विद्युत-चुंबकीय प्रेरण: मूल विचार
जब किसी तार की कुंडली से गुज़रने वाला चुंबकीय क्षेत्र बदलता है, तो कुंडली में वोल्टेज पैदा होता है। परिपथ बंद हो तो धारा बहती है। इसे विद्युत-चुंबकीय प्रेरण कहते हैं। माइकल फ़ैराडे ने 1831 में इसे खोजा।
ज़्यादा फेरे, तेज़ चुंबक या तेज़ घुमाव से वोल्टेज बढ़ता है। कुछ न हिले तो कुछ प्रेरित नहीं होता।
प्रत्यावर्तित्र और टरबाइन
प्रत्यावर्तित्र (AC जनित्र) में चुंबक (रोटर) स्थिर कुंडलियों (स्टेटर) के अंदर घूमता है। हर आधे चक्कर में क्षेत्र पलटता है, इसलिए धारा कभी एक ओर, कभी दूसरी ओर बहती है: प्रत्यावर्ती धारा (AC)। भारत और यूरोप में 50 Hz, उत्तर अमेरिका में 60 Hz।
टरबाइन बहुत-सी पंखुड़ियों वाला धुरा है। भाप, पानी या हवा पंखुड़ियों से टकराती है, धुरा घूमता है और प्रत्यावर्तित्र घूमता है।
कोयला बिजलीघर की ऊर्जा शृंखला: रासायनिक ऊर्जा → ऊष्मा → भाप और टरबाइन की गतिज ऊर्जा → विद्युत ऊर्जा।
बिजलीघरों के प्रकार
ताप (कोयला, गैस, तेल, जैव-ईंधन)
ईंधन जलकर पानी उबालता है, भाप टरबाइन घुमाती है। फिर संघनित्र (condenser) में भाप ठंडी होकर पानी बनती है (बड़ी कूलिंग टावर)। भरोसेमंद, पर CO₂ और धुआँ छोड़ता है।
नाभिकीय
यूरेनियम के नाभिक टूटने (विखंडन) से ऊष्मा निकलती है जो भाप बनाती है। लगभग CO₂ नहीं, पर रेडियोधर्मी कचरा बहुत समय तक सुरक्षित रखना पड़ता है।
जल-विद्युत
बाँध के पीछे जमा पानी पाइपों से गिरकर टरबाइन घुमाता है। शृंखला: गुरुत्वीय स्थितिज → गतिज → विद्युत। साफ़ और जल्दी चालू, पर घाटियाँ डूबती हैं।
पवन
हवा बड़ी पंखुड़ियाँ घुमाती है जो जनित्र से जुड़ी हैं। ईंधन नहीं, पर बिजली मौसम पर निर्भर।
सौर प्रकाश-वोल्टीय (PV)
सौर सेल सिलिकॉन की परतों से बनता है। प्रकाश इलेक्ट्रॉनों को चलने लायक़ ऊर्जा देता है और दिष्ट धारा (DC) बनती है। इन्वर्टर DC को ग्रिड के लिए AC बनाता है। केवल दिन में काम करता है।
दक्षता, स्थान और इतिहास
दक्षता = उपयोगी विद्युत ऊर्जा ÷ दी गई ऊर्जा × 100%। कोयला बिजलीघर सिर्फ़ 35–40% दक्ष है; बाक़ी ऊर्जा ठंडे पानी में ऊष्मा बनकर निकलती है। बड़े जल टरबाइन 90% तक दक्ष होते हैं।
कहाँ बनाएँ: ताप बिजलीघर को ईंधन (खदान या बंदरगाह के पास) और ढेर सारा ठंडा पानी चाहिए; नाभिकीय को ठंडा पानी, मज़बूत ज़मीन और शहरों से दूरी; जल-विद्युत को ऊँचाई से गिरती नदी वाली घाटी; पवन को खुली हवादार ज़मीन या समुद्र; सौर को धूप वाली सस्ती ज़मीन।
बिजली की दो सदियाँ: बैटरी (लगभग 1800) → फ़ैराडे का प्रेरण (1831) → पहले सार्वजनिक बिजलीघर (1880 का दशक) → बड़े ताप और जल बिजलीघर (1900 के दशक) → नाभिकीय (1950 के दशक) → पवन और सौर की तेज़ बढ़त (2000 के बाद)।
ग्रिड: बिजलीघर पर ट्रांसफ़ॉर्मर वोल्टेज बढ़ाता है (जैसे 400 kV)। ज़्यादा वोल्टेज यानी उतनी ही शक्ति के लिए कम धारा, इसलिए तारों में ऊष्मा का नुक़सान कम। घरों के पास ट्रांसफ़ॉर्मर इसे 230 V तक घटाते हैं।
करके देखिए: घर का जनित्र
अगर साइकिल में डायनमो वाली बत्ती है, तो पिछला पहिया उठाकर पैडल धीरे, फिर तेज़ घुमाइए। चुंबक तेज़ घूमने पर बत्ती ज़्यादा चमकती है। पैडल रोकिए: अँधेरा। पहले अनुमान लगाइए, फिर 3D के आख़िरी क़दम में गति स्लाइडर से जाँचिए।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
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हल किए गए उदाहरण
1. एक बिजलीघर 1000 MJ ईंधन ऊर्जा लेकर 380 MJ विद्युत ऊर्जा देता है। दक्षता?
380 ÷ 1000 × 100% = 38%।
2. 2 MW की पवन टरबाइन 6 घंटे पूरी शक्ति से चलती है। ऊर्जा kWh में?
2 MW = 2000 kW। E = 2000 × 6 = 12 000 kWh।
3. जल-विद्युत बिजलीघर की ऊर्जा शृंखला लिखिए।
जमा पानी की गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा → गिरते पानी की गतिज ऊर्जा → टरबाइन की गतिज ऊर्जा → विद्युत ऊर्जा।
4. एक बिजलीघर 100 MW भेजता है। 200 kV पर धारा कितनी? 400 kV पर?
I = P ÷ V = 100 000 000 ÷ 200 000 = 500 A। 400 kV पर 250 A। आधी धारा, बहुत कम ऊष्मा-हानि।
आम गलतियाँ
- कहना कि जनित्र "ऊर्जा बनाता" है। वह केवल गतिज ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलता है।
- सोचना कि सौर पैनल में टरबाइन होता है। वह प्रकाश को सीधे बिजली में बदलता है।
- सोचना कि कुंडली में रखा स्थिर चुंबक धारा देगा। क्षेत्र बदलना (हिलना/घूमना) ज़रूरी है।
- कहना कि नाभिकीय बिजलीघर यूरेनियम जलाता है। वह नाभिक तोड़ता है (विखंडन); कुछ जलता नहीं।