LC परिपथ क्या है?
LC परिपथ (इसे दोलनी परिपथ या टैंक परिपथ भी कहते हैं) में सिर्फ़ दो चीज़ें होती हैं: एक संधारित्र (capacitor) C और एक प्रेरक (inductor, कुंडली) L, एक घेरे में जुड़े हुए।
- संधारित्र अपनी प्लेटों के बीच विद्युत क्षेत्र में ऊर्जा रखता है। ऊर्जा = q² / (2C)।
- प्रेरक कुंडली के अंदर चुंबकीय क्षेत्र में ऊर्जा रखता है। ऊर्जा = ½ L i²।
संधारित्र को आवेशित करके कुंडली से जोड़ें, तो आवेश एक बार बहकर रुकता नहीं। वह बार-बार आगे-पीछे दौड़ता है। ये मुक्त विद्युत चुंबकीय दोलन हैं: बाहर से कोई धक्का नहीं, परिपथ अपनी ही ऊर्जा से झूलता है।
परिपथ में ऊर्जा का रूपांतरण
एक चक्कर को कदम-कदम पर देखो:
- t = 0: संधारित्र भरा (q = Q₀), धारा शून्य। सारी ऊर्जा विद्युत: Q₀² / (2C)।
- t = T/4: संधारित्र खाली (q = 0), धारा सबसे ज़्यादा (i = I₀)। सारी ऊर्जा चुंबकीय: ½ L I₀²।
- t = T/2: संधारित्र फिर भरा, पर उल्टे चिह्न से। धारा शून्य।
- t = 3T/4: धारा फिर सबसे ज़्यादा, पर उल्टी दिशा में।
- t = T: वापस शुरुआत पर।
संधारित्र खाली होने पर धारा रुकती क्यों नहीं? क्योंकि कुंडली धारा के बदलाव का विरोध करती है (स्वप्रेरण, self-induction)। घटती धारा एक emf बनाती है जो आवेश को चलाए रखता है, और संधारित्र उल्टा आवेशित हो जाता है।
प्रतिरोध न हो तो कुल ऊर्जा स्थिर रहती है: q²/(2C) + ½ L i² = Q₀²/(2C) = ½ L I₀²। इसलिए I₀ = Q₀ / √(LC)।
यह स्प्रिंग पर लटके द्रव्यमान जैसा है: q विस्थापन जैसा, i वेग जैसा, L द्रव्यमान जैसा और 1/C स्प्रिंग नियतांक जैसा।
थॉमसन सूत्र: आवर्तकाल और आवृत्ति
आवेश cos की तरह बदलता है: q = Q₀ cos(ω₀t), और धारा i = −Q₀ω₀ sin(ω₀t)।
कोणीय आवृत्ति ω₀ = 1 / √(LC)। इसलिए आवर्तकाल का थॉमसन सूत्र है
T = 2π√(LC), और आवृत्ति f = 1 / (2π√(LC))।
- L हेनरी (H) में, C फैरड (F) में, T सेकंड (s) में, f हर्ट्ज़ (Hz) में।
- L (या C) चार गुना → T दोगुना। T वर्गमूल के हिसाब से बढ़ता है।
- हर भाग की ऊर्जा आवेश से दोगुनी तेज़ी से झूलती है: ऊर्जा का आवर्तकाल T/2 है।
यह कहाँ से आता है: घेरे में C का वोल्टेज (q/C) और L का वोल्टेज (L di/dt) जुड़कर शून्य होने चाहिए। इससे d²q/dt² = −q/(LC) मिलता है, जो सरल आवर्त गति का ही समीकरण है, ω² = 1/(LC) के साथ।
अवमंदित, प्रणोदित और स्वतः दोलन
अवमंदित दोलन (damped)
असली तारों में प्रतिरोध R होता है। हर चक्कर में कुछ ऊर्जा ऊष्मा (I²R) बन जाती है। आवेश का आयाम धीरे-धीरे घटता है। यह अवमंदित दोलन है। कम R: कई धीरे मरते झूले। बहुत ज़्यादा R: कोई झूला नहीं, संधारित्र बस धीरे खाली होता है।
प्रणोदित दोलन और अनुनाद
कोई AC स्रोत परिपथ को लगातार आवृत्ति f पर धकेले, तो परिपथ उसी आवृत्ति पर दोलन करता है (प्रणोदित दोलन, forced)। धारा सबसे ज़्यादा तब होती है जब धकेलने की आवृत्ति प्राकृतिक आवृत्ति 1/(2π√(LC)) के बराबर हो। यही अनुनाद (resonance) है। रेडियो ट्यूनिंग इसी पर चलती है।
स्वतः दोलन तंत्र (self-oscillating)
ऐसा तंत्र DC स्रोत से खुद ही बराबर दोलन बनाता है। इसमें तीन भाग हैं: LC परिपथ (आवृत्ति तय करता है), ऊर्जा स्रोत (बैटरी), और एक वाल्व जैसे ट्रांजिस्टर, जो परिपथ से मिले पुनर्निवेश (feedback) के सहारे हर चक्कर में सही समय पर ऊर्जा अंदर आने देता है। हर चक्कर में जितनी ऊर्जा जाती है, उतनी भरी जाती है, इसलिए आयाम स्थिर रहता है। पेंडुलम घड़ी भी ऐसे ही चलती है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- T = 2π√(LC) (थॉमसन सूत्र)
- f = 1 / (2π√(LC)), ω₀ = 1 / √(LC)
- q = Q₀ cos(ω₀t), i = −I₀ sin(ω₀t), I₀ = ω₀Q₀
- विद्युत ऊर्जा U_E = q² / (2C), चुंबकीय ऊर्जा U_B = ½ L i²
- कुल ऊर्जा U = Q₀² / (2C) = ½ L I₀² = स्थिर (बिना प्रतिरोध)
हल किए गए उदाहरण
1. LC परिपथ में L = 4 mH और C = 10 µF है। आवर्तकाल निकालो।
T = 2π√(LC) = 2π√(4×10⁻³ × 10×10⁻⁶) = 2π√(4×10⁻⁸) = 2π × 2×10⁻⁴ = 1.26×10⁻³ s ≈ 1.26 ms।
2. इसी परिपथ की आवृत्ति निकालो।
f = 1 / T = 1 / 1.26×10⁻³ ≈ 796 Hz।
3. धारिता 9 गुना कर दी गई। आवृत्ति का क्या होगा?
f ∝ 1/√C। √9 = 3, इसलिए आवृत्ति पहले की एक-तिहाई हो जाएगी।
4. 2 µF का संधारित्र 100 V तक आवेशित करके कुंडली से जोड़ा। दोलनों की कुल ऊर्जा निकालो।
Q₀ = CV = 2×10⁻⁶ × 100 = 2×10⁻⁴ C। U = Q₀²/(2C) = 4×10⁻⁸ / 4×10⁻⁶ = 0.01 J। (½CV² = ½ × 2×10⁻⁶ × 10⁴ = 0.01 J भी यही देता है।)
5. ऊपर वाले परिपथ में L = 0.5 H है। अधिकतम धारा निकालो।
सारी ऊर्जा चुंबकीय बनती है: ½ L I₀² = 0.01 J। I₀² = 0.02 / 0.5 = 0.04, तो I₀ = 0.2 A।
6. रेडियो में 1 µH की कुंडली है। 100 MHz पर ट्यून करने के लिए कितनी धारिता चाहिए?
C = 1 / (4π²f²L) = 1 / (4 × 9.87 × 10¹⁶ × 10⁻⁶) = 1 / (3.95×10¹¹) ≈ 2.5×10⁻¹² F = 2.5 pF।
7. किसी पल विद्युत ऊर्जा चुंबकीय ऊर्जा के बराबर है। तब आवेश Q₀ के रूप में कितना है?
दोनों कुल के आधे हैं: q²/(2C) = ½ × Q₀²/(2C)। q² = Q₀²/2, तो q = Q₀/√2 ≈ 0.71 Q₀। यह t = T/8 पर होता है।
आम गलतियाँ
- इकाई बदलना भूल जाना: mH → ×10⁻³ H, µF → ×10⁻⁶ F, pF → ×10⁻¹² F, फिर T = 2π√(LC) लगाओ।
- T ∝ LC मान लेना। सही है T ∝ √(LC): C चार गुना तो T सिर्फ़ दोगुना।
- मान लेना कि संधारित्र खाली होते ही धारा रुक जाती है। उस पल धारा सबसे ज़्यादा होती है।
- ऊर्जा का आवर्तकाल भी T मान लेना। ऊर्जा कभी ऋणात्मक नहीं होती, इसलिए वह हर T/2 पर दोहराती है।