विद्युत आवेश क्या है?
हर चीज़ परमाणुओं से बनी है। परमाणु के बीच में छोटा-सा नाभिक होता है। नाभिक में प्रोटॉन होते हैं, जिन पर धन (+) आवेश होता है। नाभिक के चारों ओर इलेक्ट्रॉन घूमते हैं, जिन पर ऋण (−) आवेश होता है।
सामान्य परमाणु में प्रोटॉन और इलेक्ट्रॉन बराबर होते हैं। धन और ऋण कट जाते हैं, इसलिए परमाणु उदासीन (कुल आवेश शून्य) होता है।
आवेश का मात्रक कूलॉम (C) है। एक इलेक्ट्रॉन का आवेश बहुत छोटा है: लगभग 1.6 × 10⁻¹⁹ C।
घर्षण (रगड़) द्वारा आवेशन
जब दो अलग विद्युतरोधी (insulator, जिनमें आवेश बहता नहीं — प्लास्टिक, रबर, ऊन, काँच) चीज़ें रगड़ी जाती हैं, तो कुछ इलेक्ट्रॉन एक से दूसरी पर चले जाते हैं।
- जो इलेक्ट्रॉन पाती है, वह ऋण आवेशित होती है।
- जो इलेक्ट्रॉन खोती है, वह धन आवेशित होती है।
सिर्फ़ इलेक्ट्रॉन चलते हैं। प्रोटॉन नाभिक में बंद रहते हैं। यानी धन वस्तु ने इलेक्ट्रॉन खोए हैं, प्रोटॉन नहीं पाए।
उदाहरण: ऊन से रगड़ी प्लास्टिक की छड़ ऋण बनती है; रेशम से रगड़ी काँच की छड़ धन बनती है। यह आवेश एक जगह टिका रहता है, इसलिए इसे स्थिर विद्युत कहते हैं।
आवेश का संरक्षण
रगड़ने से आवेश बनता नहीं, सिर्फ़ खिसकता है। गुब्बारे ने 3 इलेक्ट्रॉन पाए तो कपड़े ने ठीक 3 खोए। पहले: 0 + 0 = 0। बाद में: (−3) + (+3) = 0। कुल आवेश वही रहता है। यह आवेश संरक्षण का नियम है।
आवेशों के बीच बल
समान आवेश प्रतिकर्षित करते हैं (धकेलते हैं): + और +, या − और −। असमान आवेश आकर्षित करते हैं (खींचते हैं): + और −।
यह बल बिना छुए लगता है, यानी असंपर्क बल है। आवेश ज़्यादा हो तो बल ज़्यादा, दूरी ज़्यादा हो तो बल कम। दूरी दुगुनी करो तो बल लगभग चौथाई रह जाता है।
प्रेरण और चालन द्वारा आवेशन
प्रेरण (induction) यानी बिना छुए आवेशित करना या खींचना। ऋण गुब्बारा उदासीन दीवार के पास लाओ। दीवार के इलेक्ट्रॉन थोड़ा पीछे धकेले जाते हैं। पास वाला हिस्सा थोड़ा धन हो जाता है। असमान आवेश खींचते हैं, इसलिए गुब्बारा चिपकता है। इसी कारण आवेशित कंघी काग़ज़ के टुकड़े उठाती है।
चालन (conduction) यानी छूकर आवेशित करना। आवेशित वस्तु धातु को छूए तो कुछ आवेश धातु पर चला जाता है। दोनों पर एक ही तरह का आवेश होता है।
स्वर्ण-पत्र विद्युतदर्शी (electroscope) आवेश दिखाता है: उसकी पतली पत्तियों पर एक जैसा आवेश आता है, वे एक-दूसरे को धकेलकर फैल जाती हैं।
विद्युत क्षेत्र
हर आवेशित वस्तु के चारों ओर विद्युत क्षेत्र होता है, यानी वह जगह जहाँ दूसरा आवेश बल महसूस करता है। इसे क्षेत्र रेखाओं से दिखाते हैं: धन आवेश से बाहर की ओर, ऋण आवेश की ओर अंदर। जहाँ रेखाएँ पास-पास हों, वहाँ क्षेत्र प्रबल है। वस्तु के पास क्षेत्र सबसे प्रबल होता है।
चिंगारी, भूसंपर्कण, खतरे और उपयोग
बहुत आवेश जमा हो तो क्षेत्र इतना प्रबल हो जाता है कि हवा के कणों से इलेक्ट्रॉन खिंच जाते हैं और चिंगारी कूदती है। तड़ित (आसमानी बिजली) बादल और ज़मीन के बीच एक विशाल चिंगारी है।
भूसंपर्कण (earthing) यानी आवेशित वस्तु को धातु के तार से ज़मीन से जोड़ना। अतिरिक्त आवेश सुरक्षित बह जाता है। विमान में ईंधन भरने से पहले टैंकर को भूसंपर्कित किया जाता है, क्योंकि ईंधन की भाप के पास चिंगारी आग लगा सकती है। ऊँची इमारतों पर तड़ित चालक लगाया जाता है।
उपयोग: फोटोकॉपी मशीन और लेज़र प्रिंटर, पेंट स्प्रे, और कारख़ानों की चिमनियों में धूल पकड़ने वाले फ़िल्टर।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- रगड़ने पर इलेक्ट्रॉन चलते हैं: इलेक्ट्रॉन पाए → ऋण; खोए → धन
- पहले का कुल आवेश = बाद का कुल आवेश (आवेश संरक्षण)
- समान आवेश प्रतिकर्षित, असमान आवेश आकर्षित करते हैं
- एक इलेक्ट्रॉन का आवेश e ≈ −1.6 × 10⁻¹⁹ C; आवेश Q = n × e
- दूरी दुगुनी → बल लगभग ¼
- आवेश का मात्रक: कूलॉम (C)
हल किए गए उदाहरण
1. प्लास्टिक का स्केल ऊनी कपड़े से रगड़ने पर ऋण हो गया। कपड़े का क्या हुआ और क्यों?
इलेक्ट्रॉन ऊन से स्केल पर गए। स्केल ने इलेक्ट्रॉन पाए (ऋण)। ऊन ने उतने ही इलेक्ट्रॉन खोए, इसलिए वह उतना ही धन आवेशित हुआ।
2. एक गुब्बारा 5 × 10¹² इलेक्ट्रॉन पाता है। उसका आवेश कितना है? (e = 1.6 × 10⁻¹⁹ C)
Q = n × e = 5 × 10¹² × 1.6 × 10⁻¹⁹ = 8 × 10⁻⁷ C। इलेक्ट्रॉन पाए, इसलिए आवेश −8 × 10⁻⁷ C।
3. छड़ A छड़ B को धकेलती है। B छड़ C को खींचती है। C धन है। A और B क्या हैं?
धकेलना सिर्फ़ दो आवेशित वस्तुओं में होता है, इसलिए B आवेशित है। B धन C को खींचती है, तो B ऋण है। A, B को धकेलती है, तो A भी ऋण है।
4. आवेशित कंघी उदासीन काग़ज़ के टुकड़े को क्यों खींचती है?
प्रेरण से। कंघी का आवेश काग़ज़ के इलेक्ट्रॉनों को थोड़ा खिसकाता है। पास का हिस्सा उल्टा आवेश पाता है, और पास होने से खिंचाव धक्के से ज़्यादा होता है।
5. विमान में ईंधन भरते समय टैंकर को भूसंपर्कित क्यों करते हैं?
पाइप में बहता ईंधन रगड़ से आवेश जमा करता है। चिंगारी ईंधन की भाप जला सकती है। भूसंपर्कण से आवेश ज़मीन में चला जाता है और चिंगारी नहीं बनती।
आम गलतियाँ
- यह कहना कि रगड़ने पर प्रोटॉन चलते हैं। सिर्फ़ इलेक्ट्रॉन चलते हैं।
- यह सोचना कि धन वस्तु ने धन आवेश पाया। उसने इलेक्ट्रॉन खोए हैं।
- यह मानना कि रगड़ने से आवेश बनता है। आवेश सिर्फ़ खिसकता है।
- यह सोचना कि सिर्फ़ आवेशित चीज़ें खिंचती हैं। प्रेरण से उदासीन चीज़ें भी खिंचती हैं।