एनालॉग सिग्नल प्रोसेसिंग क्या है?
एनालॉग संकेत वह वोल्टेज है जो कोई भी मान ले सकता है और लगातार बदलता है, जैसे माइक का वोल्टेज। प्रोसेसिंग का मतलब है उसे काम का बनाना: कुछ आवृत्तियाँ चुनना (फ़िल्टर करना) या उसे बड़ा करना (प्रवर्धन)।
LC अनुनाद फ़िल्टर
कुंडली (L) और संधारित्र (C) जोड़ने से LC परिपथ बनता है। ऊर्जा आगे-पीछे जाती है: C का विद्युत क्षेत्र → L का चुंबकीय क्षेत्र → फिर C। इसे दोलन कहते हैं।
f₀ = 1 / (2π√(LC))
कई आवृत्तियाँ आएँ तो परिपथ केवल f₀ के पास बड़ा आउटपुट देता है। इसलिए यह बैंड-पास फ़िल्टर (ट्यूनर) है।
ऊर्जा हानि और अवमंदन
तार का प्रतिरोध हर चक्र में कुछ ऊर्जा को ऊष्मा बनाता है। दोलन धीरे-धीरे थम जाते हैं (अवमंदन)। ज़्यादा प्रतिरोध = चौड़ा, चपटा शिखर।
Q गुणांक और बैंडविड्थ
बैंडविड्थ Δf वह चौड़ाई है जहाँ आउटपुट वोल्टेज अधिकतम का कम से कम 0.707 गुना है (आधी-शक्ति बिंदु)। Q = f₀ / Δf। ऊँचा Q = पतला, चुनिंदा शिखर।
आदर्श ऑपरेशनल एम्पलीफायर
ऑप-एम्प एक चिप है जिसके दो इनपुट हैं: नॉन-इनवर्टिंग (V₊) और इनवर्टिंग (V₋)।
Vout = A₀ (V₊ − V₋), जहाँ A₀ = खुला-लूप लाभ (बिना फीडबैक का लाभ)।
आदर्श ऑप-एम्प के गुण
- खुला-लूप लाभ अनंत
- इनपुट प्रतिरोध अनंत (इनपुट में कोई धारा नहीं जाती)
- आउटपुट प्रतिरोध शून्य
- बैंडविड्थ अनंत
- V₊ = V₋ हो तो आउटपुट 0
तुलनित्र (कम्पेरेटर) के रूप में
बिना फीडबैक के छोटा-सा अंतर भी बहुत बड़ा हो जाता है, इसलिए आउटपुट सप्लाई +Vs या −Vs पर अटक जाता है (संतृप्ति)। V₊ > V₋ तो +Vs, नहीं तो −Vs। जैसे अँधेरा होने पर स्ट्रीट लाइट जलाना।
खुद करके देखो: झूले में अनुनाद
झूले को उसकी अपनी लय पर धक्का दो तो वह ऊँचा जाता है; बेतरतीब धक्का दो तो मुश्किल से हिलता है। यही अनुनाद है। 3D में L = 5, C = 5 और फिर L = 20, C = 20 करके f₀ गिरता देखो।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- f₀ = 1 / (2π√(LC))
- Q = f₀ / Δf
- Vout = A₀(V₊ − V₋)
- संचित ऊर्जा: E = ½CV² = ½LI²
हल किए गए उदाहरण
1. L = 10 mH और C = 10 nF के लिए f₀ ज्ञात करो।
LC = 0.010 × 10×10⁻⁹ = 10⁻¹⁰; √LC = 10⁻⁵; f₀ = 1/(2π × 10⁻⁵) ≈ 15.9 kHz।
2. ट्यूनर का f₀ = 1.0 MHz और बैंडविड्थ 20 kHz है। Q कितना?
Q = 1 000 000 / 20 000 = 50।
3. C = 100 nF के साथ f₀ = 1.0 kHz चाहिए। L कितना हो?
L = 1/(4π²f₀²C) = 1/(4π² × 10⁶ × 10⁻⁷) ≈ 0.25 H।
4. सप्लाई ±12 V, A₀ = 10⁵, V₊ = 2.001 V, V₋ = 2.000 V। Vout?
10⁵ × 0.001 = 100 V, जो 12 V से ज़्यादा है, इसलिए आउटपुट +12 V पर संतृप्त होगा।
5. C चार गुना कर दें तो f₀ का क्या होगा?
f₀ ∝ 1/√C, इसलिए f₀ आधा हो जाता है।
6. A₀ = 2×10⁵ और आउटपुट 6 V (संतृप्त नहीं)। V₊ − V₋ कितना?
6 / (2×10⁵) = 3×10⁻⁵ V = 30 μV, लगभग शून्य। इसलिए V₊ ≈ V₋ मानते हैं।
आम गलतियाँ
- वर्गमूल भूल जाना: f₀ = 1/(2π√LC) है, 1/(2πLC) नहीं।
- mH और nF को H और F में बदले बिना सूत्र लगाना।
- सोचना कि ऊँचा Q = चौड़ी बैंडविड्थ। असल में उल्टा है।
- सोचना कि कम्पेरेटर का आउटपुट सप्लाई से ज़्यादा हो सकता है।