नाटक 'आधुनिक' कैसे बनता है?
आधुनिक नाटक आमतौर पर लगभग 1880 के बाद लिखे नाटक हैं। उससे पहले लोकप्रिय रंगमंच में मेलोड्रामा छाया था: अच्छाई बनाम बुराई, रंगे पर्दे, तेज़ भावनाएँ, सुखद अंत।
'नया नाटक' (लगभग 1880–1914) ने यह बदला। हेनरिक इब्सन (नॉर्वे), ऑगस्ट स्ट्रिंडबर्ग (स्वीडन), एंटन चेख़व (रूस) और बर्नार्ड शॉ ने असली सामाजिक समस्याओं पर लिखा: विवाह, पैसा, वर्ग, बीमारी, दिखावा।
- राजा-नायक नहीं, आम पात्र।
- पद्य नहीं, रोज़ की गद्य भाषा।
- खुले या असहज अंत, जो सोचने पर मजबूर करें।
- उप-पाठ (subtext): जो पात्र महसूस करते हैं पर कहते नहीं।
यथार्थवाद, प्रकृतिवाद और चौथी दीवार
यथार्थवाद जीवन को जैसा दिखता है वैसा दिखाता है: विश्वसनीय कमरा (बॉक्स सेट), असली फ़र्नीचर, सहज अभिनय। प्रकृतिवाद और आगे जाकर दिखाता है कि वंश और माहौल इंसान को कैसे गढ़ते हैं।
चौथी दीवार मंच के सामने की काल्पनिक दीवार है। अभिनेता ऐसे बर्ताव करते हैं जैसे दर्शक हों ही नहीं। स्तानिस्लावस्की ने अभिनेताओं को पात्र का भीतरी सच निभाना सिखाया।
कई पढ़ाए जाने वाले 20वीं सदी के नाटक रूप में यथार्थवादी हैं पर उनमें मोड़ है: जैसे एक पारिवारिक नाटक जिसमें कोई रहस्यमय आगंतुक हर पात्र का अपराध खोलता है और दर्शक से समाज की ज़िम्मेदारी पर सोचने को कहता है।
नियम तोड़ना: अभिव्यंजनावाद, एपिक थिएटर और असंगत रंगमंच
अभिव्यंजनावाद (1910–1920 का दशक)
टेढ़े-मेढ़े सेट, तीखी रोशनी और 'प्रकार' वाले पात्र भीतरी भाव और मशीनी युग का डर दिखाते हैं।
एपिक थिएटर (बर्टोल्ट ब्रेख़्त)
ब्रेख़्त चाहते थे कि दर्शक आलोचनात्मक सोचें। उन्होंने अलगाव (दूरी) प्रभाव अपनाया: दर्शकों से सीधी बात, तख़्तियाँ, गीत, भूमिका से बाहर आना, दिखती लाइटें। कहानी अलग-अलग प्रसंगों में।
असंगत रंगमंच (1950 का दशक)
सैमुअल बेकेट, इओनेस्को आदि ने बिना साफ़ अर्थ वाली दुनिया दिखाई: घूमता कथानक, दोहराए संवाद, इंतज़ार, चुप्पी, काला हास्य।
अन्य रूप
- 'किचन सिंक' नाटक (1950 का ब्रिटेन): मज़दूर वर्ग के घर, ग़ुस्सा और कुंठा।
- संगीत नाटक: सूत्रधार और गीत, वर्ग और भाग्य पर हास्य-त्रासदी।
समकालीन रंगमंच: आज के रुझान
- मंच: थ्रस्ट, आमने-सामने, चारों ओर दर्शक; स्थान-विशेष और इमर्सिव शो।
- शारीरिक रंगमंच: शरीर और गति कहानी कहते हैं।
- वर्बेटिम रंगमंच: असली साक्षात्कारों और अदालती रिकॉर्ड के शब्दों से बनी पटकथा।
- सामूहिक सृजन (devised): पूरी मंडली रिहर्सल में नाटक बनाती है।
- मल्टीमीडिया: वीडियो, लाइव कैमरा, ध्वनि।
- नई आवाज़ें: युवा, साथियों का दबाव, नस्ल, प्रवास, लिंग, पहचान; छोटे दृश्य और टूटा समय।
आधुनिक नाटक का अध्ययन कैसे करें
- संदर्भ: कब लिखा गया और कब की कहानी है? समाज में क्या हो रहा था?
- संरचना: अंक और दृश्य, रोमांचक मोड़, समय की छलाँग, नाटकीय व्यंग्य (dramatic irony)।
- पात्र: कैसे बदलते हैं, किसका प्रतीक हैं, कैसे बोलते हैं।
- मंच-निर्देश: रोशनी, सेट, ध्वनि, प्रॉप्स अर्थ के संकेत हैं।
- विषय: वर्ग, ज़िम्मेदारी, लिंग, उम्र, सत्ता, पहचान।
- दर्शक: नाटककार हमसे क्या महसूस और क्या सोचवाना चाहता है?
परीक्षा निबंध में: बिंदु रखें, पाठ से छोटा संदर्भ दें, नाटककार की विधि का विश्लेषण करें, संदर्भ से जोड़ें।
घर पर करके देखें
किसी नाटक या धारावाहिक का छोटा दृश्य चुनें। दोस्त के साथ दो बार करें: एक बार 'यथार्थवादी' (दर्शक को अनदेखा करें), एक बार 'ब्रेख़्ती' (बीच में रुककर दर्शक से कहें कि आपका पात्र असल में क्या चाहता है)। किस रूप ने दर्शक को ज़्यादा सोचने पर मजबूर किया?
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- मेलोड्रामा: साफ़ अच्छाई-बुराई, तड़क-भड़क, सुखद अंत
- यथार्थवाद: असली कमरा, आम लोग, चौथी दीवार
- प्रकृतिवाद: माहौल और वंश इंसान को गढ़ते हैं
- एपिक थिएटर: अलगाव प्रभाव, सीधी बात, प्रसंग
- असंगत: साफ़ अर्थ नहीं, घूमता कथानक, इंतज़ार
- विश्लेषण: संदर्भ, संरचना, पात्र, मंच-निर्देश, विषय, दर्शक
हल किए गए उदाहरण
1. नाटक एक ही बैठक में है। परिवार रोज़ की भाषा में बात करता है और कभी दर्शकों की ओर नहीं देखता। कौन-सी शैली?
यथार्थवाद: बॉक्स सेट, आम लोग और चौथी दीवार।
2. दृश्य के बीच एक अभिनेता दर्शकों से पूछता है, 'आप होते तो क्या करते?' कौन-सी शैली और क्यों?
एपिक थिएटर। सीधी बात चौथी दीवार तोड़ती है ताकि दर्शक आलोचनात्मक सोचें (अलगाव प्रभाव)।
3. दो पात्र किसी का इंतज़ार करते हैं जो कभी नहीं आता; दूसरा अंक लगभग पहले जैसा है। कौन-सा आंदोलन?
असंगत रंगमंच: घूमती संरचना और इंतज़ार अर्थहीन जीवन दिखाते हैं।
4. रोशनी के मंच-निर्देश अर्थ कैसे दिखाते हैं? उदाहरण दें।
नाटककार कह सकता है कि नरम, गर्म रोशनी किसी आगंतुक के आते ही तेज़ और कठोर हो जाए। यह बदलाव आराम के ख़त्म होने और सच के खुलने का संकेत है।
5. चेख़व के नाटकों में 'उप-पाठ' क्यों कहा जाता है?
पात्र चाय, मौसम जैसी छोटी बातें करते हैं, पर उनका प्रेम, दुख या ऊब अनकहा रहता है; दर्शक शब्दों के नीचे का अर्थ पढ़ते हैं।
आम गलतियाँ
- हर पुराने नाटक को 'आधुनिक' कहना; आधुनिक नाटक लगभग 1880 से शुरू होता है।
- सिर्फ़ कहानी लिखना; परीक्षक नाटककार की विधियाँ चाहते हैं।
- चौथी दीवार तोड़ने को ग़लती मानना; एपिक थिएटर में यह जानबूझकर है।
- संदर्भ भूल जाना।