GAAP क्या है?
सामान्यतः स्वीकृत लेखांकन सिद्धांत (GAAP) वे नियम, अवधारणाएँ और परंपराएँ हैं जिन्हें खाते बनाने में सब मानते हैं। ये लंबे व्यवहार, पेशेवर संस्थाओं (भारत में भारतीय सनदी लेखाकार संस्थान, ICAI) और कानून से बनते हैं। GAAP से खाते एकसमान, विश्वसनीय और तुलनीय बनते हैं। सिद्धांत प्रासंगिक, वस्तुनिष्ठ और व्यावहारिक होने चाहिए।
मूलभूत लेखांकन मान्यताएँ: चालू व्यवसाय, एकरूपता, उपार्जन
चालू व्यवसाय
माना जाता है कि व्यवसाय लंबे समय चलेगा, जल्दी बंद नहीं होगा। इसी कारण स्थायी संपत्ति लागत घटा मूल्यह्रास पर दिखती है और पूर्वदत्त व्यय संपत्ति माने जाते हैं।
एकरूपता
मूल्यह्रास या स्टॉक मूल्यांकन जैसी विधियाँ हर साल एक ही रहती हैं। बदलाव केवल ठोस कारण से और बताकर।
उपार्जन
आगम कमाने पर और व्यय होने पर लिखा जाता है, नकद मिले या न मिले। इसलिए अदत्त व्यय और उपार्जित आय उसी साल में आते हैं जिसके वे हैं।
मूल लेखांकन सिद्धांत
- व्यावसायिक इकाई: व्यवसाय स्वामी से अलग। स्वामी की पूँजी व्यवसाय की देयता; निजी ख़र्च आहरण।
- मुद्रा माप: केवल वही घटनाएँ जो रुपयों में लिखी जा सकें, एक ही मुद्रा (₹) में।
- लेखांकन अवधि: व्यवसाय का जीवन बराबर अवधियों में (भारत में 1 अप्रैल–31 मार्च) ताकि नियमित लाभ और स्थिति पता चले।
- ऐतिहासिक लागत: संपत्ति उस कीमत पर जो उसे पाने और तैयार करने में दी। बाज़ार भाव का बदलाव नहीं लिखते।
- द्विपक्ष: हर लेन-देन के दो बराबर प्रभाव। इसी से समीकरण: संपत्तियाँ = देयताएँ + पूँजी।
- आगम मान्यता (वसूली): आगम तब गिनें जब कमाया जाए — माल के लिए जब स्वामित्व ख़रीदार को जाए — नकद आने पर नहीं।
- मिलान: एक अवधि के व्यय उसी अवधि के आगम से मिलाकर सही लाभ।
- पूर्ण प्रकटीकरण: सभी महत्वपूर्ण तथ्य विवरण या टिप्पणियों में (जैसे चल रहा अदालती मामला)।
- रूढ़िवादिता (विवेक): संभावित लाभ मत मानो, सभी संभावित हानियों का प्रावधान करो। स्टॉक लागत या शुद्ध वसूली मूल्य, जो कम हो; संदिग्ध ऋणों का प्रावधान।
- सारता: कोई मद अलग तभी दिखाओ जब वह निर्णय बदल सके। ₹150 का स्टेपलर सीधे व्यय।
- वस्तुनिष्ठता: हर प्रविष्टि बिल, रसीद जैसे जाँचे जा सकने वाले सबूत पर, बिना पक्षपात।
सिद्धांत मिलकर कैसे काम करते हैं
चालू व्यवसाय से मूल्यह्रास संभव है; उपार्जन और मिलान तय करते हैं कि मद किस साल की है; द्विपक्ष खाते बराबर रखता है; रूढ़िवादिता और वस्तुनिष्ठता आँकड़ों को सुरक्षित और जाँचने योग्य रखते हैं। ध्यान दें: रूढ़िवादिता कभी-कभी एकरूपता से टकराती है — बार-बार "सुरक्षित" विधि बदलने से तुलना बिगड़ती है।
बोर्ड परीक्षा पर ध्यान
स्थिति देकर "सिद्धांत का नाम बताइए" (1 अंक), "मिलान/रूढ़िवादिता उदाहरण सहित समझाइए" (3 अंक) और दो अवधारणाओं में अंतर पूछे जाते हैं। हर उत्तर में छोटा उदाहरण ज़रूर लिखें।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- द्विपक्ष → संपत्तियाँ = देयताएँ + पूँजी
- मिलान → लाभ = अवधि का आगम − उसी अवधि के व्यय
- रूढ़िवादिता → अंतिम स्टॉक = लागत और शुद्ध वसूली मूल्य में जो कम
- भारत में लेखांकन अवधि: 1 अप्रैल से 31 मार्च
हल किए गए उदाहरण
1. सिद्धांत बताइए: फ़र्म ज़मीन ₹20 लाख (ख़रीद मूल्य) पर दिखाती है जबकि बाज़ार भाव ₹35 लाख है।
ऐतिहासिक लागत सिद्धांत।
2. सिद्धांत बताइए: 28 मार्च को उधार बेचा माल उसी साल की बिक्री गिना गया, भुगतान मई में आएगा।
आगम मान्यता (और उपार्जन)।
3. स्टॉक की लागत ₹80,000, बाज़ार मूल्य ₹72,000। किस मूल्य पर दिखाएँ और क्यों?
₹72,000 — लागत और बाज़ार मूल्य में जो कम; रूढ़िवादिता: ₹8,000 की संभावित हानि मान ली।
4. स्वामी बेटी की स्कूल फ़ीस व्यवसाय से भरता है। क्या करें?
व्यावसायिक इकाई: यह व्यवसाय का व्यय नहीं, आहरण है; पूँजी घटेगी।
5. फ़र्म हर दूसरे साल मूल्यह्रास विधि SLM से WDV बदलती है। कौन-सी मान्यता टूटी?
एकरूपता — सालों के नतीजों की तुलना नहीं हो सकती।
आम गलतियाँ
- उपार्जन को नकद से मिलाना: उपार्जन कमाने/व्यय होने पर लिखता है, नकद आने-जाने पर नहीं।
- यह मानना कि रूढ़िवादिता संभावित लाभ भी लिखती है। वह केवल संभावित हानि लिखती है।
- मिलान और उपार्जन को एक मानना: उपार्जन समय की बात है; मिलान व्यय को संबंधित आगम से जोड़ता है।
- सारता को केवल रुपयों का आकार मानना। मद का स्वभाव और निर्णय पर असर भी मायने रखता है।