व्यावसायिक इकाई, लेन-देन, पूँजी और आहरण
इकाई का अर्थ है अपनी अलग पहचान वाली इकाई। खातों में व्यवसाय अपने स्वामी से अलग इकाई है। लेन-देन दो पक्षों के बीच मौद्रिक मूल्य वाली घटना है, जैसे ₹10,000 का माल ख़रीदना (नकद या उधार)।
पूँजी वह धन या संपत्ति है जो स्वामी व्यवसाय में लगाता है। व्यवसाय इसे स्वामी को लौटाने का ऋणी है, इसलिए पूँजी स्वामी के प्रति देयता है। आहरण वह नकद या माल है जो स्वामी निजी उपयोग के लिए निकालता है; इससे पूँजी घटती है।
पूँजी = संपत्तियाँ − बाहरी देयताएँ।
चालू और गैर-चालू संपत्तियाँ व देयताएँ
संपत्तियाँ व्यवसाय के स्वामित्व वाले वे साधन हैं जिनका मौद्रिक मूल्य है और जो आगे लाभ देंगे।
- गैर-चालू संपत्तियाँ: लंबे समय तक उपयोग के लिए, बेचने के लिए नहीं — भूमि, भवन, मशीन, फ़र्नीचर (मूर्त); ख्याति, पेटेंट, ट्रेडमार्क (अमूर्त); दीर्घकालीन निवेश।
- चालू संपत्तियाँ: एक साल (या एक परिचालन चक्र) में नकद में बदलने या उपयोग होने वाली — नकद, बैंक, स्टॉक, देनदार, प्राप्य बिल, पूर्वदत्त व्यय।
देयताएँ बाहरी लोगों को देय रकम हैं।
- गैर-चालू देयताएँ: एक साल बाद देय — दीर्घकालीन बैंक ऋण, ऋणपत्र।
- चालू देयताएँ: एक साल में देय — लेनदार, देय बिल, अदत्त व्यय, अल्पकालीन ऋण।
पूँजीगत व्यय और आयगत व्यय
- पूँजीगत व्यय: लाभ एक साल से ज़्यादा; गैर-चालू संपत्ति ख़रीदने या सुधारने पर। जैसे मशीन ख़रीदना, उसकी स्थापना का ख़र्च, नई मंज़िल बनवाना। यह तुलन पत्र में संपत्ति के रूप में दिखता है।
- आयगत व्यय: लाभ इसी साल ख़त्म; व्यवसाय चलाने के लिए। जैसे मज़दूरी, किराया, बिजली, मरम्मत। यह व्यापार या लाभ-हानि खाते में जाता है।
आय, आगम, व्यय, लाभ, अभिलाभ और हानि
- आगम: सामान्य व्यापार से कमाई — बिक्री, प्राप्त कमीशन, प्राप्त किराया, प्राप्त ब्याज।
- व्यय: आगम कमाने में लगी लागत — माल की लागत, वेतन, किराया।
- आय: धन में वृद्धि; सरल रूप में आय = आगम − व्यय।
- लाभ: आगम व्यय से ज़्यादा। सकल लाभ = बिक्री − बेचे गए माल की लागत; शुद्ध लाभ = सकल लाभ + अन्य आय − बाकी सब व्यय।
- अभिलाभ: अनियमित, गैर-व्यापारिक लाभ — स्थायी संपत्ति बही मूल्य से ऊपर बेचना।
- हानि: व्यय आगम से ज़्यादा, या बिना लाभ पैसा जाना, जैसे आग या चोरी से माल नष्ट।
स्टॉक, देनदार, लेनदार और प्रमाणक
- स्टॉक (रहतिया): बेचने के लिए रखा माल, कच्चा माल और अधबना माल। अंतिम स्टॉक लागत या शुद्ध वसूली मूल्य, जो कम हो, पर आँका जाता है।
- देनदार: जो व्यवसाय को पैसा देगा, प्रायः उधार बिक्री के कारण। चालू संपत्ति।
- लेनदार: जिसे व्यवसाय को पैसा देना है, प्रायः उधार ख़रीद के कारण। चालू देयता।
- प्रमाणक: लेन-देन का लिखित सबूत (बिल, रसीद, कैश मेमो)।
और शब्द: माल (जिसका व्यापार होता है), क्रय और विक्रय, क्रय/विक्रय वापसी।
व्यापारिक छूट और नकद छूट
व्यापारिक छूट थोक ख़रीद बढ़ाने के लिए सूची मूल्य में कमी है। यह बीजक पर दिखती है पर खातों में नहीं लिखी जाती; प्रविष्टि बीजक मूल्य पर होती है।
नकद छूट जल्दी भुगतान के लिए मिलती है। यह लिखी जाती है: देने वाले के लिए "प्राप्त छूट" (आय), पाने वाले के लिए "दी गई छूट" (व्यय)।
क्रम: पहले सूची मूल्य पर व्यापारिक छूट, फिर बची रकम पर नकद छूट।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- पूँजी = संपत्तियाँ − बाहरी देयताएँ
- लाभ = आगम − व्यय
- बीजक मूल्य = सूची मूल्य − व्यापारिक छूट
- भुगतान = बीजक मूल्य − नकद छूट
- अंतिम पूँजी = आरंभिक पूँजी + अतिरिक्त पूँजी + लाभ − आहरण
हल किए गए उदाहरण
1. अमन ₹1,00,000 नकद और ₹50,000 की कार से व्यवसाय शुरू करता है। उसकी पूँजी कितनी है?
पूँजी = जो कुछ लाया = ₹1,00,000 + ₹50,000 = ₹1,50,000।
2. वर्गीकरण कीजिए: मशीन, 5 साल का बैंक ऋण, स्टॉक, लेनदार, पेटेंट, पूर्वदत्त किराया।
गैर-चालू संपत्ति: मशीन, पेटेंट। चालू संपत्ति: स्टॉक, पूर्वदत्त किराया। गैर-चालू देयता: 5 साल का ऋण। चालू देयता: लेनदार।
3. पूँजीगत या आयगत: (क) ऑफ़िस में नया AC ₹30,000, (ख) बाद में उसकी मरम्मत ₹2,000, (ग) नई मशीन की स्थापना ₹5,000।
(क) पूँजीगत। (ख) आयगत। (ग) पूँजीगत — स्थापना मशीन को तैयार करने की लागत का हिस्सा है।
4. ₹40,000 सूची मूल्य का माल 10% व्यापारिक और 2% नकद छूट पर बेचा; ग्राहक तुरंत भुगतान करता है। कितनी रकम मिली?
व्यापारिक छूट = ₹4,000 → बीजक ₹36,000। नकद छूट = 2% × 36,000 = ₹720। प्राप्त = ₹35,280। खातों में बिक्री ₹36,000 और दी गई छूट ₹720।
5. ₹18,000 बही मूल्य का फ़र्नीचर ₹15,000 में बेचा। अभिलाभ या हानि?
बही मूल्य से कम में बेचा, हानि = ₹3,000 (गैर-व्यापारिक हानि)।
6. आरंभिक पूँजी ₹2,00,000, अतिरिक्त पूँजी ₹30,000, लाभ ₹45,000, आहरण ₹25,000। अंतिम पूँजी?
2,00,000 + 30,000 + 45,000 − 25,000 = ₹2,50,000।
आम गलतियाँ
- व्यापारिक छूट को खातों में लिखना। केवल बीजक मूल्य लिखा जाता है।
- नकद छूट सूची मूल्य पर निकालना। यह व्यापारिक छूट के बाद की रकम पर निकलती है।
- आहरण को व्यवसाय का व्यय मानना। आहरण पूँजी घटाता है, लाभ-हानि खाते में नहीं जाता।
- नई मशीन की स्थापना को आयगत व्यय कहना। यह पूँजीगत व्यय है।