तारे आकाशगंगा की परिक्रमा कैसे करते हैं
तारे गुरुत्व के कारण आकाशगंगा के केंद्र की परिक्रमा करते हैं। वृत्ताकार कक्षा के लिए गुरुत्व को ठीक उतना खिंचाव देना होता है, इसलिए चाल है
v = √(G M ÷ r)
जहाँ M कक्षा के भीतर का द्रव्यमान और r केंद्र से दूरी है। अगर लगभग सारा द्रव्यमान बीच में हो (जैसे सौरमंडल में सूर्य), तो M वही रहता है और r बढ़ने पर v घटता है। इसीलिए पृथ्वी 30 km/s से चलती है और वरुण लगभग 5 km/s से।
कक्षीय चाल बनाम दूरी के ग्राफ़ को घूर्णन वक्र (rotation curve) कहते हैं।
समतल घूर्णन वक्र: प्रमाण
खगोलविद आकाशगंगाओं में गैस और तारों की चाल डॉप्लर विस्थापन से नापते हैं: एक ओर का भाग हमारी तरफ़ आता है (नील-विस्थापन), दूसरा दूर जाता है (अभिरक्त-विस्थापन)। हमारी आकाशगंगा में सूर्य की दूरी पर चाल लगभग 220 km/s है। 1970 के दशक में वेरा रूबिन और अन्य ने पाया कि कई आकाशगंगाओं में दिखने वाली चक्रिका के बहुत बाहर भी चाल सपाट रहती है, यहाँ तक कि बढ़ती भी है।
सपाट वक्र में v स्थिर है, इसलिए M को r के अनुपात में बढ़ना होगा। पर किनारे पर रोशनी मद्धिम पड़ जाती है। तो वहाँ बहुत सारा द्रव्यमान ऐसा है जो रोशनी नहीं देता: डार्क मैटर। आकाशगंगा में उसका द्रव्यमान दिखने वाले पदार्थ से लगभग 5 से 10 गुना है।
दूसरे संकेत भी यही बताते हैं: आकाशगंगा-समूहों द्वारा प्रकाश का मुड़ना (गुरुत्वीय लेंसिंग), समूहों के भीतर आकाशगंगाओं की तेज़ गति, और आरंभिक ब्रह्मांड की माइक्रोवेव चमक का पैटर्न।
डार्क मैटर क्या है (और क्या नहीं)
डार्क मैटर वह पदार्थ है जो प्रकाश न देता है, न सोखता है, न लौटाता है, इसलिए हम उसे केवल गुरुत्व से जान पाते हैं। वह हर आकाशगंगा के चारों ओर एक बड़ा, लगभग गोल हेलो बनाता है, जो दिखने वाली चक्रिका से कहीं बड़ा है।
- यह धूल या गैस के अँधेरे बादल नहीं हैं (उन्हें हम रोशनी पर उनके असर से पकड़ लेते हैं)।
- यह मुख्यतः ब्लैक होल या धुँधले तारे नहीं हैं; सर्वेक्षणों ने इनकी बहुत कम मात्रा ही पाई है।
- ज़्यादातर वैज्ञानिक मानते हैं कि यह नए, अज्ञात कणों से बना है। ज़मीन के गहरे भीतर लगे संसूचक इन्हें खोज रहे हैं। अब तक कोई कण पकड़ में नहीं आया।
एक वैकल्पिक विचार यह है कि बहुत कम त्वरण पर गुरुत्व का नियम ही बदल जाता है (संशोधित गुरुत्व), पर डार्क मैटर कई प्रेक्षणों को साथ-साथ बेहतर समझाता है।
डार्क एनर्जी और ब्रह्मांड का हिसाब
जैसे-जैसे अंतरिक्ष फैलता है, आकाशगंगाएँ एक-दूसरे से दूर जा रही हैं। 1998 में दूर के विस्फोटित तारों ने दिखाया कि फैलाव तेज़ हो रहा है, धीमा नहीं। इसके अज्ञात कारण को डार्क एनर्जी कहते हैं।
सब मिलाकर ब्रह्मांड की ऊर्जा-सामग्री लगभग इतनी है:
- 5% साधारण पदार्थ (परमाणु: तारे, ग्रह, गैस, हम)
- 27% डार्क मैटर
- 68% डार्क एनर्जी
डार्क मैटर चीज़ों को पास खींचता है (उसने आकाशगंगाएँ बनाने में मदद की)। डार्क एनर्जी अंतरिक्ष को दूर धकेलती है। दोनों 'डार्क' हैं, पर अलग चीज़ें हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- कक्षीय चाल v = √(G M ÷ r)
- कक्षा के भीतर द्रव्यमान M = v² r ÷ G
- परिक्रमण काल T = 2π r ÷ v
- ब्रह्मांड का हिसाब ≈ 5% साधारण पदार्थ + 27% डार्क मैटर + 68% डार्क एनर्जी
हल किए गए उदाहरण
1. आकाशगंगा के केंद्र से 8 kpc दूर एक तारा 220 km/s से चलता है। एक चक्कर में कितना समय लगता है? (1 kpc = 3.09 × 10¹⁶ km, 1 वर्ष = 3.16 × 10⁷ s)
r = 8 × 3.09 × 10¹⁶ = 2.47 × 10¹⁷ km। T = 2πr ÷ v = 2π × 2.47 × 10¹⁷ ÷ 220 ≈ 7.05 × 10¹⁵ s। 3.16 × 10⁷ s प्रति वर्ष से भाग: T ≈ 2.2 × 10⁸ वर्ष, यानी लगभग 22 करोड़ वर्ष।
2. यदि केवल केंद्रीय द्रव्यमान खींचता, तो 10 kpc पर तारे की चाल 220 km/s होती। 40 kpc पर तारे की चाल कितनी होनी चाहिए?
केंद्रीय द्रव्यमान के लिए v ∝ 1 ÷ √r। दूरी 4 गुना है, इसलिए चाल 1 ÷ √4 = आधी। अपेक्षित v = 110 km/s। असली आकाशगंगाओं में लगभग 220 km/s मिलती है: बड़ा अंतर।
3. यदि 8 kpc पर चाल 220 km/s है, तो उसके भीतर का द्रव्यमान निकालिए। (G = 6.67 × 10⁻¹¹ N m² kg⁻², 1 kpc = 3.09 × 10¹⁹ m, M☉ = 2 × 10³⁰ kg)
r = 2.47 × 10²⁰ m, v = 2.2 × 10⁵ m/s। M = v² r ÷ G = (4.84 × 10¹⁰)(2.47 × 10²⁰) ÷ 6.67 × 10⁻¹¹ ≈ 1.8 × 10⁴¹ kg ≈ 9 × 10¹⁰ सूर्य, यानी लगभग 90 अरब सूर्य।
आम गलतियाँ
- डार्क मैटर को धूल या गैस समझना। धूल और गैस रोशनी पर असर से पकड़ में आ जाती हैं; डार्क मैटर नहीं आता।
- डार्क मैटर और डार्क एनर्जी को एक समझना। डार्क मैटर खींचता है (गुरुत्व); डार्क एनर्जी अंतरिक्ष को और तेज़ फैलाती है।
- यह कहना कि डार्क मैटर के कण का होना सिद्ध है। यह प्रमुख विचार है, पर अब तक कोई कण मिला नहीं।
- किनारे के तारों को धीमा मान लेना। माप दिखाते हैं कि वे भीतरी तारों जितने ही तेज़ हैं।