ऊर्जा स्तर, अवशोषण और उत्सर्जन
परमाणु में इलेक्ट्रॉन सिर्फ़ कुछ तय ऊर्जाएँ रख सकते हैं, इन्हें ऊर्जा स्तर कहते हैं। ऊपर जाने के लिए इलेक्ट्रॉन को ठीक ΔE ऊर्जा चाहिए। नीचे आते समय वह E = hf = ΔE ऊर्जा का फ़ोटॉन छोड़ता है।
- अवशोषण: फ़ोटॉन लिया जाता है; परमाणु उत्तेजित हो जाता है।
- स्वतः उत्सर्जन: उत्तेजित परमाणु अपने आप, किसी भी समय, किसी भी दिशा में नीचे आता है।
साधारण बल्ब स्वतः उत्सर्जन से चमकता है, इसलिए उसका प्रकाश हर दिशा में और कई रंगों का होता है।
उद्दीप्त उत्सर्जन
आइंस्टाइन ने 1917 में बताया कि ΔE ऊर्जा वाला फ़ोटॉन उत्तेजित परमाणु के पास से गुज़रे तो उसे जल्दी नीचे आने के लिए उकसा सकता है। नया फ़ोटॉन हूबहू नकल होता है: वही आवृत्ति (रंग), वही दिशा और वही कला (तरंगें साथ उठती-गिरती हैं)। एक से दो, दो से चार, और प्रकाश प्रवर्धित होता जाता है।
समष्टि प्रतिलोमन और लेज़र गुहा
आम तौर पर ज़्यादातर परमाणु सबसे निचले स्तर पर होते हैं, इसलिए फ़ोटॉन नकल बनने से ज़्यादा अवशोषित होते हैं। पंप (फ़्लैश लैंप, विद्युत धारा या दूसरा लेज़र) ऊर्जा देता है ताकि उत्तेजित परमाणु ज़्यादा हों। इसे समष्टि प्रतिलोमन कहते हैं। कई लेज़र मितस्थायी (metastable) स्तर का उपयोग करते हैं, जहाँ परमाणु थोड़ी देर ज़्यादा टिकते हैं।
गुहा (cavity) के एक सिरे पर पूरा दर्पण और दूसरे पर आंशिक दर्पण होता है। अक्ष के साथ चलने वाला प्रकाश बढ़ता रहता है; तिरछा प्रकाश निकल जाता है। थोड़ा प्रकाश आंशिक दर्पण से किरण बनकर बाहर आता है।
लेज़र प्रकाश के गुण और उपयोग
- एकवर्णी: एक ही रंग (एक तरंगदैर्ध्य)।
- कला-संबद्ध (coherent): सब तरंगें एक ताल में।
- दिशिक: बहुत पतली किरण जो लगभग नहीं फैलती।
- तीव्र: छोटी जगह में बहुत ऊर्जा।
उपयोग: सर्जरी और आँख का इलाज, बारकोड स्कैनर, ऑप्टिकल फ़ाइबर संचार, काटना और वेल्डिंग, दूरी नापना (लिडार), होलोग्राम, डिस्क पढ़ना।
सावधानी: लेज़र किरण में कभी मत देखो। छोटा पॉइंटर भी आँख के रेटिना को नुकसान पहुँचा सकता है।
X-किरणें
X-किरणें बहुत छोटी तरंगदैर्ध्य (लगभग 0.01–10 nm) और ऊँची ऊर्जा वाली विद्युतचुंबकीय तरंगें हैं। X-किरण नली में ऊँची वोल्टता से इलेक्ट्रॉन तेज़ होकर धातु के लक्ष्य से टकराते हैं। अचानक रुकने पर वे X-किरणें छोड़ते हैं (ब्रेकिंग विकिरण), और भीतरी इलेक्ट्रॉन बाहर करके तीखी "अभिलाक्षणिक" रेखाएँ भी देते हैं। X-किरणें नरम ऊतक से निकल जाती हैं पर हड्डी उन्हें ज़्यादा रोकती है, इसलिए हड्डियाँ दिखती हैं। ये पदार्थ को आयनित करती हैं, इसलिए कम से कम संपर्क और सीसे की ढाल रखी जाती है।
लेज़र प्रकाश और X-किरणें दोनों फ़ोटॉन हैं; अंतर ऊर्जा और बनने के तरीक़े में है।
करके देखो: अंतर पहचानो
अँधेरे कमरे में 3 m दूर से दीवार पर टॉर्च और लेज़र पॉइंटर चमकाओ (आँखों की ओर कभी नहीं)। धब्बों का आकार मिलाओ। टॉर्च फैल जाती है, लेज़र छोटा बिंदु रहता है। फिर 3D में पंप स्लाइडर से सबसे कम पंप खोजो जिस पर किरण बनी रहे।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- E = hf = hc/λ
- ΔE = E₂ − E₁ (फ़ोटॉन ऊर्जा = स्तरों का अंतर)
- h = 6.63 × 10⁻³⁴ J s, c = 3 × 10⁸ m/s
- 1 eV = 1.6 × 10⁻¹⁹ J
- X-किरण की न्यूनतम तरंगदैर्ध्य: λmin = hc/(eV)
हल किए गए उदाहरण
1. लाल लेज़र की λ = 650 nm है। एक फ़ोटॉन की ऊर्जा ज्ञात करो।
E = hc/λ = (6.63 × 10⁻³⁴ × 3 × 10⁸) / (650 × 10⁻⁹) = 3.06 × 10⁻¹⁹ J ≈ 1.9 eV।
2. दो स्तरों में 2.0 eV का अंतर है। उद्दीप्त फ़ोटॉन की तरंगदैर्ध्य?
ΔE = 3.2 × 10⁻¹⁹ J। λ = hc/ΔE = 6.2 × 10⁻⁷ m = 620 nm (नारंगी-लाल)।
3. 1 mW लेज़र 3.0 × 10⁻¹⁹ J के फ़ोटॉन देता है। प्रति सेकंड कितने फ़ोटॉन?
N = P/E = 1 × 10⁻³ / 3.0 × 10⁻¹⁹ = 3.3 × 10¹⁵ फ़ोटॉन प्रति सेकंड।
4. X-किरण नली 30 kV पर चलती है। न्यूनतम तरंगदैर्ध्य?
अधिकतम ऊर्जा = eV = 4.8 × 10⁻¹⁵ J। λmin = hc/E = 4.1 × 10⁻¹¹ m = 0.041 nm।
आम गलतियाँ
- यह मानना कि उद्दीप्त उत्सर्जन से दूसरे रंग का फ़ोटॉन बनता है: नकल की आवृत्ति, कला और दिशा वही होती है।
- समष्टि प्रतिलोमन भूल जाना: इसके बिना अवशोषण जीतता है और प्रवर्धन नहीं होता।
- यह कहना कि लेज़र सिर्फ़ ज़्यादा शक्ति के कारण ख़ास है: असली बात कला-संबद्धता और पतली दिशा है।
- eV और जूल मिला देना: eV को 1.6 × 10⁻¹⁹ से गुणा करके जूल बनाओ।