रंगमंच का इतिहास क्यों पढ़ें? नाटक का संदर्भ
हर नाटक एक संदर्भ में बनता है: एक समय, एक जगह, एक समाज, एक तरह का मंच और दर्शक। पुराने नाटक को समझने या खेलने के लिए पूछिए:
- सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ: सत्ता किसके पास थी, लोग क्या मानते थे, क्या कहने की छूट थी।
- रंगमंचीय संदर्भ: मंच का आकार, रोशनी (दिन, मोमबत्ती या बिजली), दृश्य-सज्जा, वेशभूषा, मुखौटे।
- अभिनय की परिपाटियाँ: अभिनेता कैसे चलते और बोलते थे (बड़ा, शैलीबद्ध या स्वाभाविक)।
- दर्शक: कौन आते थे, कहाँ बैठते थे, कैसा व्यवहार करते थे।
रंगमंच पर शोध: भरोसेमंद किताबें, रंगमंच संग्रहालय, रिकॉर्डिंग, रंगकर्मियों के साक्षात्कार, प्रस्तुतियों की तस्वीरें और समीक्षाएँ देखिए; अपने स्रोत लिखिए।
प्राचीन यूनानी और रोमन रंगमंच
एथेंस में (लगभग 534 ई.पू. से) नाटक देवता डायोनिसस के उत्सवों में प्रतियोगिता के रूप में होते थे।
- रंगमंच की जगह: थिएट्रॉन (ढलान पर घुमावदार सीटें, लगभग 15 000 लोगों तक), ऑर्केस्ट्रा (गोल नृत्य-स्थल), स्केने (प्रवेश और पृष्ठभूमि के लिए मंच-भवन)।
- त्रासदी (एस्किलस, सोफ़ोक्लीज़, यूरिपिडीज़): नायकों और देवताओं की गंभीर कथाएँ। कॉमेडी (अरिस्टोफ़ेनीज़, बाद में मेनांडर): समाज और राजनीति पर हास्य।
- परिपाटियाँ: सब अभिनेता पुरुष; मुखौटे से पात्र पहचाना जाता; कोरस गाता और टिप्पणी करता; हिंसा मंच के पीछे होती।
- अरस्तू की पोएटिक्स ने कथानक, पात्र और विरेचन (करुणा और भय का निकलना) पर चर्चा की।
रोम ने यूनानी नाटकों को अपनाया और बदला (प्लाउटस, सेनेका), अलग से खड़े रंगमंच बनाए और भव्य तमाशे पसंद किए।
शास्त्रीय एशियाई रंगमंच
- संस्कृत नाटक (भारत): भरत मुनि का माना जाने वाला नाट्यशास्त्र (लगभग 200 ई.पू.–200 ई.) अभिनय, नृत्य, संगीत, मंच और दर्शक का विशाल ग्रंथ है। इसका रस (दर्शक जिस भाव का स्वाद लेते हैं) और भाव (अभिनेता जो भावना दिखाता है) का विचार आज भी भारतीय कलाओं को दिशा देता है। बड़े नाटककार: भास, कालिदास (अभिज्ञानशाकुंतलम्), शूद्रक। अभिनय के चार प्रकार: आंगिक (शरीर), वाचिक (वाणी), आहार्य (वेशभूषा-सज्जा) और सात्त्विक (भीतरी भाव)।
- नो (जापान, 1300 के दशक से): कानआमी और ज़ेआमी ने विकसित किया। छत वाला चौकोर मंच, प्रवेश का पुल (हाशिगाकारी), मुखौटे, संगीत और धीमी, सटीक गति। काबुकी (1600 के दशक) रंगीन और लोकप्रिय है, गाढ़ा मेकअप और दर्शकों के बीच से जाता रास्ता।
- चीनी ऑपेरा (जैसे पेकिंग ऑपेरा) गीत, संवाद, कलाबाज़ी और प्रतीकात्मक वेशभूषा-मेकअप मिलाता है।
- कई देशों के लोक रूप, जैसे यक्षगान, कथकली और नुक्कड़ नाटक, इन परंपराओं को जीवित रखते हैं।
मध्यकालीन, पुनर्जागरण और एलिज़ाबेथन रंगमंच
- मध्यकालीन यूरोप (लगभग 900–1500): रंगमंच चर्चों के अंदर फिर पनपा, फिर बाहर आया। मिस्ट्री नाटक बाइबिल की कथाएँ नगरों में खींची जाने वाली गाड़ियों पर दिखाते; एवरीमैन जैसे नैतिकता नाटक सही-गलत सिखाते।
- कॉमेडिया देल’आर्ते (इटली, 1500–1700): घूमती मंडलियाँ, मुखौटे वाले तय पात्र (आर्लेकिनो, पैंटालोने), तात्कालिक दृश्य और शारीरिक हास्य। इसने पूरे यूरोप की कॉमेडी पर असर डाला।
- एलिज़ाबेथन और जैकोबियन इंग्लैंड (लगभग 1576–1642): ग्लोब जैसे गोल या बहुकोणीय खुले रंगमंच; आगे निकला (थ्रस्ट) मंच, तीन ओर दर्शक; ग़रीब दर्शक आँगन में खड़े होते। दिन की रोशनी, कम सज्जा, इसलिए शब्द ही दृश्य रचते। लेखक: मार्लो, शेक्सपियर, जॉनसन। स्त्री पात्र लड़के निभाते।
- स्पेन का स्वर्ण युग (लोपे दे वेगा, काल्देरोन) आँगन वाले रंगमंच (कोराल) में।
प्रोसीनियम, नवशास्त्रीयता और यथार्थवाद
- 1600–1700: बंद रंगमंच, प्रोसीनियम मेहराब (चित्र-फ़्रेम), परिप्रेक्ष्य वाले रंगे दृश्य और मोमबत्ती की रोशनी। कई यूरोपीय मंचों पर स्त्रियाँ अभिनय करने लगीं। फ़्रांसीसी नवशास्त्रीय लेखक (कॉमेडी में मोलिएर, त्रासदी में रासीन) कड़े नियम मानते थे।
- 1800 का दशक: मेलोड्रामा: साफ़ नायक-खलनायक, बड़े हाव-भाव, संगीत और मंचीय प्रभाव; पहले गैस, फिर बिजली की रोशनी।
- यथार्थवाद और प्रकृतिवाद (1800 का अंत): इब्सन (अ डॉल्स हाउस), चेख़व, स्ट्रिंडबर्ग आदि ने आम लोगों और सामाजिक समस्याओं को असली जैसे कमरों (बॉक्स सेट) में दिखाया। अभिनेता ऐसे बरतते मानो दर्शकों और उनके बीच चौथी दीवार हो।
आधुनिक और समकालीन रंगमंच
- स्तानिस्लावस्की (मॉस्को आर्ट थिएटर): सच्चे अभिनय की 'पद्धति': दी गई परिस्थितियाँ, उद्देश्य, 'जादुई अगर', भाव-स्मृति। इसने फ़िल्मी अभिनय और 'मेथड' अभिनय को आकार दिया।
- ब्रेख़्त: एपिक थिएटर। उन्होंने अलगाव प्रभाव (जाने-पहचाने को अजनबी बनाना) अपनाया: गीत, तख़्तियाँ, दर्शकों से सीधी बात, दिखती रोशनियाँ, ताकि लोग सिर्फ़ महसूस न करें बल्कि समाज के बारे में सोचें।
- आर्तो (क्रूरता का रंगमंच: इंद्रियों को झकझोरना), ग्रोटोव्स्की (निर्धन रंगमंच: केवल अभिनेता का शरीर), पीटर ब्रुक (खाली स्थान), विसंगति का रंगमंच (बेकेट, आयनेस्को), शारीरिक और सामूहिक रचना वाला रंगमंच।
- जगहें: ब्लैक बॉक्स, चारों ओर दर्शक (इन द राउंड), आमने-सामने, घूमते दर्शक और स्थल-विशेष रंगमंच। उत्तर-औपनिवेशिक और अंतर-सांस्कृतिक रंगमंच परंपराओं को मिलाता है, जैसे वे भारतीय नाटककार और निर्देशक जिन्होंने लोक रूपों को आधुनिक विचारों से जोड़ा।
संदर्भ के अनुसार अभिनय शैलियाँ
अभिनय शैली मंच और समय के साथ चलती है:
- विशाल खुली जगह (यूनानी): मुखौटे, ऊँची आवाज़, बड़े हाव-भाव।
- नियमबद्ध शैलियाँ (नाट्यशास्त्र, नो, काबुकी): सालों में सीखी तय मुद्राएँ और चालें।
- पास की भीड़, दिन की रोशनी (एलिज़ाबेथन): दर्शकों से सीधी बात, स्वगत और एकालाप।
- मेलोड्रामा: बढ़ा-चढ़ाकर मुद्राएँ और भावनाएँ।
- यथार्थवाद / स्तानिस्लावस्की: स्वाभाविक, भीतरी सच, चौथी दीवार।
- ब्रेख़्त: पात्र को 'दिखाना', चौथी दीवार तोड़ना, दर्शक से निर्णय करवाना।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- यूनानी रंगमंच: थिएट्रॉन (सीटें) + ऑर्केस्ट्रा (नृत्य-स्थल) + स्केने (मंच-भवन)
- नाट्यशास्त्र: रस (दर्शक का भाव-स्वाद) + भाव (अभिनेता की भावना)
- मंच के आकार: खुला → थ्रस्ट → प्रोसीनियम → ब्लैक बॉक्स / इन द राउंड
- यथार्थवाद: बॉक्स सेट + चौथी दीवार + स्वाभाविक अभिनय
- स्तानिस्लावस्की = सच्ची भावना; ब्रेख़्त = दर्शक सोचें (अलगाव प्रभाव)
- नाटक का संदर्भ: समाज + मंच + परिपाटियाँ + दर्शक
हल किए गए उदाहरण
1. यूनानी अभिनेता मुखौटे और बड़े हाव-भाव क्यों अपनाते थे?
खुले रंगमंच में हज़ारों लोग होते थे। मुखौटा दूर से पात्र साफ़ दिखाता, एक अभिनेता कई भूमिकाएँ कर पाता, और बड़े हाव-भाव व आवाज़ पीछे की पंक्तियों तक पहुँचते।
2. शेक्सपियर के नाटकों के संवाद ही समय और जगह बताते हैं। क्यों?
नाटक दिन की रोशनी में, कम सज्जा और बिना रोशनी बदले होते थे, इसलिए संवादों को ही बताना पड़ता कि रात है या हम जंगल में हैं।
3. एक निर्देशक इब्सन का 'अ डॉल्स हाउस' खेल रहा है। मूल संदर्भ से कौन-सा मंच और अभिनय मेल खाता है?
असली जैसे कमरे वाला प्रोसीनियम मंच (बॉक्स सेट), और 'चौथी दीवार' के पीछे स्वाभाविक अभिनय।
4. एक दल पानी बचाने पर नुक्कड़ नाटक करता है और बीच में दर्शकों से सवाल पूछता है। यह किसके विचारों का उपयोग है?
ब्रेख़्त के: चौथी दीवार तोड़कर दर्शक को सोचने और निर्णय करने देना। चारों ओर दर्शक 'इन द राउंड' रंगमंच से भी जुड़ता है।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि रंगमंच का इतिहास केवल यूरोप का है। भारत, जापान, चीन और कई संस्कृतियों की समृद्ध परंपराएँ हैं, कुछ यूनानी जितनी पुरानी।
- यूनानी ऑर्केस्ट्रा (नृत्य-स्थल) को आज के ऑर्केस्ट्रा (वादक दल) से मिला देना।
- प्रोसीनियम को 'सामान्य' या सबसे पुराना मंच मानना। खुला, थ्रस्ट और चारों ओर दर्शक वाले मंच कहीं पुराने हैं।
- स्तानिस्लावस्की और ब्रेख़्त को एक जैसा मानना। स्तानिस्लावस्की चाहते थे दर्शक विश्वास करें; ब्रेख़्त चाहते थे दर्शक आलोचनात्मक ढंग से सोचें।