ध्वनि कैसे बनती और कैसे चलती है?
हर ध्वनि कंपन से शुरू होती है: गिटार का तार, हमारी स्वर रज्जु, ढोल की खाल, स्पीकर का शंकु। गुनगुनाते समय गले को छुओ, कंपन महसूस होगा।
कंपन करती वस्तु पास के हवा के कणों को धकेलती है। वे अगले कणों को धकेलते हैं, और यह चलता रहता है। कण हमारे कान तक नहीं आते; हर कण अपनी जगह के आसपास आगे-पीछे हिलता है। जो आगे बढ़ता है वह विक्षोभ (ऊर्जा) है। इसी चलते विक्षोभ को तरंग कहते हैं।
संपीडन और विरलन
शंकु आगे आए तो कण भीड़ बना लेते हैं: संपीडन (ज़्यादा दाब, ज़्यादा घनत्व)। पीछे जाए तो कण फैल जाते हैं: विरलन (कम दाब, कम घनत्व)।
अनुदैर्ध्य तरंग
ध्वनि में कण उसी दिशा में आगे-पीछे हिलते हैं जिसमें तरंग चलती है। ऐसी तरंग अनुदैर्ध्य तरंग है। (अनुप्रस्थ तरंग में, जैसे रस्सी पर लहर, कण ऊपर-नीचे, तरंग से समकोण पर हिलते हैं।)
ध्वनि को माध्यम चाहिए
ध्वनि को धकेलने के लिए कण चाहिए। यह ठोस, द्रव और गैस में चलती है, पर निर्वात में नहीं। घंटी बजते जार से हवा निकालो तो आवाज़ धीमी होती जाती है, भले घंटी हिलती रहे। इसीलिए अंतरिक्ष यात्री रेडियो से बात करते हैं।
आवृत्ति, आयाम, आवर्तकाल और चाल
- तरंगदैर्ध्य (λ): दो पास के संपीडनों (या दो विरलनों) के बीच की दूरी। मात्रक: मीटर।
- आवृत्ति (f): एक सेकंड में किसी बिंदु से गुज़रने वाली पूरी तरंगों की संख्या। मात्रक: हर्ट्ज़ (Hz)। 1 Hz = प्रति सेकंड 1 तरंग।
- आवर्तकाल (T): एक पूरी तरंग का समय। T = 1 ÷ f।
- आयाम (A): सामान्य स्थिति से सबसे बड़ा बदलाव (कण कितना हिलते हैं, दाब कितना बढ़ता है)।
तारत्व (पिच) और प्रबलता
तारत्व बताता है आवाज़ कितनी पतली या भारी लगती है। यह आवृत्ति पर निर्भर है। सीटी या छोटी चिड़िया की आवाज़ ऊँची पिच की, शेर की दहाड़ या ढोल नीची पिच की।
प्रबलता (तेज़ या धीमी) आयाम पर निर्भर है। ढोल ज़ोर से बजाओ: बड़ा कंपन, बड़ा आयाम, तेज़ आवाज़। प्रबलता डेसिबल (dB) में नापते हैं।
गुणता से हम एक ही सुर पर बजती बाँसुरी और वायलिन को अलग पहचानते हैं। यह तरंग के आकार पर निर्भर है।
ध्वनि की चाल
एक आवर्तकाल में तरंग एक तरंगदैर्ध्य आगे बढ़ती है, इसलिए v = λ ÷ T = f × λ।
चाल माध्यम और ताप पर निर्भर है, आवृत्ति पर नहीं। लगभग: हवा 340 m/s, पानी 1500 m/s, इस्पात 5000 m/s। ठोस में ध्वनि सबसे तेज़। गर्म हवा में थोड़ी तेज़।
ध्वनि तरंगों के ग्राफ़
हवा के कण दिखते नहीं, इसलिए हम ग्राफ़ बनाते हैं। x-अक्ष पर दूरी (या समय), y-अक्ष पर घनत्व या दाब।
- ग्राफ़ का शृंग (चोटी) = संपीडन।
- गर्त (घाटी) = विरलन।
- दूरी वाले ग्राफ़ में एक शृंग से अगले शृंग तक = तरंगदैर्ध्य।
- समय वाले ग्राफ़ में एक शृंग से अगले तक = आवर्तकाल।
- बीच की रेखा से शृंग की ऊँचाई = आयाम।
दो ग्राफ़ मिलाओ: शृंग पास-पास तो आवृत्ति ज़्यादा (पिच ऊँची); शृंग ऊँचे तो आयाम ज़्यादा (आवाज़ तेज़)। 3D का दूसरा चरण चलते कणों के ऊपर यही लाल लहर बनाता है।
ध्वनि का परावर्तन: प्रतिध्वनि और अनुरणन
ध्वनि कठोर सतह से वैसे ही टकराकर लौटती है जैसे प्रकाश दर्पण से: आपतन कोण = परावर्तन कोण।
प्रतिध्वनि
प्रतिध्वनि वह परावर्तित ध्वनि है जो हमें अलग से सुनाई दे। दिमाग़ किसी आवाज़ को लगभग 0.1 s तक याद रखता है, इसलिए प्रतिध्वनि कम से कम 0.1 s बाद लौटनी चाहिए। 344 m/s पर ध्वनि को कुल 344 × 0.1 = 34.4 m चलना होगा, यानी दीवार कम से कम लगभग 17.2 m दूर हो।
दीवार की दूरी: d = v × t ÷ 2 (2 से भाग, क्योंकि ध्वनि जाती और लौटती है)।
अनुरणन
बड़े हॉल में ध्वनि बार-बार टकराकर देर तक गूँजती रहती है। इसे अनुरणन कहते हैं। ज़्यादा अनुरणन से बोली साफ़ नहीं सुनाई देती। इसलिए हॉल में पर्दे, गद्देदार कुर्सियाँ, कालीन और खुरदरे बोर्ड लगाते हैं जो ध्वनि सोख लेते हैं।
बहु-परावर्तन के उपयोग
मेगाफ़ोन और हॉर्न ध्वनि को आगे भेजते हैं। स्टेथोस्कोप में दिल की धड़कन नली के अंदर बार-बार परावर्तित होकर डॉक्टर के कान तक पहुँचती है। मंच के पीछे घुमावदार बोर्ड आवाज़ को दर्शकों की ओर भेजता है।
ऐतिहासिक इमारतों में ध्वनिकी
ध्वनिकी यानी किसी जगह में ध्वनि कैसे व्यवहार करती है, इसका विज्ञान। पुराने कारीगर इसका बढ़िया उपयोग करते थे।
- गोल गुम्बज, विजयपुरा (बीजापुर): इसका विशाल गुम्बद एक फुसफुसाहट गैलरी बनाता है। दीवार के पास की फुसफुसाहट घुमावदार गुम्बद में बार-बार परावर्तित होकर दूसरी ओर साफ़ सुनाई देती है। ताली कई बार गूँजती है।
- गोलकोंडा किला, हैदराबाद: प्रवेश द्वार के गुम्बद के नीचे ताली किले की चोटी तक सुनाई देती है; इसका उपयोग चेतावनी संकेत के लिए होता था।
- प्राचीन खुले रंगमंच कटोरे जैसे, ऊपर उठती सीढ़ियों वाले होते थे, ताकि अभिनेता की आवाज़ बिना स्पीकर के आखिरी पंक्ति तक पहुँचे।
- मंदिर और गुम्बद: घुमावदार छत ध्वनि को इकट्ठा करती है; घंटी और मंत्र अनुरणन से देर तक गूँजते हैं।
आज के सभागार भी इन्हीं विचारों पर बनते हैं, और ज़रूरत हो तो ध्वनि सोखने वाली चीज़ें लगाई जाती हैं।
श्रव्यता का परिसर: अवश्रव्य और पराश्रव्य
मनुष्य लगभग 20 Hz से 20,000 Hz (20 kHz) तक सुन सकता है। बच्चे बड़ों से ऊँची आवाज़ें सुन लेते हैं।
अवश्रव्य (20 Hz से कम)
हमारे लिए बहुत नीची। हाथी और व्हेल इससे दूर तक बात करते हैं। भूकंप के मुख्य झटके से पहले अवश्रव्य तरंगें निकलती हैं, जिन्हें कुछ जानवर महसूस करते लगते हैं। धीरे झूलता लोलक भी अवश्रव्य बनाता है।
पराश्रव्य (20 kHz से ज़्यादा)
हमारे लिए बहुत ऊँची। कुत्ते, चमगादड़, डॉल्फ़िन इसे सुन सकते हैं। उपयोग:
- अल्ट्रासाउंड जाँच: बिना नुकसान गर्भ में बच्चा, जिगर, गुर्दे और दिल (इकोकार्डियोग्राफ़ी) देखना।
- गुर्दे की पथरी को बारीक कणों में तोड़ना।
- सर्पिल नली और इलेक्ट्रॉनिक पुर्ज़ों जैसे कठिन हिस्सों की सफ़ाई।
- धातु के टुकड़ों में अंदर की दरार ढूँढना: पराश्रव्य आर-पार जाती है, पर दरार से लौट आती है।
- सोनार (SONAR): जहाज़ पराश्रव्य नीचे भेजकर प्रतिध्वनि का समय नापते हैं और समुद्र की गहराई, पनडुब्बी या मछलियों का पता लगाते हैं। गहराई = v × t ÷ 2।
- चमगादड़ अँधेरे में पराश्रव्य की प्रतिध्वनि सुनकर उड़ते और शिकार करते हैं।
घर पर करके देखो
स्प्रिंग वाली तरंग: स्लिंकी (या लंबी स्प्रिंग) को दोस्त के साथ ज़मीन पर फैलाओ। एक सिरे को जल्दी से आगे-पीछे करो। भीड़ वाला हिस्सा आगे दौड़ता दिखेगा: यही संपीडन है, जैसा चरण 1 में।
धागे वाला फ़ोन: दो कागज़ के कप 5 m लंबे तने धागे से जोड़ो। एक में बोलो। तने धागे (ठोस) से ध्वनि हवा से बेहतर जाती है।
पिच प्रयोग: स्टील का स्केल मेज़ के किनारे दबाकर टंकार करो। बाहर वाला हिस्सा छोटा करो: पहले अंदाज़ा लगाओ, फिर जाँचो कि पिच ऊँची हुई (आवृत्ति बढ़ी)। ज़ोर से टंकार करो: आवाज़ तेज़, पिच वही।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- v = f × λ
- T = 1 ÷ f
- f = 1 ÷ T (Hz)
- प्रतिध्वनि / सोनार: दूरी = v × t ÷ 2
- प्रतिध्वनि के लिए न्यूनतम दूरी ≈ 17.2 m (v = 344 m/s)
- श्रव्य परिसर: 20 Hz – 20 kHz
हल किए गए उदाहरण
1. एक ध्वनि की आवृत्ति 500 Hz और तरंगदैर्ध्य 0.68 m है। चाल ज्ञात करो।
v = f × λ = 500 × 0.68 = 340 m/s।
2. एक ध्वनि का आवर्तकाल 0.002 s है। आवृत्ति?
f = 1 ÷ T = 1 ÷ 0.002 = 500 Hz।
3. 170 Hz की ध्वनि हवा में 340 m/s से चलती है। तरंगदैर्ध्य?
λ = v ÷ f = 340 ÷ 170 = 2 m।
4. एक लड़का चट्टान के सामने ताली बजाता है और 2 s बाद प्रतिध्वनि सुनता है। चाल 340 m/s। चट्टान कितनी दूर है?
कुल रास्ता = 340 × 2 = 680 m। दूरी = 680 ÷ 2 = 340 m।
5. जहाज़ के सोनार को समुद्र तल से प्रतिध्वनि 3 s बाद मिलती है। समुद्री पानी में चाल 1500 m/s। गहराई?
गहराई = 1500 × 3 ÷ 2 = 2250 m।
6. बिजली चमकी और 4 s बाद गड़गड़ाहट सुनाई दी। बिजली कितनी दूर है? (v = 340 m/s)
प्रकाश लगभग तुरंत आता है। दूरी = 340 × 4 = 1360 m (यहाँ 2 से भाग नहीं, ध्वनि एक ही ओर चली)।
7. 0.1 s में किसी बिंदु से 20 संपीडन गुज़रते हैं। आवृत्ति? क्या हम इसे सुन सकते हैं?
f = 20 ÷ 0.1 = 200 Hz। यह 20 Hz और 20,000 Hz के बीच है, इसलिए सुनाई देगी।
8. साफ़ प्रतिध्वनि के लिए कम से कम लगभग 17 m दूरी क्यों चाहिए?
प्रतिध्वनि कम से कम 0.1 s बाद लौटे। कुल रास्ता = 344 × 0.1 = 34.4 m, जिसका आधा दीवार तक की दूरी है: 17.2 m।
आम गलतियाँ
- सोचना कि हवा के कण स्रोत से कान तक आते हैं। वे बस आगे-पीछे हिलते हैं; ऊर्जा आगे जाती है।
- पिच और प्रबलता में गड़बड़। पिच = आवृत्ति, प्रबलता = आयाम।
- प्रतिध्वनि और सोनार के सवालों में 2 से भाग देना भूलना।
- सोचना कि ऊँची आवृत्ति वाली ध्वनि तेज़ चलती है। एक माध्यम में सब आवृत्तियाँ एक ही चाल से चलती हैं; λ छोटी हो जाती है।