क्या तारों के बीच की जगह सच में खाली है?
अंतरतारकीय माध्यम (ISM) आकाशगंगा के तारों के बीच का सारा पदार्थ है। यह बेहद हल्का है: औसतन हर घन सेंटीमीटर में लगभग 1 परमाणु। उतनी ही जगह में आपकी साँस की हवा में लगभग 2.5 × 1019 अणु होते हैं। प्रयोगशाला का सबसे अच्छा निर्वात भी ISM के कई हिस्सों से ज़्यादा घना है।
पर अंतरिक्ष इतना विशाल है कि यह हल्का पदार्थ भी जुड़कर बहुत हो जाता है। हमारी आकाशगंगा में गैस का कुल द्रव्यमान अरबों सूर्यों के बराबर है। ISM नए तारों का कच्चा माल है, और वही जगह है जहाँ पुराने तारे अपनी गैस लौटाते हैं।
भार के हिसाब से बनावट: लगभग 70% हाइड्रोजन, 28% हीलियम और लगभग 2% भारी तत्व, जिनका बड़ा भाग धूल में बँधा है।
गैस के बादल और अंतरिक्ष में अणु
गैस हर जगह एक जैसी नहीं है। इसके कई तरह के क्षेत्र हैं।
- गरम, हल्की गैस: विस्फोट होते तारों से गरम; बहुत विरल।
- हाइड्रोजन परमाणुओं की गुनगुनी गैस: इसी से 21 सेमी वाला रेडियो संकेत आता है।
- ठंडे, घने आणविक बादल: लगभग 10 K (−263 °C), औसत से 100 से दस लाख गुना घने। यहाँ परमाणु जुड़कर अणु बनाते हैं।
सबसे आम अणु H₂ है, पर उसे देखना कठिन है। खगोलविद बादलों को कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) से खोजते हैं, जो रेडियो तरंगें भेजता है। अंतरिक्ष में 200 से ज़्यादा अणु मिल चुके हैं: पानी, अमोनिया, ऐल्कोहॉल जैसे और कार्बन-शृंखला वाले अणु, जो कार्बनिक रसायन की साधारण ईंटें हैं।
आणविक बादल नए तारों की पौधशाला हैं (तारा-गुच्छ वाला पाठ देखिए)।
अंतरतारकीय धूल
अंतरतारकीय धूल कार्बन-प्रधान पदार्थ, सिलिकेट (चट्टान जैसे) और बर्फ़ के सूक्ष्म ठोस कणों से बनी है। एक कण लगभग 0.1 माइक्रोमीटर (0.0001 मिमी) चौड़ा होता है, धुएँ के कणों जितना। धूल ISM के भार का केवल 1% है।
धूल तीन कारणों से महत्त्वपूर्ण है: यह तारों की रोशनी रोकती और लाल करती है; यह वह सतह है जहाँ H₂ जैसे अणु बनते हैं; और यह ग्रहों का बीज है क्योंकि नए तारा-मंडलों में कण आपस में चिपकते हैं।
गरम धूल अवरक्त में चमकती है, इसलिए अवरक्त दूरबीनें धूल भरे बादलों के आर-पार देख सकती हैं जहाँ दृश्य प्रकाश नहीं जा पाता।
विलोपन और रक्तिमा
अंतरतारकीय विलोपन का अर्थ है कि तारे की रोशनी हम तक आते-आते फीकी हो जाती है। धूल-कण कुछ रोशनी सोख लेते हैं (और गरम हो जाते हैं) और कुछ को दूसरी दिशाओं में बिखेर देते हैं।
कण लगभग नीली रोशनी की तरंगदैर्ध्य जितने छोटे हैं, इसलिए वे नीली रोशनी को लाल से बहुत ज़्यादा रोकते हैं (मोटे तौर पर 1 ÷ तरंगदैर्ध्य के अनुपात में)। इसलिए हम तक पहुँचने वाली रोशनी न केवल फीकी, बल्कि ज़्यादा लाल भी होती है। यही अंतरतारकीय रक्तिमा है।
विलोपन को हम परिमाण (magnitude) में लिखते हैं: A = 2.5 × log10(भेजी गई रोशनी ÷ पहुँची रोशनी)। यदि केवल 10% पहुँचे तो A = 2.5 परिमाण। धूल के पीछे का तारा जितना होना चाहिए उससे फीका दिखता है, इसलिए धूल भूल जाएँ तो तारा असल से दूर लगता है। खगोलविद इसे सुधारते हैं: तारे का देखा गया रंग उसके अपेक्षित रंग से मिलाकर।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- विलोपन A = 2.5 × log₁₀(I₀ ÷ I) परिमाण
- बची रोशनी का अंश = 10^(−A ÷ 2.5)
- धूल नीली रोशनी को लाल से ज़्यादा रोकती है (मोटे तौर पर ∝ 1 ÷ तरंगदैर्ध्य)
हल किए गए उदाहरण
1. एक तारा धूल के पीछे है और उसकी केवल 10% रोशनी हम तक पहुँचती है। विलोपन परिमाण में निकालिए।
A = 2.5 × log₁₀(1 ÷ 0.1) = 2.5 × log₁₀(10) = 2.5 × 1 = 2.5 परिमाण।
2. एक धूल-बादल का विलोपन A = 5 परिमाण है। रोशनी का कितना अंश निकल पाता है?
अंश = 10^(−5 ÷ 2.5) = 10^(−2) = 0.01, यानी 1% रोशनी।
3. हवा में लगभग 2.5 × 10¹⁹ अणु प्रति cm³ होते हैं। ठंडे आणविक बादल में लगभग 10⁴ प्रति cm³। बादल हवा से कितने गुना हल्का है?
(2.5 × 10¹⁹) ÷ (10⁴) = 2.5 × 10¹⁵। बादल हवा से लगभग 25 लाख अरब गुना हल्का है, जबकि अंतरिक्ष के हिसाब से वह 'घना' है।
आम गलतियाँ
- अंतरिक्ष को पूरा खाली निर्वात समझना। उसमें प्रति cm³ लगभग 1 परमाणु की गैस और थोड़ी धूल होती है।
- यह सोचना कि ISM का ज़्यादातर भाग धूल है। भार का लगभग 99% गैस है; धूल लगभग 1%।
- यह कहना कि धूल तारे को बदलकर लाल कर देती है। तारा वही है; धूल रास्ते में नीली रोशनी हटा देती है।
- दूरी नापते समय विलोपन भूल जाना। फीका हुआ तारा असल से दूर दिखता है।