आवेश, चालक और कुचालक
आवेश दो तरह के हैं: धन (+) और ऋण (−)। समान आवेश एक-दूसरे को धकेलते हैं, असमान आवेश खींचते हैं। आवेश की इकाई कूलॉम (C) है। सबसे छोटा मुक्त आवेश एक इलेक्ट्रॉन का है, e = 1.6 × 10⁻¹⁹ C, इसलिए हर आवेश e का पूर्ण गुणज है (क्वांटीकरण): q = ne।
आवेश संरक्षित है: न बनता है, न नष्ट होता है, बस एक जगह से दूसरी जगह जाता है। काँच की छड़ को रेशम से रगड़ो तो इलेक्ट्रॉन काँच से रेशम पर जाते हैं; काँच + और रेशम उतना ही − हो जाता है।
चालक (धातु, मानव शरीर, पृथ्वी) में कुछ इलेक्ट्रॉन घूमने को आज़ाद हैं। कुचालक या परावैद्युत (प्लास्टिक, काँच, सूखा कागज़, रबर) में इलेक्ट्रॉन अपने परमाणु से बँधे रहते हैं।
आवेशित करने के तीन तरीके: घर्षण (दो अलग पदार्थ रगड़ना), चालन (आवेशित वस्तु को छूना, उसी चिह्न का आवेश मिलता है) और प्रेरण (बिना छुए, उल्टे चिह्न का आवेश)।
स्थिरवैद्युत प्रेरण: बिना छुए आवेशन
पास रखी आवेशित वस्तु के कारण चालक में आवेशों का अलग होना प्रेरण कहलाता है।
- कुचालक स्टैंड पर रखे उदासीन धातु गोले के पास ऋण छड़ लाओ।
- छड़ मुक्त इलेक्ट्रॉनों को दूर वाली तरफ़ धकेलती है। पास वाली तरफ़ इलेक्ट्रॉन कम होने से + हो जाती है। गोला कुल मिलाकर उदासीन है, फिर भी छड़ की ओर खिंचता है, क्योंकि + तरफ़ ज़्यादा पास है।
- दूर वाली तरफ़ को भू-संपर्क तार (या उँगली) से छुओ। छड़ के धक्के से इलेक्ट्रॉन ज़मीन में चले जाते हैं।
- पहले भू-संपर्क हटाओ, फिर छड़। गोले पर कुल + आवेश बचता है, जो पूरी सतह पर फैल जाता है।
प्रेरित आवेश हमेशा प्रेरक आवेश से उल्टे चिह्न का होता है। क्रम ज़रूरी है: छड़ पहले हटा दी तो इलेक्ट्रॉन वापस आ जाएँगे और गोला उदासीन रहेगा।
स्वर्णपत्र विद्युतदर्शी प्रेरण दिखाता है: आवेशित छड़ उसकी टोपी के पास लाओ तो पत्तियाँ फैल जाती हैं, क्योंकि दोनों पत्तियों पर एक जैसा आवेश पहुँचता है।
स्थिर अवस्था में चालक के अंदर विद्युत क्षेत्र शून्य होता है; सारा अतिरिक्त आवेश बाहरी सतह पर रहता है। इसीलिए धातु का बक्सा (फ़ैराडे पिंजरा) अंदर की चीज़ों को बचाता है।
कुचालक (परावैद्युत) का ध्रुवण
कुचालक में इलेक्ट्रॉन पदार्थ में घूम नहीं सकते। फिर भी विद्युत क्षेत्र उन्हें हर परमाणु या अणु के अंदर थोड़ा खिसका सकता है।
- अध्रुवीय अणुओं में इलेक्ट्रॉन बादल एक तरफ़ और नाभिक दूसरी तरफ़ खिंचता है, अणु छोटा द्विध्रुव (एक + सिरा, एक − सिरा) बन जाता है।
- ध्रुवीय अणुओं (जैसे पानी) में द्विध्रुव पहले से होते हैं पर बेतरतीब; क्षेत्र उन्हें एक दिशा में घुमा देता है।
नतीजा: ऋण छड़ की ओर वाली सतह पर + (बद्ध) आवेश की पतली परत और दूर वाली सतह पर −। यह परावैद्युत ध्रुवण है। बद्ध आवेश भू-संपर्क से नहीं हटते, चालक के प्रेरित आवेशों की तरह नहीं।
उल्टा आवेश पास होने से कुल खिंचाव होता है। इसीलिए आवेशित कंघी कागज़ खींचती है और रगड़ा गुब्बारा दीवार से चिपकता है। अंदर बद्ध आवेश बाहरी क्षेत्र का विरोध करते हैं, जिससे क्षेत्र परावैद्युतांक κ गुना घट जाता है (पानी के लिए लगभग 80, प्लास्टिक के लिए 2–3)।
चालकों के बीच आवेश का पुनर्वितरण
दो आवेशित चालकों को तार से जोड़ो तो आवेश ऊँचे विभव से नीचे विभव की ओर तब तक बहता है जब तक दोनों का विभव बराबर न हो जाए। कुल आवेश वही रहता है।
r त्रिज्या और q आवेश वाले अकेले गोले के लिए: V = kq/r, जहाँ k = 1/(4πε₀) ≈ 9 × 10⁹ N m² C⁻²।
दूर रखे, पतले तार से जुड़े दो गोलों के लिए: kq₁/r₁ = kq₂/r₂, यानी q₁/q₂ = r₁/r₂, और q₁ + q₂ = Q। इसलिए q₁ = Q·r₁/(r₁ + r₂) और साझा विभव V = kQ/(r₁ + r₂)।
पृष्ठ आवेश घनत्व σ = q/(4πr²)। चूँकि q ∝ r, इसलिए σ ∝ 1/r: छोटे गोले का σ ज़्यादा और सतह पर क्षेत्र (E = σ/ε₀) भी ज़्यादा। इसी कारण नुकीले सिरों से आवेश रिसता है (कोरोना विसर्जन) और तड़ित चालक नुकीले होते हैं।
दो एक जैसे गोले छूने पर आवेश बराबर बँटता है। भू-संपर्क चालक का विभव शून्य कर देता है; दूर रखे अकेले गोले का इससे सारा आवेश निकल जाता है।
इस बँटवारे में ऊर्जा संरक्षित नहीं रहती: कुछ ऊर्जा तार में ऊष्मा और चिंगारी में प्रकाश बनकर निकल जाती है।
करके देखो
गुब्बारे को सूखे बालों या ऊनी स्वेटर पर रगड़ो। उसे कागज़ के छोटे टुकड़ों के पास लाओ: वे उछलकर चिपकते हैं (ध्रुवण)। नल की पतली धार के पास लाओ: धार मुड़ जाती है (पानी के अणु ध्रुवीय हैं)। ज़मीन पर लिटाए खाली एल्युमिनियम कैन के पास लाओ: कैन गुब्बारे की ओर लुढ़कता है (चालक में प्रेरण)। पहले अंदाज़ा लगाओ, फिर करो। 3D का चरण 4 दिखाता है कि कागज़ के अंदर क्या होता है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- q = ne, e = 1.6 × 10⁻¹⁹ C (क्वांटीकरण)
- कुल आवेश संरक्षित: q₁ + q₂ = Q
- अकेले गोले का विभव: V = kq/r, k = 9 × 10⁹ N m² C⁻²
- जुड़े गोले: q₁/q₂ = r₁/r₂, V = kQ/(r₁ + r₂)
- पृष्ठ घनत्व: σ = q/(4πr²), जुड़े गोलों के लिए σ ∝ 1/r
- चालक के ठीक बाहर E = σ/ε₀; चालक के अंदर E = 0
हल किए गए उदाहरण
1. एक छड़ पर 5 × 10¹⁰ अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन आ गए। उसका आवेश कितना है?
q = ne = 5 × 10¹⁰ × 1.6 × 10⁻¹⁹ C = 8 × 10⁻⁹ C = 8 nC, ऋण। यानी q = −8 nC।
2. दो एक जैसे धातु गोलों पर +10 μC और −4 μC है। उन्हें छुआकर अलग किया। हर एक पर आवेश?
कुल = +10 + (−4) = +6 μC। एक जैसे गोले बराबर बाँटते हैं: हर एक पर +3 μC।
3. 10 cm त्रिज्या का गोला (q = 12 nC) लंबे पतले तार से 5 cm के अनावेशित गोले से जोड़ा गया। अंतिम आवेश?
q₁/q₂ = r₁/r₂ = 10/5 = 2 और q₁ + q₂ = 12 nC। इसलिए q₁ = 8 nC, q₂ = 4 nC।
4. पिछले उदाहरण में साझा विभव निकालो।
V = kq₁/r₁ = 9 × 10⁹ × 8 × 10⁻⁹ / 0.10 = 720 V। जाँच: kq₂/r₂ = 9 × 10⁹ × 4 × 10⁻⁹ / 0.05 = 720 V। बराबर, जैसा होना चाहिए।
5. ऊपर के दोनों गोलों के पृष्ठ आवेश घनत्व की तुलना करो।
σ = q/(4πr²)। σ₁/σ₂ = (q₁/q₂)(r₂/r₁)² = 2 × (1/2)² = 1/2। छोटे गोले का पृष्ठ घनत्व दोगुना है, इसलिए उसकी सतह पर क्षेत्र भी दोगुना।
6. +20 nC की छड़ से एक उदासीन गोले को प्रेरण द्वारा आवेशित किया। गोले पर कौन-सा चिह्न आएगा, आवेश कहाँ से आया, और क्या छड़ का आवेश घटा?
गोला ऋण आवेशित होगा (छड़ से उल्टा)। + छड़ भू-संपर्क तार से पृथ्वी के इलेक्ट्रॉन ऊपर खींचती है; भू-संपर्क हटाने पर वे गोले पर फँस जाते हैं। छड़ ने गोले को छुआ नहीं, इसलिए उसका पूरा +20 nC बचा रहता है। गोला + पृथ्वी का कुल आवेश संरक्षित रहता है।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि प्रेरण आवेश बनाता है। वह सिर्फ़ पहले से मौजूद आवेश को अलग करता है; भू-संपर्क तक गोला उदासीन रहता है।
- भू-संपर्क से पहले छड़ हटा देना। इलेक्ट्रॉन लौट आते हैं और गोला उदासीन हो जाता है।
- यह कहना कि धातु में प्रोटॉन चलते हैं। सिर्फ़ इलेक्ट्रॉन चलते हैं; + भाग का मतलब है वहाँ इलेक्ट्रॉन कम हैं।
- मान लेना कि जुड़े गोले आवेश बराबर बाँटते हैं। वे विभव बराबर करते हैं; आवेश त्रिज्या के अनुपात में बँटता है।