France Terminale S2TMD (theatre, music and dance) — Terminale specialties
अध्याय: 6
1. Dance culture and science (dance)
Terminale dance perspectives · History of dance · Watching, analysing, arguing · Music culture for dancers · Body science for dancers
- नृत्य: तत्व, नृत्य-रचना और शैलियाँ – नृत्य शरीर की वह गति है जो स्थान और समय में, ऊर्जा के साथ, भावना जताने, कहानी सुनाने या उत्सव मनाने के लिए होती है। हर नृत्य को चार तत्वों से समझ सकते हैं: शरीर (क्या हिलता है), स्थान (कहाँ: स्तर, दिशा, रास्ते), समय (कब: ताल, लय, ठहराव) और ऊर्जा (कैसे: तीखी या कोमल, ज़ोरदार या हल्की)। नृत्य-रचना (कोरियोग्राफ़ी) मोटिफ़, दोहराव, कैनन, एकस्वरता, विरोधाभास और बनावट जैसे तरीक़ों से गतियाँ सजाने की कला है। अच्छे कलाकार तकनीक, सुरक्षा और भाव सीखते हैं, और अच्छे दर्शक देखी चीज़ का वर्णन, विश्लेषण, अर्थ और मूल्यांकन करते हैं। शास्त्रीय, लोक, बैले, हिप-हॉप – हर शैली अपनी संस्कृति और इतिहास से निकलती है।
- प्रस्तुति-विश्लेषण – किसी प्रस्तुति (नृत्य या नाटक) का विश्लेषण करने के लिए ध्यान से देखिए, बिना राय के जो दिखता और सुनाई देता है उसका वर्णन कीजिए, अर्थ निकालिए, और फिर प्रस्तुति से लिए कारणों के साथ राय दीजिए। पाँच तत्व देखिए: शरीर, स्थान, प्रकाश, ध्वनि, वेशभूषा या सज्जा। रचना-प्रक्रिया, नृत्य-निर्देशक या निर्देशक की विशिष्ट शैली, मंच और दर्शक का संबंध देखिए और प्रस्तुतियों की तुलना करके आलोचनात्मक दर्शक बनिए।
- संगीत का इतिहास: चैंट से पॉप तक – संगीत लेखन से भी पुराना है। हर संस्कृति ने अपना संगीत बनाया, अक्सर सुनकर सीखा गया, जैसे भारतीय राग, अफ़्रीकी ढोल और गमेलन। पाश्चात्य परंपरा के मुख्य युग हैं: मध्यकाल (चैंट, लगभग 500–1400), पुनर्जागरण (पॉलीफ़ोनी, 1400–1600), बारोक (1600–1750), क्लासिकल (1750–1820), रोमांटिक (1820–1910) और 20वीं सदी से आज (जैज़, रिकॉर्डिंग, फ़िल्म, पॉप, इलेक्ट्रॉनिक)। हर युग ने टेक्सचर (एक साथ कितनी रेखाएँ), समूह का आकार और समाज में संगीत की जगह बदली।
- गमन एवं संचलन – संचलन यानी शरीर के किसी भाग की स्थिति बदलना; गमन यानी पूरे शरीर का एक जगह से दूसरी जगह जाना। कोशिकाएँ तीन तरह चलती हैं: अमीबीय, पक्ष्माभी और कशाभिकीय। मनुष्य पेशीय गति करता है। पेशियाँ कंकाली, अंतरंग या हृद होती हैं। कंकाली पेशी तंतुओं से बनी है; हर तंतु में पेशी तंतुक हैं जो एक्टिन-मायोसिन वाले सार्कोमियरों की श्रृंखला हैं। तंत्रिका संकेत से Ca2+ छूटता है, मायोसिन सिर ATP से एक्टिन खींचते हैं और सार्कोमियर छोटा होता है (सर्पी तंतु सिद्धांत)। कंकाल में 206 हड्डियाँ हैं। संधियाँ रेशेदार, उपास्थिल या साइनोवियल (कंदुक-खल्लिका, कब्ज़ा, धुराग्र, विसर्पी, सैडल) होती हैं। रोग: मायस्थेनिया ग्रेविस, अपतानिका, पेशीय दुष्पोषण, संधिशोथ, अस्थि सुषिरता, गाउट।
2. Dance practice (dance)
Technique in the main style · Technique in a second style · Improvisation and composition workshops
- नृत्य: तत्व, नृत्य-रचना और शैलियाँ – नृत्य शरीर की वह गति है जो स्थान और समय में, ऊर्जा के साथ, भावना जताने, कहानी सुनाने या उत्सव मनाने के लिए होती है। हर नृत्य को चार तत्वों से समझ सकते हैं: शरीर (क्या हिलता है), स्थान (कहाँ: स्तर, दिशा, रास्ते), समय (कब: ताल, लय, ठहराव) और ऊर्जा (कैसे: तीखी या कोमल, ज़ोरदार या हल्की)। नृत्य-रचना (कोरियोग्राफ़ी) मोटिफ़, दोहराव, कैनन, एकस्वरता, विरोधाभास और बनावट जैसे तरीक़ों से गतियाँ सजाने की कला है। अच्छे कलाकार तकनीक, सुरक्षा और भाव सीखते हैं, और अच्छे दर्शक देखी चीज़ का वर्णन, विश्लेषण, अर्थ और मूल्यांकन करते हैं। शास्त्रीय, लोक, बैले, हिप-हॉप – हर शैली अपनी संस्कृति और इतिहास से निकलती है।
3. Music culture and science (music)
Terminale music perspectives · History of music and the arts · Music cultures, analysis and listening · Digital music and instruments · Acoustics · Sociology of music practice and distribution
- संगीत रसास्वादन: संगीत को कैसे सुनें और समझें – संगीत रसास्वादन (music appreciation) का मतलब है ध्यान से सुनना, संगीत में क्या हो रहा है यह पहचानना, और उसके बारे में बात कर पाना। हर रचना कुछ तत्वों से बनती है: पिच और धुन, लय और गति (टेम्पो), गतिकी (धीमा-तेज़), ध्वनि-रंग (टिम्बर), बनावट (कितनी परतें) और रूप (रचना की योजना)। ये शब्द जानकर तुम किसी भी संस्कृति का संगीत – सिम्फनी, राग या फ़िल्मी गाना – आपस में तुलना कर सकते हो और बता सकते हो कि तुम्हें वह क्यों पसंद है।
- संगीत का इतिहास: चैंट से पॉप तक – संगीत लेखन से भी पुराना है। हर संस्कृति ने अपना संगीत बनाया, अक्सर सुनकर सीखा गया, जैसे भारतीय राग, अफ़्रीकी ढोल और गमेलन। पाश्चात्य परंपरा के मुख्य युग हैं: मध्यकाल (चैंट, लगभग 500–1400), पुनर्जागरण (पॉलीफ़ोनी, 1400–1600), बारोक (1600–1750), क्लासिकल (1750–1820), रोमांटिक (1820–1910) और 20वीं सदी से आज (जैज़, रिकॉर्डिंग, फ़िल्म, पॉप, इलेक्ट्रॉनिक)। हर युग ने टेक्सचर (एक साथ कितनी रेखाएँ), समूह का आकार और समाज में संगीत की जगह बदली।
- वाद्य यंत्र (Musical Instruments) – हर वाद्य किसी चीज़ में कंपन कराता है: तार, हवा का स्तंभ, तनी खाल, ठोस वस्तु या इलेक्ट्रॉनिक सर्किट और स्पीकर। हम वाद्यों को इसी से बाँटते हैं कि क्या काँपता है: तत (तार), सुषिर (हवा), अवनद्ध (खाल), घन (ठोस) और इलेक्ट्रॉनिक। छोटा, कसा या पतला हिस्सा ऊँचा स्वर देता है। हर वाद्य का अपना टिम्बर (स्वर का रंग) होता है क्योंकि वह हार्मोनिक्स का अपना मिश्रण जोड़ता है। ऑर्केस्ट्रा या बैंड में वाद्य मिलकर समृद्ध रंग बनाते हैं।
- ध्वनि – ध्वनि कंपन करती वस्तुओं से बनती है। यह किसी माध्यम (हवा, पानी, ठोस) में अनुदैर्ध्य तरंग के रूप में चलती है: कण आगे-पीछे हिलते हैं, कहीं घने हो जाते हैं (संपीडन) और कहीं फैल जाते हैं (विरलन)। आवृत्ति (Hz) से तारत्व (पिच), आयाम से प्रबलता तय होती है, और चाल v = f × λ। निर्वात में ध्वनि नहीं चलती। हम 20 Hz से 20,000 Hz सुनते हैं; इससे कम अवश्रव्य, ज़्यादा पराश्रव्य। परावर्तित ध्वनि से प्रतिध्वनि बनती है।
- संस्कृति का समाजशास्त्र: कौन क्या पसंद करता है, और क्यों – समाजशास्त्र में संस्कृति का मतलब जीने के तरीके और साझा चलन हैं: लोग क्या पढ़ते, देखते, बजाते और सुनते हैं। ये सिर्फ़ निजी पसंद नहीं। अध्ययन उम्र, वर्ग व पढ़ाई, लिंग और जगह के पैटर्न दिखाते हैं, क्योंकि परिवार, स्कूल, दोस्त और पैसा पसंद को गढ़ते हैं। डिजिटल स्ट्रीमिंग से पहुँच बढ़ी है, पर डिवाइस, डेटा और जानकारी के फ़ासले बने हैं, और बहुत से लोग अब मिली-जुली पसंद रखते हैं (सर्वभक्षी)। यात्रा और मीडिया से संस्कृतियाँ भी मिलती हैं। इन दावों को परखने के लिए दर्शक-आँकड़े सावधानी से पढ़ने होते हैं। संगीत में हम पूछते हैं कि कौन बजाता है और कौन सुनता है, संगीत लोगों तक कैसे पहुँचता है (लाइव, रेडियो, रिकॉर्डिंग, स्ट्रीमिंग) और एक एल्बम, उत्सव या विज्ञापन कारोबार के बारे में क्या बताते हैं।
4. Music practice (music)
Sustained practice in a main area · Ensemble practice · Creating and inventing · Group singing · Body and voice awareness, gesture, posture
- संगीत प्रस्तुति (Music Performance): एकल और समूह में – संगीत प्रस्तुति यानी श्रोताओं के सामने कोई रचना बजाना या गाना। अच्छी प्रस्तुति में शुद्धता (सही सुर, सही लय), एक-सी ताल (टेम्पो), भाव दिखाने के लिए डायनेमिक्स और फ़्रेज़िंग, और शैली के अनुसार वादन होता है। समूह में कलाकार एक-दूसरे को सुनते हैं, आवाज़ का संतुलन रखते हैं और इशारों पर चलते हैं। अच्छी तैयारी = धीमा, सही रियाज़, छोटे टुकड़ों में, फिर गति बढ़ाना और दूसरों को सुनाना।
- संगीत रचना: छोटे-से विचार से पूरी धुन कैसे बने – रचना (composing) मतलब छोटे विचारों से संगीत बनाना। एक मोटिफ़ (कुछ स्वर) से शुरू करो। उसे दोहराव, सीक्वेंस (वही आकार ऊपर या नीचे) और बदलाव (लय बदलो, उल्टा करो) से बढ़ाओ। नीचे सुरसंगति रखो: I, IV, V, I जैसे कॉर्ड, और अंत में कैडेंस। बनावट चुनो (अकेली धुन, कॉर्ड के साथ धुन, या कई धुनें एक साथ)। पूरे टुकड़े को A B A या मुखड़ा-अंतरा जैसे रूप में ढालो। तात्कालिक रचना (improvisation) मौके पर रचना है। ब्रीफ़ बताता है मक़सद, लंबाई और वाद्य।
5. Theatre culture and science (theatre)
Terminale theatre perspectives · History of theatre · Theatre and the other arts · Contemporary live-performance aesthetics · Analysing shows
- रंगमंच अध्ययन: जीवित प्रस्तुति को कैसे पढ़ें – रंगमंच दर्शकों के लिए बनी जीवित कला है। इसे पढ़ने के लिए तीन नज़रें हैं: समाज (जगह, दर्शक, राजनीति), भाषा (पाठ, छंद, विधा, मंच-कौशल) और सौंदर्य-शास्त्र (अभिनय और निर्देशन की शैलियाँ)। मंच का आकार, इतिहास और कलाओं का मेल किसी प्रस्तुति का अर्थ बदल देते हैं।
- प्रस्तुति-विश्लेषण – किसी प्रस्तुति (नृत्य या नाटक) का विश्लेषण करने के लिए ध्यान से देखिए, बिना राय के जो दिखता और सुनाई देता है उसका वर्णन कीजिए, अर्थ निकालिए, और फिर प्रस्तुति से लिए कारणों के साथ राय दीजिए। पाँच तत्व देखिए: शरीर, स्थान, प्रकाश, ध्वनि, वेशभूषा या सज्जा। रचना-प्रक्रिया, नृत्य-निर्देशक या निर्देशक की विशिष्ट शैली, मंच और दर्शक का संबंध देखिए और प्रस्तुतियों की तुलना करके आलोचनात्मक दर्शक बनिए।
6. Theatre practice (theatre)
Advanced acting training · Advanced interpretation · Techniques and practices · Designing and staging projects
- अभिनय: किरदार को ज़िंदा करना – अभिनय यानी किसी किरदार को दर्शकों के सामने सच्चाई से दिखाना। अभिनेता पहले परिस्थितियाँ (कौन, कहाँ, कब) और किरदार का लक्ष्य (उसे क्या चाहिए) समझता है। फिर शरीर (मुद्रा, हाव-भाव, स्तर, रुतबा) और आवाज़ (ज़ोर, रफ़्तार, सुर, ठहराव) से उसे दिखाता है। मंच पर अभिनय क्रिया और प्रतिक्रिया है: साथी को सुनो और जवाब दो। टाइमिंग, पॉज़ और तनाव दृश्य को आकार देते हैं, और रंगमंच असली सामाजिक मुद्दों को भी उठा सकता है।
- नाटक: तत्व, मंचकला और प्रस्तुति – नाटक ऐसी कहानी है जिसे अभिनेता पात्र बनकर दर्शकों के सामने करके दिखाते हैं। हर नाटक में पात्र होते हैं जो कुछ चाहते हैं, उनकी चाहतें टकराती हैं तो द्वंद्व बनता है, कथानक तनाव को चरम तक ले जाकर सुलझाता है, और साथ में संवाद, परिवेश और विषय होते हैं। मंच पर अभिनेता आवाज़ और शरीर से काम करते हैं, और प्रकाश, सेट, वेशभूषा व ध्वनि मंचन को पूरा करते हैं।