नाटक क्या है?
नाटक वह कहानी है जो सिर्फ़ सुनाई नहीं, दिखाई जाती है। अभिनेता पात्र बनकर दर्शकों के सामने कहानी करते हैं। लिखे रूप को नाटक की पटकथा (स्क्रिप्ट) और मंच पर प्रस्तुति को रंगमंच कहते हैं।
पटकथा कहानी की किताब से अलग दिखती है:
- इसमें ज़्यादातर संवाद होते हैं, हर पंक्ति से पहले बोलने वाले पात्र का नाम।
- रंग-निर्देश (मंच निर्देश) कोष्ठक या तिरछे अक्षरों में बताते हैं कि कैसे चलें या बोलें, और सेट कैसा है।
- लंबे नाटक अंकों में और अंक दृश्यों में बँटते हैं।
- एक पात्र का लंबा भाषण एकालाप (मोनोलॉग) है। मंच पर अकेले मन की बात ज़ोर से कहना स्वगत कथन है। दर्शकों से धीमी टिप्पणी जो दूसरे पात्र 'नहीं सुनते' अपवारित (एसाइड) है।
रोज़मर्रा में भी नाटक है: शादी, स्कूल की प्रार्थना सभा और क्रिकेट मैच, सबमें भूमिकाएँ, पोशाक, 'मंच' और दर्शक होते हैं।
नाटक के तत्व
- पात्र: नाटक का व्यक्ति (या जानवर, या विचार)। मुख्य पात्र नायक, उसके रास्ते में खड़ा प्रतिनायक। हर पात्र की एक चाहत (उद्देश्य) होती है।
- द्वंद्व (संघर्ष): चाहतों की टक्कर। व्यक्ति बनाम व्यक्ति, व्यक्ति बनाम ख़ुद (अंदर का संदेह), व्यक्ति बनाम समाज, या व्यक्ति बनाम प्रकृति।
- कथानक: घटनाओं का क्रम। आम ढाँचा: परिचय (लोग और जगह) → चढ़ाव (मुश्किलें बढ़ती हैं) → चरम (सबसे ज़्यादा तनाव, मोड़) → उतार → समाधान (नई स्थिति)।
- संवाद: पात्र क्या बोलते हैं; इससे उनका स्वभाव दिखता है और कहानी आगे बढ़ती है।
- परिवेश: कब और कहाँ।
- विषय (थीम): नीचे छिपा बड़ा विचार, जैसे आज़ादी, ईर्ष्या या परिवार का कर्तव्य।
नाटक के रूप। त्रासदी दुख या हानि पर ख़त्म होती है, अक्सर नायक की अपनी कमी से। कॉमेडी (सुखांत/प्रहसन) हँसाती है और प्रायः सुखद अंत देती है। इसके अलावा फ़ार्स, मेलोड्रामा, संगीत नाटक, मूकाभिनय और नाट्य काव्य (पद्य में लिखा नाटक) भी हैं। कई सभ्यताओं की महान परंपराएँ हैं: प्राचीन यूनानी रंगमंच, संस्कृत नाटक, चीनी ऑपेरा और युआन काल के नाटक, जापानी नो, इंग्लैंड में शेक्सपियर, और 1800 के अंत का यथार्थवादी नाटक।
मंचकला: मंच, आवाज़ और शरीर
मंच के हिस्से। मंच नौ हिस्सों में बँटता है, जिनके नाम अभिनेता की नज़र से हैं जब वह दर्शकों की ओर मुँह करे: अपस्टेज (पीछे), डाउनस्टेज (आगे), स्टेज राइट (अभिनेता का दायाँ), स्टेज लेफ़्ट (अभिनेता का बायाँ)। 'अप' नाम पुराने ढलवाँ मंचों से आया जो पीछे की ओर ऊँचे होते थे।
आवाज़: अभिनेता ऊँचाई-धीमापन (वॉल्यूम), सुर (पिच), गति, ठहराव, लहजा (भाव) और उच्चारण सँभालता है। स्वर-प्रक्षेपण यानी बिना चीख़े आख़िरी पंक्ति तक आवाज़ पहुँचाना।
शरीर: मुद्रा (पोस्चर), हाव-भाव (जेस्चर), चेहरे के भाव, चाल और आँखों का संपर्क। शरीरों से बनी स्थिर तस्वीर को टैब्लो (फ़्रीज़ फ़्रेम) कहते हैं।
मंचन के तत्व: प्रकाश (रंग और चमक से माहौल), सेट (दृश्य-सज्जा), वेशभूषा और रूपसज्जा, प्रॉप्स (अभिनेता की इस्तेमाल की चीज़ें) और ध्वनि (संगीत, प्रभाव)।
पढ़ने से प्रस्तुति तक, और दर्शक
- नाटक साथ मिलकर ज़ोर से पढ़ो। हर पात्र की चाहत और बड़ा द्वंद्व खोजो।
- भूमिकाएँ बाँटो और दृश्य जमाओ (ब्लॉकिंग): कौन कहाँ खड़ा होगा और कैसे चलेगा।
- पूर्वाभ्यास (रिहर्सल): संवाद याद करो, अलग-अलग आवाज़ें आज़माओ, निर्देशक की टिप्पणी लो, दोहराओ।
- तकनीकी और ड्रेस रिहर्सल: रोशनी, ध्वनि, वेशभूषा और सेट जोड़ो।
- दर्शकों के सामने प्रस्तुति।
- समीक्षा: क्या अच्छा रहा, क्या सुधारें।
पाठ समझने के लिए नाटक। हॉट-सीटिंग (पात्र बनकर सवालों के जवाब), रोल-प्ले और फ़्रीज़ फ़्रेम से कहानी या कविता के भीतर उतर सकते हो।
रूपांतरण। कहानी को पटकथा बना सकते हो, या पुराने नाटक को आज की दुनिया में रख सकते हो (जैसे किसी क्लासिक त्रासदी को आज के शहर में)। सोचो क्या वैसा ही रहे और क्या बदले।
समीक्षा लिखना। नाटक किस बारे में है, फिर अभिनय, मंचन और डिज़ाइन पर उदाहरण सहित टिप्पणी, तुम्हें कैसा लगा, आज के जीवन से क्या जुड़ाव है, और किसे देखने की सलाह दोगे। रंगमंच सहानुभूति सिखाता है: दो घंटे तुम किसी और की ज़िंदगी जीते हो।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- पात्र + चाहत → द्वंद्व → कथानक
- कथानक: परिचय → चढ़ाव → चरम → उतार → समाधान
- मंच: अपस्टेज = पीछे, डाउनस्टेज = आगे; लेफ़्ट/राइट = दर्शकों की ओर मुँह किए अभिनेता का बायाँ/दायाँ
- आवाज़ के औज़ार: वॉल्यूम, सुर, गति, ठहराव, लहजा, उच्चारण, स्वर-प्रक्षेपण
- शरीर के औज़ार: मुद्रा, हाव-भाव, चेहरे के भाव, चाल, आँखों का संपर्क
- मंचन: प्रकाश, सेट, वेशभूषा, प्रॉप्स, ध्वनि
हल किए गए उदाहरण
1. निर्देशक कहता है: "डाउनस्टेज लेफ़्ट जाओ।" अभिनेता कहाँ जाएगा?
दर्शकों की ओर (डाउनस्टेज) और दर्शकों की ओर मुँह करके अपने बाएँ। दर्शकों को लगेगा कि वह उनकी दाईं ओर गया।
2. एक लड़की फ़ुटबॉल टीम में जाना चाहती है पर दादाजी कहते हैं लड़कियाँ नहीं खेलतीं। द्वंद्व का प्रकार और संभावित चरम बताओ।
व्यक्ति बनाम व्यक्ति (लड़की बनाम दादाजी) और व्यक्ति बनाम समाज (पुरानी सोच)। चरम: फ़ाइनल मैच जिसे दादाजी छिपकर देखने आते हैं।
3. कथानक के भाग पहचानो: (क) नायक आख़िर खलनायक से भिड़ता है, (ख) एक गरीब मछुआरे और उसके गाँव से परिचय, (ग) तूफ़ान बढ़ता है और नाव खो जाती है, (घ) नई नाव के साथ जीवन फिर शांत, (ङ) गाँव वाले मिलकर दोबारा बनाते हैं।
(ख) परिचय, (ग) चढ़ाव, (क) चरम, (ङ) उतार, (घ) समाधान।
4. अभिनेता बिना बोले कैसे दिखाए कि पात्र घबराया है?
आवाज़: तेज़ गति, ऊँचा सुर, छोटे ठहराव और अटकना। शरीर: हाथ मसलना, कम आँख मिलाना, एक पैर से दूसरे पर भार बदलना, दूसरों से दूर अपस्टेज खड़े रहना।
आम गलतियाँ
- स्टेज लेफ़्ट को दर्शकों का बायाँ मानना। यह हमेशा अभिनेता का बायाँ है।
- चरम को अंत समझना। चरम तनाव का शिखर है; समाधान उसके बाद आता है।
- रंग-निर्देशों को संवाद की तरह ज़ोर से पढ़ना। वे निर्देश हैं, बोलने की पंक्तियाँ नहीं।
- सुनाई देने के लिए चिल्लाना। स्वर-प्रक्षेपण साँस और साफ़ उच्चारण से होता है, चीख़ से नहीं।