड़ता है। निरोधी विभव निकालो।
चरण 1: φ = 1240/540 ≈ 2.30 eV। चरण 2: hν = 1240/360 ≈ 3.44 eV। चरण 3: KEmax = 3.44 − 2.30 = 1.14 eV। चरण 4: V₀ = 1.14 V।
8. फोटो सेल पर प्रकाश की तीव्रता 4 गुना कर दी, आवृत्ति वही रखी। (a) संतृप्त धारा, (b) निरोधी विभव पर क्या असर होगा?
चरण 1: तीव्रता = हर सेकंड फोटॉनों की संख्या। 4 गुना तीव्रता → 4 गुना फोटॉन → 4 गुना इलेक्ट्रॉन। (a) संतृप्त धारा 4 गुना। चरण 2: हर फोटॉन की ऊर्जा hν वही है, तो KEmax = hν − φ वही। (b) निरोधी विभव नहीं बदलेगा।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि तेज़ प्रकाश से इलेक्ट्रॉन तेज़ निकलते हैं। चमक से केवल इलेक्ट्रॉनों की संख्या (धारा) बदलती है; गति आवृत्ति पर निर्भर है।
- m या h के साथ SI में हल करने से पहले eV को जूल में (× 1.6 × 10⁻¹⁹) न बदलना।
- हर इलेक्ट्रॉन के लिए hν = φ + KE लिखना। यह KEmax है; ज़्यादातर इलेक्ट्रॉन धातु के अंदर कुछ ऊर्जा खो देते हैं।
- देहली आवृत्ति और देहली तरंगदैर्ध्य में उलझना: बड़ी तरंगदैर्ध्य = कम आवृत्ति, इसलिए उत्सर्जन तभी जब λ, λ₀ से छोटी हो।