प्रतिबिंब क्या है?
प्रकाश सीधी रेखा में चलता है। वस्तु से आई किरणें दर्पण से टकराकर लौटती हैं, या लेंस से गुज़रकर मुड़ती हैं। हमारी आँख किरणों को सीधा पीछे की ओर खींचकर वस्तु की नकल देखती है। यही प्रतिबिंब है।
वास्तविक प्रतिबिंब वहाँ बनता है जहाँ किरणें सच में मिलती हैं। उसे कागज़ के परदे पर उतारा जा सकता है (जैसे सिनेमा का चित्र)। आभासी प्रतिबिंब वहाँ बनता है जहाँ से किरणें केवल आती हुई लगती हैं। वह दर्पण के पीछे होता है, इसलिए परदे पर नहीं उतरता।
समतल दर्पण में प्रतिबिंब
समतल दर्पण सपाट दर्पण है। इसमें प्रतिबिंब:
- आभासी (दर्पण के पीछे) होता है,
- सीधा होता है,
- वस्तु के बराबर आकार का होता है,
- दर्पण के पीछे उतनी ही दूरी पर होता है जितनी वस्तु आगे है,
- दाएँ-बाएँ उलटा दिखता है (पार्श्व उलटाव)। इसीलिए एम्बुलेंस के आगे AMBULANCE उलटा लिखा होता है।
तुम दर्पण से 2 मीटर दूर खड़े हो तो प्रतिबिंब 2 मीटर पीछे है। तुम दोनों के बीच 4 मीटर की दूरी है।
अवतल और उत्तल दर्पण
अवतल दर्पण चम्मच के अंदर की तरह धँसा होता है। वह किरणों को इकट्ठा करता है। जहाँ समानांतर किरणें मिलती हैं, वह उसका फोकस (F) है।
- वस्तु दूर (F से आगे): प्रतिबिंब वास्तविक, उल्टा और दर्पण के आगे बनता है। दूर की वस्तु का प्रतिबिंब छोटा होता है।
- वस्तु बहुत पास (F के अंदर): प्रतिबिंब आभासी, सीधा और बड़ा होता है। शेविंग-दर्पण, मेकअप-दर्पण और दंत-चिकित्सक का दर्पण ऐसे हैं।
- वस्तु ठीक F पर: किरणें समानांतर निकलती हैं, प्रतिबिंब नहीं बनता। टॉर्च और गाड़ी की हेडलाइट इससे सीधी रोशनी बनाती है।
उत्तल दर्पण बाहर की ओर उभरा होता है। वह किरणों को फैलाता है। उसका प्रतिबिंब वस्तु कहीं भी हो, हमेशा आभासी, सीधा और छोटा होता है। छोटा प्रतिबिंब यानी चौड़ा दृश्य, इसलिए साइड-मिरर और दुकानों के सुरक्षा-दर्पण में यही लगता है।
लेंस में प्रतिबिंब
उत्तल लेंस बीच में मोटा होता है और किरणों को पास लाता है। वह अवतल दर्पण जैसा काम करता है: वस्तु दूर हो तो दूसरी ओर वास्तविक, उल्टा प्रतिबिंब; वस्तु पास (F के अंदर) हो तो बड़ा, सीधा, आभासी प्रतिबिंब। यही आवर्धक लेंस है। कैमरा, प्रोजेक्टर और हमारी आँख वास्तविक प्रतिबिंब वाला रूप इस्तेमाल करते हैं।
अवतल लेंस बीच में पतला होता है और किरणें फैलाता है। उत्तल दर्पण की तरह वह हमेशा छोटा, सीधा, आभासी प्रतिबिंब देता है। निकट-दृष्टि के चश्मे में यही लगता है।
3D चित्र में नारंगी और हरी रेखाएँ दो आसान किरणें हैं। नीली बिंदीदार रेखाएँ दिखाती हैं कि आभासी प्रतिबिंब सिर्फ़ वहाँ लगता है।
खुद करके देखो
घर पर: स्टील की चमकदार चम्मच के अंदर और फिर बाहर वाले हिस्से में अपना चेहरा देखो। अंदर की तरफ़ (अवतल) तुम उल्टे और छोटे दिखते हो। बाहर की तरफ़ (उत्तल) सीधे और छोटे। अब चम्मच का अंदर वाला हिस्सा आँख के बहुत पास लाओ: चेहरा बड़ा और सीधा दिखेगा।
3D में: पहले अंदाज़ा लगाओ कि प्रतिबिंब वास्तविक होगा या आभासी, फिर स्लाइडर चलाकर जाँचो।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- समतल दर्पण: प्रतिबिंब की दूरी = वस्तु की दूरी (आभासी, सीधा, बराबर आकार)
- वास्तविक प्रतिबिंब: परदे पर उतरता है, प्रायः उल्टा
- आभासी प्रतिबिंब: परदे पर नहीं उतरता, इन मामलों में सीधा
- दर्पण और लेंस सूत्र (वास्तविक दूरी धनात्मक): 1/v + 1/u = 1/f
- आवर्धन m = प्रतिबिंब की ऊँचाई / वस्तु की ऊँचाई = − v / u
हल किए गए उदाहरण
1. एक लड़की समतल दर्पण से 1.5 मीटर आगे खड़ी है। वह अपने प्रतिबिंब से कितनी दूर है?
प्रतिबिंब दर्पण के 1.5 मीटर पीछे है। दूरी = 1.5 + 1.5 = 3 मीटर।
2. अवतल दर्पण की फोकस दूरी 10 cm है। वस्तु 30 cm आगे है। प्रतिबिंब कहाँ और कैसा बनेगा?
1/v = 1/10 − 1/30 = 2/30, इसलिए v = 15 cm दर्पण के आगे। m = −15/30 = −0.5। प्रतिबिंब वास्तविक, उल्टा और आधे आकार का है।
3. आवर्धक लेंस (उत्तल लेंस) की f = 10 cm है। सिक्का 5 cm दूर है। प्रतिबिंब कैसा होगा?
1/v = 1/10 − 1/5 = −1/10, इसलिए v = −10 cm। ऋण का मतलब आभासी, सिक्के की ही तरफ़। m = −(−10)/5 = +2। प्रतिबिंब आभासी, सीधा और दोगुना बड़ा है।
आम गलतियाँ
- आभासी प्रतिबिंब को "है ही नहीं" समझना। वह दिखता है, बस परदे पर नहीं उतरता।
- समतल दर्पण में प्रतिबिंब छोटा मानना। वह बराबर आकार का है।
- दर्पण उलझाना: अवतल अंदर धँसा (गुफ़ा जैसा), उत्तल बाहर उभरा।
- यह भूलना कि अवतल दर्पण और उत्तल लेंस में वस्तु F से अंदर हो तो प्रतिबिंब अलग बनता है।