आकाशगंगा की संरचना
मंदाकिनी (galaxy) तारों, गैस, धूल और डार्क मैटर का विशाल परिवार है जिसे गुरुत्व बाँधे रखता है। हमारी मंदाकिनी आकाशगंगा (मिल्की वे) है, एक छड़दार सर्पिल मंदाकिनी।
- चकती: चपटी और पतली, लगभग 1,00,000 प्रकाश-वर्ष चौड़ी पर सिर्फ़ लगभग 1,000 प्रकाश-वर्ष मोटी। इसमें नए तारे, गैस और धूल हैं।
- उभार और छड़: बीच का मोटा, चमकीला भाग, पुराने तारों से बना, छड़ के आकार में खिंचा।
- प्रभामंडल: सबके चारों ओर धुँधला गोल बादल, जिसमें पुराने तारे, गोलाकार तारागुच्छ और ज़्यादातर डार्क मैटर है।
अंदर से चकती की सीध में देखने पर बहुत सारे तारे एक पट्टी में दिखते हैं। यही रात की "दूधिया पट्टी" है।
सर्पिल भुजाएँ और 21 cm हाइड्रोजन रेखा
चकती में सर्पिल भुजाएँ हैं, जहाँ गैस दबती है और बहुत से नए तारे बनते हैं, इसलिए भुजाएँ चमकीली और नीली दिखती हैं। हमारी आकाशगंगा की दो मुख्य और कुछ छोटी भुजाएँ हैं; सूर्य एक छोटी भुजा, ओरायन भुजा, में है।
धूल दृश्य प्रकाश रोकती है, तो अंदर से भुजाओं का नक्शा कैसे बने? ठंडे हाइड्रोजन परमाणु 21 cm तरंगदैर्ध्य (लगभग 1420 MHz) की रेडियो तरंगें देते हैं। ये धूल के पार निकल जाती हैं। हर गैस बादल अलग चाल से चलता है, इसलिए उसकी 21 cm रेखा थोड़ी खिसकती है (डॉप्लर प्रभाव)। इन खिसकावों से बादलों की जगह निकलती है और भुजाएँ दिख जाती हैं।
सूर्य की जगह, घूर्णन और डार्क मैटर
सूर्य केंद्र से लगभग 26,000 प्रकाश-वर्ष दूर है, लगभग आधे रास्ते पर। यह लगभग 230 km/s से चलता है और एक चक्कर में लगभग 23 करोड़ वर्ष लगाता है। इसे मंदाकिनी वर्ष कहते हैं।
घूर्णन वक्र
घूर्णन वक्र केंद्र से दूरी के साथ कक्षा की चाल का ग्राफ़ है। अगर ज़्यादातर द्रव्यमान चमकीले केंद्र में होता, तो दूर के तारे धीमे चलते (जैसे बाहरी ग्रह)। पर चाल दूर तक लगभग सपाट रहती है। इसलिए आकाशगंगा में बहुत सा न दिखने वाला द्रव्यमान है: डार्क मैटर, शायद दिखने वाले पदार्थ से 5–10 गुना।
करके देखो
खेल वाले चरण में दूरी का स्लाइडर चलाओ। असली चाल की तुलना सिर्फ़ दिखने वाले पदार्थ से अपेक्षित चाल से करो।
तारागुच्छ, तारा-संघ, नीहारिकाएँ और केंद्र का ब्लैक होल
- खुले तारागुच्छ: चकती में दसियों से हज़ारों नए तारों के ढीले समूह, जैसे कृत्तिका (Pleiades)।
- गोलाकार तारागुच्छ: प्रभामंडल में लाखों बहुत पुराने तारों की कसी गेंदें। हमारी आकाशगंगा के चारों ओर लगभग 150 ज्ञात हैं।
- तारा-संघ: गर्म नीले तारों के बहुत नए, ढीले समूह जो धीरे-धीरे बिखर जाते हैं।
- नीहारिकाएँ: गैस और धूल के बादल। उत्सर्जन नीहारिका चमकती है (जैसे ओरायन नीहारिका, जहाँ तारे बन रहे हैं), परावर्तन नीहारिका तारों का प्रकाश लौटाती है, और काली नीहारिका पीछे का प्रकाश रोकती है।
Sgr A*
ठीक केंद्र में Sgr A* है, लगभग 40 लाख सौर द्रव्यमान का अतिविशाल ब्लैक होल। यह सीधा नहीं दिखता, पर पास के तारे हज़ारों km/s से कुछ ही वर्षों में चक्कर लगाते हैं। उनकी कक्षाओं से द्रव्यमान मिला। 2022 में इवेंट होराइज़न टेलिस्कोप ने इसकी छाया की तस्वीर जारी की।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- मंदाकिनी वर्ष ≈ 2πr ÷ v ≈ 23 करोड़ वर्ष
- सूर्य: r ≈ 26,000 प्रकाश-वर्ष (8 kpc), v ≈ 230 km/s
- 1 प्रकाश-वर्ष ≈ 9.46 × 10¹² km
- 21 cm रेखा: λ = 21.1 cm, f ≈ 1420 MHz
- सपाट घूर्णन वक्र ⇒ दूरी के साथ द्रव्यमान बढ़ता ⇒ डार्क मैटर
- Sgr A* ≈ 4 × 10⁶ सौर द्रव्यमान
हल किए गए उदाहरण
1. सूर्य 230 km/s से 26,000 प्रकाश-वर्ष त्रिज्या पर घूमता है। मंदाकिनी वर्ष का अनुमान लगाओ।
r ≈ 2.46×10¹⁷ km। 2πr ≈ 1.55×10¹⁸ km। समय = 1.55×10¹⁸ ÷ 230 ≈ 6.7×10¹⁵ s ≈ 2.1×10⁸ वर्ष, यानी लगभग 21–23 करोड़ वर्ष।
2. भुजाओं का नक्शा रेडियो तरंगों से क्यों बनाते हैं?
चकती की धूल दृश्य प्रकाश रोकती है। हाइड्रोजन की 21 cm तरंगें धूल के पार निकल जाती हैं।
3. चकती से बहुत ऊपर 3 लाख पुराने तारों की कसी गेंद है। यह क्या है?
प्रभामंडल का गोलाकार तारागुच्छ।
4. आकाशगंगा की पट्टी धनु की ओर सबसे चमकीली क्यों?
वह दिशा केंद्र की है, जहाँ उभार में सबसे ज़्यादा तारे हैं।
आम गलतियाँ
- सूर्य को आकाशगंगा के केंद्र में मानना। यह लगभग आधे रास्ते पर है।
- खुले और गोलाकार तारागुच्छ मिलाना। खुला = नया, ढीला, चकती में; गोलाकार = पुराना, कसा, प्रभामंडल में।
- 21 cm रेखा को दिखने वाला प्रकाश मानना। यह रेडियो तरंग है।
- सपाट घूर्णन वक्र का मतलब दूर द्रव्यमान नहीं समझना। इसका मतलब है दिखने से ज़्यादा द्रव्यमान।