प्रवर्धक क्या करता है
संकेत (signal) वह वोल्टता है जो समय के साथ बदलती है और कोई जानकारी ले जाती है, जैसे आवाज़ या रेडियो संदेश। कई संकेत बहुत कमज़ोर होते हैं। प्रवर्धक कमज़ोर संकेत की मज़बूत नक़ल बना देता है।
अतिरिक्त शक्ति कहीं से पैदा नहीं होती। प्रवर्धक उसे विद्युत आपूर्ति (बैटरी या अडैप्टर) से लेता है, और इनपुट संकेत तय करता है कि कितनी शक्ति आउटपुट तक पहुँचे।
अंदर मुख्य भाग आमतौर पर ट्रांज़िस्टर होता है (एक छोटा स्विच जैसा पुर्ज़ा जिसे बहुत छोटी धारा से नियंत्रित किया जाता है), या ट्रांज़िस्टरों से भरी चिप।
लब्धि और डेसिबल
वोल्टता लब्धि बताती है कि आउटपुट कितने गुना बड़ा है: Av = Vout / Vin। इसका कोई मात्रक नहीं होता, क्योंकि यह अनुपात है।
इंजीनियर अक्सर डेसिबल (dB) इस्तेमाल करते हैं: dB में लब्धि = 20 × log10(Vout / Vin)। लब्धि 10 मतलब 20 dB। लब्धि 100 मतलब 40 dB। लब्धि 1000 मतलब 60 dB। हर 20 dB बढ़ने पर लब्धि 10 गुनी होती है।
जब दो प्रवर्धक चरण एक के बाद एक जुड़ते हैं, तो लब्धियाँ गुणा होती हैं, पर डेसिबल सीधे जुड़ते हैं।
शक्ति लब्धि = Pout / Pin, और dB में 10 × log10(Pout / Pin)।
निम्न आवृत्ति (ऑडियो) प्रवर्धक
निम्न आवृत्ति प्रवर्धक कुछ हर्ट्ज़ से लगभग 20 kHz तक के संकेतों पर काम करते हैं, यानी हमारे सुनने की सीमा। ये म्यूज़िक प्लेयर, रेडियो, सार्वजनिक घोषणा प्रणाली और टीवी के अंतिम चरण में मिलते हैं।
- बायसिंग: एक छोटी स्थिर वोल्टता ट्रांज़िस्टर को आधा चालू रखती है, ताकि वह संकेत के ऊपर और नीचे दोनों हिस्से पकड़ सके।
- कपलिंग संधारित्र: बदलता संकेत अगले चरण में जाने देता है, पर स्थिर बायस वोल्टता को रोकता है। इसीलिए बहुत कम आवृत्ति पर लब्धि गिरती है।
- वोल्टता चरण फिर शक्ति चरण: पहले चरण वोल्टता बढ़ाते हैं; अंतिम शक्ति प्रवर्धक स्पीकर चलाने लायक धारा देता है।
- पुश-पुल: दो ट्रांज़िस्टर काम बाँट लेते हैं; एक लहर का ऊपरी आधा हिस्सा धकेलता है और दूसरा निचला खींचता है। इसमें एक ट्रांज़िस्टर के हर समय काम करने (क्लास A) से कम गर्मी बर्बाद होती है।
आवृत्ति अनुक्रिया और बैंडविड्थ
प्रवर्धक हर आवृत्ति पर एक जैसी लब्धि नहीं देता। लब्धि बनाम आवृत्ति के ग्राफ़ को आवृत्ति अनुक्रिया कहते हैं। यह बीच में ऊँचा और दोनों सिरों पर नीचा होता है।
जहाँ लब्धि बीच के मान की लगभग 70% (0.707) रह जाती है, यानी 3 dB नीचे, वे दो बिंदु कट-ऑफ़ आवृत्तियाँ हैं। उनके बीच का अंतर बैंडविड्थ है: BW = fउच्च − fनिम्न।
निचला सिरा कपलिंग संधारित्र की वजह से गिरता है। ऊपरी सिरा ट्रांज़िस्टर और तारों की छोटी आवारा धारिताओं की वजह से गिरता है, जो तेज़ लहरों को बाहर रिसा देती हैं।
उच्च आवृत्ति (रेडियो) प्रवर्धक
उच्च आवृत्ति प्रवर्धक सैकड़ों किलोहर्ट्ज़ से कई गीगाहर्ट्ज़ तक के रेडियो संकेतों पर काम करते हैं। इनके पुर्ज़े तेज़ होने चाहिए और तार बहुत छोटे, क्योंकि ऊँची गति पर आवारा धारिता ज़्यादा असर करती है।
- RF प्रवर्धक: एरियल के ठीक बाद लगता है और बहुत कमज़ोर स्टेशन को कम शोर जोड़कर बढ़ाता है।
- IF प्रवर्धक: रेडियो रिसीवर में, संकेत को एक तय बीच की आवृत्ति पर लाने के बाद बढ़ाता है।
- ट्यून्ड प्रवर्धक: कुंडली और संधारित्र (LC परिपथ) से सिर्फ़ एक स्टेशन के आसपास की संकरी पट्टी बढ़ाता है, बाकी छोड़ देता है।
- शक्ति प्रवर्धक: ट्रांसमीटर में एरियल के लिए बड़ी शक्ति देता है।
चौड़ी पट्टी वाले प्रवर्धक में लब्धि × बैंडविड्थ लगभग तय रहती है: लब्धि ज़्यादा माँगो तो बैंडविड्थ कम मिलती है।
सीमाएँ: क्लिपिंग, शोर और विकृति
आउटपुट कभी आपूर्ति वोल्टता से ऊपर नहीं जा सकता। इनपुट बहुत बड़ा हो या लब्धि बहुत ज़्यादा, तो लहर के सिरे कट जाते हैं। इसे क्लिपिंग कहते हैं, और यह एक प्रकार की विकृति है। इससे नई, अनचाही आवाज़ें जुड़ जाती हैं।
शोर पुर्ज़ों से आने वाली अनियमित सरसराहट है। प्रवर्धक शोर को भी बढ़ाता है, इसलिए पहला चरण कम शोर वाला होना चाहिए।
ऋणात्मक पुनर्निवेश (आउटपुट का थोड़ा हिस्सा वापस भेजकर इनपुट घटाना) लब्धि घटाता है, पर उसे स्थिर और साफ़ बनाता है।
खुद करके देखो
3D दृश्य में लब्धि 12 करो और आउटपुट देखो। गिनो कि कितने वोल्ट होना चाहिए (0.5 V × 12 = 6 V)। आपूर्ति की सीमा 3.5 V है, इसलिए लहर कटती है। अब लब्धि इतनी घटाओ कि क्लिपिंग रुक जाए। घर पर फ़ोन में इयरफ़ोन लगाकर गाना बहुत तेज़ चलाओ: जो कर्कश आवाज़ सुनाई दे सकती है, वह फ़ोन के प्रवर्धक की क्लिपिंग है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- वोल्टता लब्धि Av = Vout / Vin
- dB में लब्धि = 20 log10(Vout / Vin)
- शक्ति लब्धि (dB) = 10 log10(Pout / Pin)
- श्रेणीक्रम चरण: Av = Av1 × Av2; dB = dB1 + dB2
- बैंडविड्थ BW = f(उच्च) − f(निम्न)
- अधिकतम आउटपुट ≈ आपूर्ति वोल्टता (इससे ऊपर क्लिपिंग)
हल किए गए उदाहरण
1. एक प्रवर्धक 20 mV इनपुट से 1 V आउटपुट देता है। वोल्टता लब्धि निकालो।
20 mV = 0.02 V। Av = 1 / 0.02 = 50।
2. लब्धि 50 को डेसिबल में निकालो।
dB = 20 log10(50) = 20 × 1.699 ≈ 34 dB।
3. माइक 5 mV देता है। दो चरणों वाले प्रवर्धक की लब्धियाँ 20 और 40 हैं। आउटपुट कितना होगा?
कुल लब्धि = 20 × 40 = 800। आउटपुट = 5 mV × 800 = 4000 mV = 4 V।
4. चरण 1 की लब्धि 20 dB और चरण 2 की 26 dB है। कुल लब्धि dB में और अनुपात में क्या होगी?
dB जुड़ते हैं: 20 + 26 = 46 dB। अनुपात: 20 dB यानी 10 गुना और 26 dB यानी लगभग 20 गुना, इसलिए कुल लगभग 200।
5. एक ट्यून्ड रेडियो प्रवर्धक की कट-ऑफ़ आवृत्तियाँ 455 kHz और 465 kHz हैं। बैंडविड्थ क्या है?
BW = 465 − 455 = 10 kHz।
6. लब्धि 30 और ±9 V आपूर्ति वाले प्रवर्धक को 0.5 V शिखर का इनपुट मिलता है। आउटपुट की चोटियों का क्या होगा?
आदर्श आउटपुट शिखर = 0.5 × 30 = 15 V। आपूर्ति की सीमा लगभग 9 V है, इसलिए लहर 9 V पर सपाट कट जाती है (ऊपर और नीचे दोनों)। विकृति होती है।
7. एक स्पीकर प्रवर्धक में 0.2 W जाता है और 20 W निकलता है। शक्ति लब्धि dB में निकालो।
अनुपात = 20 / 0.2 = 100। dB = 10 log10(100) = 20 dB।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि प्रवर्धक ऊर्जा बनाता है। वह सिर्फ़ आपूर्ति की ऊर्जा इस्तेमाल करता है, जिसे इनपुट नियंत्रित करता है।
- चरण जुड़ने पर लब्धियाँ जोड़ देना। अनुपात गुणा होते हैं; सिर्फ़ डेसिबल जुड़ते हैं।
- वोल्टता लब्धि में 20 log की जगह 10 log लगाना। वोल्टता के लिए 20 log, शक्ति के लिए 10 log।
- मात्रक भूलना: 20 mV को भाग देने से पहले 0.02 V बनाना ज़रूरी है।