पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र क्या है?
चुम्बक के चारों ओर वह जगह जहाँ वह खींचता या धकेलता है, चुम्बकीय क्षेत्र कहलाती है। पृथ्वी का भी एक क्षेत्र है। यह ऐसा लगता है जैसे अंदर एक छड़ चुम्बक रखा हो, जो घूर्णन धुरी से थोड़ा टेढ़ा है।
खुला लटका चुम्बक या कंपास की सुई इसी क्षेत्र के साथ खड़ी हो जाती है। ध्यान रखिए: उत्तर का चुम्बकीय ध्रुव असल में पृथ्वी-चुम्बक का दक्षिणी ध्रुव है, इसीलिए वह सुई के उत्तरी सिरे को खींचता है।
क्षेत्र कमज़ोर है: ज़मीन पर लगभग 50 माइक्रोटेस्ला। फ्रिज का चुम्बक इससे बहुत तेज़ है। पर यह अंतरिक्ष में हज़ारों किमी तक फैला है।
क्षेत्र कहाँ से आता है? डायनमो
पृथ्वी का अंदर इतना गर्म है कि वह ठोस चुम्बक नहीं हो सकता। लोहा लगभग 770 °C से ऊपर चुम्बकत्व खो देता है। इसलिए दूसरा विचार है: भू-डायनमो।
- बाहरी कोर पिघले लोहे और निकेल का है।
- अंदरूनी कोर से उठती गर्मी से तरल उबलते सूप जैसा घूमता है।
- पृथ्वी का घूर्णन बहते तरल को सर्पिल में मोड़ता है।
- बहता विद्युत-चालक तरल विद्युत धारा बनाता है। धारा चुम्बकीय क्षेत्र बनाती है, और क्षेत्र धारा को चलाए रखता है।
इसे स्वयं-चलित डायनमो कहते हैं। पुरानी चट्टानें ठंडी होते समय क्षेत्र की दिशा सँभाल लेती हैं। उनसे पता चलता है कि ध्रुव कई बार उलट चुके हैं, औसतन हर कुछ सौ हज़ार साल में, बिना तय समय के।
कंपास और तीन तत्व: विचलन, नमन, तीव्रता
किसी जगह का क्षेत्र बताने के लिए तीन संख्याएँ चाहिए (चुम्बकीय तत्व)।
- विचलन (D): भौगोलिक उत्तर और चुम्बकीय उत्तर के बीच का कोण। यह इसलिए है क्योंकि चुम्बक की धुरी लगभग 11° टेढ़ी है।
- नमन (I): क्षेत्र और ज़मीन के बीच का कोण। विषुवत पर सुई समतल (0°) और चुम्बकीय ध्रुव पर सीधी नीचे (90°) होती है।
- क्षैतिज घटक (H): क्षेत्र का वह भाग जो ज़मीन के समानांतर है। साधारण कंपास को यही घुमाता है। H = B cos I, और ऊर्ध्वाधर भाग Z = B sin I।
साधारण द्विध्रुव के लिए tan I = 2 tan λ, जहाँ λ चुम्बकीय अक्षांश है।
चुम्बकमंडल, सौर पवन और ओरोरा (सुरक्षा)
सूर्य आवेशित कणों की धारा भेजता है, जिसे सौर पवन कहते हैं। चुम्बकीय क्षेत्र में तेज़ आवेशित कण पर तिरछा बल लगता है, इसलिए वह सीधा नहीं जाता, मुड़ जाता है।
पृथ्वी का क्षेत्र एक बड़ा बुलबुला बनाता है, चुम्बकमंडल। सूर्य की ओर यह लगभग 10 पृथ्वी-त्रिज्या तक दबा है और रात की ओर लंबी पूंछ बनाता है। सौर पवन इसके चारों ओर ऐसे बहता है जैसे पत्थर के चारों ओर पानी।
इससे हवा, पानी और जीवन बचते हैं। जो कण अंदर आते हैं, वे क्षेत्र रेखाओं के साथ ध्रुवों तक जाते हैं। वहाँ वे हवा के अणुओं से टकराकर प्रकाश बनाते हैं: ओरोरा (उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवीय ज्योति)। ऑक्सीजन हरा या लाल, नाइट्रोजन नीला या बैंगनी चमकती है।
लगभग 60 किमी से ऊपर आयनमंडल है, आवेशित हवा की परत। यह कुछ रेडियो तरंगों को लौटाती है, इसलिए लंबी दूरी का रेडियो संभव है। बड़ा सौर तूफ़ान इसे बिगाड़ सकता है और उपग्रह, GPS व बिजली ग्रिड को परेशान कर सकता है।
आज़माइए: अपना कंपास बनाइए
- एक स्टील की सूई को चुम्बक पर 20 बार एक ही दिशा में रगड़िए।
- सूई को छोटे कॉर्क या पत्ते में पिरोकर पानी के कटोरे में तैराइए।
- पहले अनुमान लगाइए: किस ओर ठहरेगी? फिर देखिए और फ़ोन के कंपास से मिलाइए।
- सुई के पास चुम्बक लाइए: सुई उसी ओर मुड़ जाएगी। पास का चुम्बक पृथ्वी के कमज़ोर क्षेत्र से अधिक बलवान है।
ऊपर के 3D में स्थान स्लाइडर चलाइए और नमन कोण पढ़िए।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- द्विध्रुव के लिए नमन: tan I = 2 tan λ
- क्षैतिज भाग H = B cos I, ऊर्ध्वाधर भाग Z = B sin I
- B = √(H² + Z²), tan I = Z / H
- सतह पर क्षेत्र ≈ 25–65 μT (1 μT = 10⁻⁶ T)
- धुरी का झुकाव ≈ 11°
हल किए गए उदाहरण
1. चुम्बकीय विषुवत पर क्षेत्र 40 μT है। नमन और क्षैतिज भाग बताइए।
विषुवत पर λ = 0, इसलिए tan I = 0 और I = 0°। क्षैतिज भाग H = B cos 0 = 40 μT और Z = 0।
2. किसी स्थान पर क्षैतिज भाग 30 μT और नमन 60° है। कुल क्षेत्र B निकालिए।
H = B cos I, इसलिए B = H / cos I = 30 / 0.5 = 60 μT।
3. उत्तर के बहुत पास कंपास ठीक से काम क्यों नहीं करता?
चुम्बकीय ध्रुव के पास क्षेत्र लगभग सीधा नीचे होता है। क्षैतिज भाग H बहुत छोटा हो जाता है, इसलिए सुई को पर्याप्त बल नहीं मिलता।
आम गलतियाँ
- उत्तरी चुम्बकीय ध्रुव को पृथ्वी-चुम्बक का उत्तरी ध्रुव समझना। वह असल में दक्षिणी ध्रुव है, इसीलिए सुई का उत्तरी सिरा उसकी ओर खिंचता है।
- विचलन और नमन को एक समझना। विचलन आड़ा (पूर्व-पश्चिम) कोण है, नमन ऊपर-नीचे का।
- कोर को ठोस चुम्बक मानना। वह बहुत गर्म है; क्षेत्र बहते तरल लोहे से आता है।
- ओरोरा को सिर्फ़ उत्तर में मानना। यह दोनों ध्रुवों पर होता है।