तरंगाग्र, परावर्तन और अपवर्तन
तरंगाग्र (wavefront) वह रेखा है जो साथ-साथ हिलने वाले बिंदुओं को जोड़ती है, जैसे सारे शिखर। तालाब में पत्थर डालो तो गोल तरंगाग्र बनते हैं। दूर जाकर ये लगभग सीधे (समतल तरंग) दिखते हैं।
परावर्तन: तरंग कठोर दीवार से टकराकर लौटती है। आने का कोण = जाने का कोण। प्रतिध्वनि (echo) ध्वनि का परावर्तन है।
अपवर्तन: जहाँ तरंग की चाल बदलती है, वहाँ उसकी दिशा बदल जाती है। आवृत्ति f वही रहती है, क्योंकि उसे स्रोत तय करता है। v = fλ से, v घटे तो λ भी घटता है। उथले पानी में लहरें धीमी होती हैं; काँच में प्रकाश धीमा होता है।
विवर्तन: तरंग कोनों के पार फैलती है
विवर्तन यानी दरार या किनारे से गुज़रने के बाद तरंग का फैल जाना। यह तब सबसे ज़्यादा होता है जब दरार लगभग λ जितनी हो। इसीलिए कोने के पीछे खड़े दोस्त की आवाज़ सुनाई देती है (ध्वनि का λ लगभग 1 m) पर वह दिखता नहीं (प्रकाश का λ एक मीटर के दस लाखवें हिस्से से भी छोटा)।
a चौड़ाई की एक झिरी के लिए पहला अँधेरा कोण θ पर आता है जहाँ a sin θ = λ। झिरी पतली हो तो बीच की चमकीली पट्टी चौड़ी।
अध्यारोपण और व्यतिकरण
अध्यारोपण का सिद्धांत: दो तरंगें मिलें तो किसी बिंदु पर कुल विस्थापन = दोनों विस्थापनों का योग। गुज़रने के बाद हर तरंग पहले जैसी आगे बढ़ती है।
संपोषी और विनाशी व्यतिकरण
दोनों तरंगें एक ही कला में पहुँचें (शिखर के साथ शिखर) तो आयाम जुड़ जाता है: संपोषी व्यतिकरण। बिलकुल उलटी कला में पहुँचें (शिखर के साथ गर्त) तो मिट जाती हैं: विनाशी व्यतिकरण।
पथांतर का नियम
एक साथ हिलने वाले दो स्रोतों के लिए बिंदु P पर पथांतर Δ = |S₁P − S₂P|।
- Δ = nλ (0, λ, 2λ …) → संपोषी (चमकीला/तेज़)
- Δ = (n + ½)λ (λ/2, 3λ/2 …) → विनाशी (अँधेरा/धीमा)
स्थिर पैटर्न के लिए स्रोत कला-संबद्ध (coherent) होने चाहिए: एक जैसी आवृत्ति और स्थिर कलांतर।
दो झिरियों की फ्रिंजें
झिरियों के बीच दूरी d और परदे की दूरी D हो तो चमकीली फ्रिंजें बराबर दूरी पर बनती हैं: Δx = λD/d। λ या D बढ़ाओ तो फ्रिंजें फैलती हैं; d बढ़ाओ तो सिकुड़ती हैं।
पतली फ़िल्म में व्यतिकरण
पतली परत (साबुन, तेल) की ऊपरी और निचली सतह दोनों से प्रकाश परावर्तित होता है। ये दो तरंगें आपस में व्यतिकरण करती हैं। अतिरिक्त पथ लगभग 2nt होता है (n = अपवर्तनांक, t = मोटाई)। सघन माध्यम से परावर्तन पर आधे λ का बदलाव जुड़ता है। अलग मोटाई पर अलग रंग मज़बूत होता है, इसलिए रंगीन पट्टियाँ दिखती हैं। चश्मे की परावर्तन-रोधी परत लगभग λ/4n मोटी होती है ताकि परावर्तन मिट जाए।
घर पर करके देखो
एक चौड़ी ट्रे में 2 cm पानी भरो। एक उँगली से थपकी दो: देखो गोल लहरें किनारे से लौटती हैं। बीच में 2 cm की दरार छोड़कर दो ब्लॉक रखो और स्केल से सीधी लहरें बनाओ: दरार के बाद लहरें फैलती दिखेंगी। फिर 5 cm दूर दो उँगलियों से एक साथ थपकी दो: लहरों के बीच शांत रेखाएँ ढूँढो। पहले अनुमान लगाओ: उँगलियाँ दूर करने पर शांत रेखाएँ पास आएँगी या दूर? फिर जाँचो।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- v = f λ
- पथांतर Δ = |S₁P − S₂P|
- संपोषी: Δ = nλ
- विनाशी: Δ = (n + ½)λ
- फ्रिंज चौड़ाई Δx = λD / d
- एकल झिरी पहला निम्निष्ठ: a sin θ = λ
- पतली फ़िल्म (एक कला-उलटाव): चमकीला परावर्तन 2nt = (m + ½)λ
हल किए गए उदाहरण
1. पानी की लहर की आवृत्ति 4 Hz और तरंगदैर्ध्य 0.5 m है। चाल ज्ञात करो।
v = fλ = 4 × 0.5 = 2 m/s।
2. वही लहर उथले पानी में जाकर 1.2 m/s की चाल से चलती है। नया तरंगदैर्ध्य?
आवृत्ति 4 Hz ही रहती है। λ = v/f = 1.2/4 = 0.3 m। लहर छोटी हो गई।
3. एक साथ बजते दो स्पीकर, λ = 0.8 m। एक बिंदु एक से 5.0 m और दूसरे से 6.2 m दूर है। तेज़ या धीमा?
Δ = 6.2 − 5.0 = 1.2 m। Δ/λ = 1.5 = 1 + ½। इसलिए विनाशी: धीमा।
4. झिरियाँ 0.5 mm दूर, परदा 1.5 m दूर, λ = 600 nm। फ्रिंज चौड़ाई?
Δx = λD/d = (600 × 10⁻⁹ × 1.5)/(0.5 × 10⁻³) = 1.8 × 10⁻³ m = 1.8 mm।
5. 500 nm का प्रकाश 0.01 mm चौड़ी झिरी पर। पहली अँधेरी पट्टी का कोण?
sin θ = λ/a = (500 × 10⁻⁹)/(1 × 10⁻⁵) = 0.05, θ ≈ 2.9°।
6. साबुन की परत (n = 1.33) 532 nm प्रकाश में चमकीली दिखती है। सबसे पतली मोटाई?
एक कला-उलटाव (ऊपरी सतह), तो m = 0 पर 2nt = ½λ। t = λ/(4n) = 532/(4 × 1.33) = 100 nm।
आम गलतियाँ
- यह मानना कि अपवर्तन में आवृत्ति बदलती है। चाल और तरंगदैर्ध्य बदलते हैं, आवृत्ति वही रहती है।
- यह कहना कि विनाशी व्यतिकरण में ऊर्जा नष्ट हो जाती है। ऊर्जा बस चमकीली/तेज़ जगहों पर चली जाती है।
- दो साधारण बल्बों से व्यतिकरण की उम्मीद करना। वे कला-संबद्ध नहीं होते, इसलिए स्थिर पैटर्न नहीं बनता।
- Δx = λD/d में mm और nm को मीटर में बदलना भूल जाना।