पूरा नाटक पढ़ना और कथानक
पहले पूरा नाटक कहानी के लिए एक बार पढ़िए। फिर पास से देखिए।
- किसे क्या चाहिए? उसे कौन रोकता है?
- नाटक अंकों और दृश्यों में कैसे बँटा है?
- मोड़ कहाँ है?
- मुख्य विचार (थीम) क्या है?
कथानक आमतौर पर एक आरोह-अवरोह पर चलता है: आरंभ (लोग और जगह मिलते हैं), बढ़ता द्वंद्व, चरम (सबसे ऊँचा तनाव), ढलान, अंत (समाधान या खुला अंत)।
पात्र और चरित्र-चित्रण
नाटक में कोई पात्रों को समझाकर नहीं बताता। हम उन्हें इन चीज़ों से जानते हैं:
- वे क्या कहते हैं (शब्द-चयन, शिष्टता, झूठ)।
- वे क्या करते हैं (कर्म और फ़ैसले)।
- दूसरे उनके बारे में क्या कहते हैं।
- मंच-निर्देश (लहजा, हरकत, वस्तुएँ)।
पूछिए: यह व्यक्ति क्या चाहता है, किससे डरता है, और अंत तक कैसे बदलता है?
मंच-निर्देश और पात्रों की भाषा
मंच-निर्देश लेखक के कोष्ठक या तिरछे अक्षरों में लिखे नोट हैं: कौन आता है, पंक्ति कैसे बोली जाए, मंच-सज्जा कैसी है, रोशनी और ध्वनि।
कथन के रूप:
- संवाद: दो या अधिक लोगों की बातचीत; रिश्ते और द्वंद्व दिखाता है।
- एकालाप (Monologue): एक पात्र का दूसरों से लंबा भाषण।
- स्वगत कथन (Soliloquy): अकेला पात्र अपने विचार ज़ोर से बोलता है।
- अपवार्य (Aside): दर्शकों से तेज़ पंक्ति, जिसे बाकी पात्र "नहीं सुनते"।
चुप्पी और छोटी, टूटी पंक्तियों पर भी ध्यान दीजिए। उनमें गहरी भावनाएँ हो सकती हैं।
विधाएँ: त्रासदी, सुखांत और नाटक
विधा (genre) नाटक का प्रकार है।
- त्रासदी (Tragedy): गंभीर कथा जिसमें मुख्य पात्र गिरता है, अक्सर दोष या भाग्य के कारण; गहरा और दुखद लगता है।
- सुखांत/हास्य (Comedy): हल्की कथा जो मानवीय कमज़ोरियों या गड़बड़ियों पर हँसाती है और प्रायः सुखद अंत देती है; हँसी से सच दिखाया जाता है।
- नाटक (Drama): साधारण लोगों और समस्याओं की गंभीर, यथार्थ कथा, जरूरी नहीं कि दुखद पतन हो।
हास्य में देखिए: पहचान की गलतफ़हमी, अतिशयोक्ति, शब्दों का खेल, पात्र का टाइप (कंजूस, डींग हाँकने वाला)।
शास्त्रीय, आधुनिक और युद्धोत्तर रंगमंच
रंगमंच अपने समय के साथ बदलता है।
- शास्त्रीय (17वीं सदी): कड़े नियम, पाँच अंक, एक जगह, एक दिन, एक मुख्य कार्य, सुंदर पद्य, साफ़ नैतिकता।
- 18वीं-19वीं सदी: ज़्यादा भावना, सामाजिक विषय, यथार्थ कमरे।
- 20वीं सदी: नए रूप: यथार्थवाद, एपिक थिएटर जो दर्शक को सोचने पर लगाता है, और बेतुका रंगमंच (absurd), जहाँ बातें गोल-गोल घूमती हैं क्योंकि जीवन अर्थहीन लगता है।
- युद्धोत्तर नाटक: युद्ध और क्षति से बना, अक्सर टूटी बातचीत, चुप्पी, व्यंग्य और खुला अंत।
कोई एक नाटक पढ़ते समय हमेशा बताइए कि वह कब लिखा गया और उसकी बनावट में यह कैसे दिखता है।
प्रस्तुति देखना
नाटक मंच पर जीवित होता है। प्रस्तुति देखें तो पाठ से तुलना कीजिए।
- निर्देशक ने क्या काटा या जोड़ा?
- अभिनेताओं ने मुख्य पंक्तियाँ कैसे बोलीं?
- मंच-सज्जा, रोशनी, ध्वनि और वेशभूषा ने क्या बताया?
- क्या मंचन ने उस अर्थ को बदला जो आपको पन्ने पर मिला था?
करके देखिए: 10 पंक्तियों का कोई दृश्य चुनिए। उसे दो बार पढ़िए, एक बार शांत और एक बार गुस्से में। देखिए अर्थ में क्या बदला।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- आरोह-अवरोह: आरंभ, बढ़ता द्वंद्व, चरम, ढलान, अंत
- पात्र = जो कहे + जो करे + जो दूसरे कहें + निर्देश
- कथन के रूप: संवाद, एकालाप, स्वगत, अपवार्य
- शास्त्रीय ढाँचा: 5 अंक, 1 जगह, 1 दिन, 1 कार्य
हल किए गए उदाहरण
1. मंच-निर्देश कौन सा है: MIRA: "I will not go." (She slams the door.)
(She slams the door.) यह कोष्ठक में है और हरकत बताता है, संवाद नहीं।
2. अकेला पात्र किसी से नहीं, बस "यह मैंने क्या कर दिया?" कहता है। यह कौन सा कथन-रूप है?
स्वगत कथन (soliloquy): अकेला पात्र विचार ज़ोर से बोलता है।
3. नायक को तीसरे अंक में रहस्य पता चलता है और सब बदल जाता है। यह आरोह-अवरोह में कहाँ है?
यह चरम (climax) है, सबसे ऊँचे तनाव का मोड़।
4. आधुनिक नाटक में शांत विराम इतना प्रभावशाली क्यों हो सकता है?
विराम वह दिखाता है जो पात्र कह नहीं पाते। दर्शक भावना खुद भरता है, इसलिए चुप्पी अर्थ देती है।
आम गलतियाँ
- कथानक दोहरा देना, विश्लेषण न करना। हमेशा बताइए कि लेखक कैसे और क्यों कुछ दिखाता है।
- मंच-निर्देशों को गैर-ज़रूरी मानना। वे लहजा, हरकत और मनोदशा देते हैं।
- एकालाप और स्वगत को मिलाना। स्वगत अकेले में बोला जाता है; एकालाप दूसरों से।
- पुराने नाटक को आज के नियमों से परखना। उसकी बनावट को उसके काल से जोड़िए।