चुंबकीय क्षेत्र में चलता आवेश
चुंबकीय क्षेत्र केवल चलते आवेश पर बल लगाता है। यह बल हमेशा वेग से समकोण पर होता है। बगल का धक्का कण को मोड़ सकता है, पर उसे तेज़ या धीमा नहीं कर सकता। इसलिए चाल वही रहती है और रास्ता वृत्त बन जाता है।
चुंबकीय बल qvB ही वह बल है जो केंद्र की ओर खींचता है। इसे आवश्यक अभिकेंद्र बल mv²/r के बराबर रखो:
qvB = mv²/r, अतः r = mv/(qB)
एक पूरे चक्कर का समय: T = 2πr/v = 2πm/(qB)। इसमें चाल v कट जाती है। तेज़ कण बड़ा वृत्त बनाता है, पर उसे घूमने में उतना ही समय लगता है।
द्रव्यमान स्पेक्ट्रोमीटर: आयनों को द्रव्यमान से छाँटना
द्रव्यमान स्पेक्ट्रोमीटर परमाणुओं या अणुओं का द्रव्यमान मापता है। इसके तीन काम हैं।
- आयन बनाना। नमूने को आवेश q दिया जाता है।
- तेज़ करना। आयन वोल्टता V से गुज़रकर ऊर्जा qV पाता है। अतः ½mv² = qV और v = √(2qV/m)।
- मोड़ना। आयन झिरी से चुंबकीय क्षेत्र B में जाकर आधे वृत्त में घूमता है और प्लेट पर दूरी d = 2r पर टकराता है।
r = mv/qB में v रखने पर:
r = (1/B) √(2mV/q), अतः m = qB²r²/(2V)
q, V और B समान हों तो r ∝ √m। भारी आयन झिरी से ज़्यादा दूर गिरता है। एक ही तत्व के दो समस्थानिक (आवेश बराबर, द्रव्यमान थोड़ा अलग) प्लेट पर दो अलग निशान बनाते हैं। निशान की जगह से द्रव्यमान और निशान की गहराई से मात्रा पता चलती है।
साइक्लोट्रॉन: कणों को छोटे-छोटे धक्कों से तेज़ करना
कम वोल्टता से बहुत ऊर्जा देने के लिए साइक्लोट्रॉन उसी वोल्टता का बार-बार इस्तेमाल करता है।
- दो खोखले D-आकार के धातु के डिब्बे (डी) मज़बूत चुंबकीय क्षेत्र B में रखे होते हैं। बीच में छोटा गैप होता है।
- गैप पर प्रत्यावर्ती वोल्टता लगती है। डी के अंदर विद्युत क्षेत्र नहीं होता, इसलिए कण अंदर केवल घूमता है।
- कण गैप पार करता है, विद्युत क्षेत्र से धक्का (ऊर्जा +qV) पाता है, डी में जाकर आधा चक्कर लगाता है। जब वह गैप पर लौटता है, वोल्टता उसी समय पलट चुकी होती है, तो उसे फिर धक्का मिलता है।
हर धक्के से चाल बढ़ती है, तो r ∝ v के कारण वृत्त बड़ा होता है। रास्ता बाहर की ओर फैलती कुंडली (स्पाइरल) जैसा बनता है।
मुख्य बात: हर आधे चक्कर का समय πm/(qB) है, चाहे वृत्त छोटा हो या बड़ा। इसलिए पूरी यात्रा में एक ही आवृत्ति काफ़ी है:
f = qB/(2πm) (साइक्लोट्रॉन आवृत्ति)
साइक्लोट्रॉन की ऊर्जा और सीमाएँ
कण डी के किनारे पर, जहाँ r = R है, बाहर निकलता है। तब v = qBR/m और अंतिम गतिज ऊर्जा
KE = q²B²R²/(2m)
ज़्यादा ऊर्जा के लिए B या R बढ़ाना पड़ता है। यह गैप की वोल्टता पर निर्भर नहीं है; कम वोल्टता का मतलब बस ज़्यादा चक्कर।
सीमाएँ: (1) प्रकाश की चाल के पास पहुँचने पर द्रव्यमान बढ़ने लगता है और समय का तालमेल बिगड़ जाता है। (2) इलेक्ट्रॉन बहुत हल्के हैं और जल्दी ऐसी चाल पा लेते हैं, इसलिए साइक्लोट्रॉन प्रोटॉन और भारी आयनों के लिए होते हैं। (3) बहुत बड़ा चुंबक महँगा पड़ता है।
करके देखो: प्रयोग
करके देखो: 3D में वृत्त चुनो। पहले सोचो कि चाल दुगुनी करने पर r का क्या होगा, फिर जाँचो। एक चक्कर के समय का क्या होगा, यह भी सोचो। फिर स्पेक्ट्रोमीटर चुनो और भारी द्रव्यमान 4 कर दो। अंदाज़ा लगाओ कि उसका निशान हल्के आयन से कितना दूर है (उत्तर: दुगुना दूर, क्योंकि √4 = 2)। घर पर: धागे में गेंद बाँधकर घुमाओ। लंबा धागा या तेज़ गेंद बड़े r जैसा है। धागा वही बल है जो रास्ते को मोड़ता है, जैसे B।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- r = mv / (qB)
- T = 2πm / (qB), f = qB / (2πm)
- द्रव्यमान स्पेक्ट्रोमीटर: ½mv² = qV, r = (1/B)√(2mV/q), d = 2r
- साइक्लोट्रॉन: f = qB/(2πm); अंतिम KE = q²B²R²/(2m)
- मात्रक: B टेस्ला (T) में, v m/s में, m kg में, q कूलॉम (C) में, V वोल्ट (V) में
हल किए गए उदाहरण
1. एक प्रोटॉन (m = 1.67 × 10⁻²⁷ kg, q = 1.6 × 10⁻¹⁹ C) 0.50 T के क्षेत्र में, क्षेत्र से समकोण पर, 3.0 × 10⁶ m/s से आता है। उसके पथ की त्रिज्या निकालो।
r = mv/(qB) = (1.67 × 10⁻²⁷ × 3.0 × 10⁶)/(1.6 × 10⁻¹⁹ × 0.50) = 5.01 × 10⁻²¹ / 8.0 × 10⁻²⁰ = 0.063 m = 6.3 cm।
2. ऊपर के उदाहरण में कण की चाल दुगुनी कर दें तो त्रिज्या और एक चक्कर के समय का क्या होगा?
r ∝ v, इसलिए r दुगुना होकर 12.6 cm हो जाएगा। T = 2πm/qB में v नहीं है, इसलिए एक चक्कर का समय वही रहेगा।
3. 1.0 T के क्षेत्र में एक प्रोटॉन घूम रहा है। साइक्लोट्रॉन आवृत्ति निकालो।
f = qB/(2πm) = (1.6 × 10⁻¹⁹ × 1.0)/(2π × 1.67 × 10⁻²⁷) = 1.52 × 10⁷ Hz, लगभग 15 MHz।
4. एक द्रव्यमान स्पेक्ट्रोमीटर में एकल आवेशित नियॉन-20 आयन झिरी से 20.0 cm पर गिरते हैं। नियॉन-22 आयन कहाँ गिरेंगे (V और B वही)?
d ∝ √m। d₂ = 20.0 × √(22/20) = 20.0 × 1.0488 = 20.98 cm, यानी लगभग 21.0 cm। दोनों समस्थानिक लगभग 1 cm दूर हैं।
5. एक प्रोटॉन और एक ऐल्फ़ा कण (द्रव्यमान 4 गुना, आवेश 2 गुना) को एक ही V से तेज़ करके एक ही B में भेजा जाता है। उनकी त्रिज्याओं की तुलना करो।
r = (1/B)√(2mV/q), अतः r ∝ √(m/q)। ऐल्फ़ा के लिए √(4/2) = √2 गुना। rα : rp = 1.41 : 1।
6. एक साइक्लोट्रॉन के डी की त्रिज्या 0.50 m और क्षेत्र 1.5 T है। बाहर निकलने वाले प्रोटॉन की ऊर्जा MeV में निकालो।
v = qBR/m = (1.6 × 10⁻¹⁹ × 1.5 × 0.50)/(1.67 × 10⁻²⁷) = 7.2 × 10⁷ m/s। KE = ½mv² = 4.3 × 10⁻¹² J। इसे 1.6 × 10⁻¹³ J/MeV से भाग दो: लगभग 27 MeV।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि चुंबकीय क्षेत्र कण को तेज़ करता है। वह केवल मोड़ता है। चाल बढ़ाने का काम गैप का विद्युत क्षेत्र करता है।
- यह कहना कि तेज़ कण को चक्कर में ज़्यादा समय लगता है। T = 2πm/qB में v नहीं है।
- द्रव्यमान स्पेक्ट्रोमीटर में d = 2r भूल जाना। आयन आधे वृत्त के दूसरे सिरे पर गिरता है।
- यह मानना कि साइक्लोट्रॉन की अंतिम ऊर्जा गैप की वोल्टता पर निर्भर है। वह केवल q, B, R और m पर निर्भर है।