मध्यकालीन कला की समय-रेखा और उद्देश्य
यूरोप में मध्य युग लगभग 500 से 1500 ई. तक है। मध्यकालीन कला की शैलियाँ:
- प्रारंभिक ईसाई: लगभग 300–600
- बाइज़ेंटाइन: लगभग 500–1453 (पूर्वी रोमन साम्राज्य)
- रोमनेस्क: लगभग 1000–1150
- गोथिक: लगभग 1140–1400 (कहीं-कहीं बाद तक)
ज़्यादातर कला चर्च के लिए बनी। कम लोग पढ़ पाते थे, इसलिए चित्र और मूर्तियाँ बाइबल की कहानियाँ सुनाती थीं। कलाकार अक्सर बेनाम कारीगर होते थे जो श्रेणियों (guilds) या मठों में काम करते। लक्ष्य पवित्र विचार दिखाना था, दुनिया की हूबहू नकल नहीं।
प्रारंभिक ईसाई और बाइज़ेंटाइन कला
प्रारंभिक ईसाई
प्रारंभिक ईसाइयों ने ज़मीन के नीचे की क़ब्रगाहों (कैटाकॉम्ब) में सरल प्रतीक बनाए: मछली, अच्छा चरवाहा। 313 ई. के बाद खुलकर पूजा की छूट मिली, तो उन्होंने बेसिलिका बनाई: लंबा हॉल, बीच में ऊँचा नेव, दोनों ओर नीचे गलियारे और वेदी के लिए अर्धगोल एप्स।
बाइज़ेंटाइन
- विशाल गुंबद, जैसे हागिया सोफ़िया (537)।
- मोज़ेक (पच्चीकारी): काँच और सोने के छोटे टुकड़ों से बने चित्र, जैसे इटली के रावेना में।
- आकृतियाँ लंबी, सपाट, सामने देखती, बड़ी आँखों वाली, सुनहरी पृष्ठभूमि पर जो स्वर्ग का प्रतीक है।
- आइकन: लकड़ी के पटल पर बने पवित्र चित्र।
रोमनेस्क कला और वास्तुकला
लगभग 1000 ई. के आसपास तीर्थ-मार्गों पर बहुत से चर्च बने (जैसे स्पेन के सैंटियागो दे कंपोस्टेला तक)।
- गोल मेहराब और ढोलाकार छत (barrel vault, सुरंग जैसी पत्थर की छत)।
- बहुत मोटी दीवारें और छोटी खिड़कियाँ, इसलिए अंदर धुंधलापन।
- भारी स्तंभ और मीनारें; चर्च क़िले जैसा दिखता है।
- दरवाज़े के ऊपर टिम्पेनम की मूर्तिकला (अक्सर अंतिम न्याय) और खंभों के नक़्क़ाशीदार शीर्ष।
- अंदर भित्ति-चित्र (फ्रेस्को)।
मोटी दीवारें क्यों? पत्थर का गोल मेहराब बाहर की ओर धकेलता है (क्षैतिज दाब, thrust)। मोटी दीवार इस धक्के को रोकती है।
गोथिक कला और वास्तुकला
गोथिक लगभग 1140 में पेरिस के पास सेंट-डेनिस मठ से शुरू हुआ। लक्ष्य: ऊँचाई और रोशनी, स्वर्ग की छवि के रूप में।
- नुकीला मेहराब: भार को ज़्यादा नीचे भेजता है, ऊँचा बन सकता है।
- पसलीदार छत (ribbed vault): पत्थर की पसलियाँ छत का भार उठाती हैं, बीच के हिस्से पतले रह सकते हैं।
- उड़ता पुश्ता (flying buttress): बाहर का आधा मेहराब जो बगल का धक्का पकड़ता है।
नतीजा: पतली, ऊँची दीवारें जिनमें बड़ी रंगीन काँच की खिड़कियाँ और गोल गुलाब खिड़कियाँ हैं। प्रसिद्ध उदाहरण: शार्त्र, नोत्र-दाम (पेरिस), रैम्स, कोलोन, मिलान।
गोथिक मूर्तिकला (शार्त्र के स्तंभ-मूर्तियाँ) ज़्यादा स्वाभाविक होती गई। शहर सबसे ऊँचा गिरजाघर बनाने की होड़ करते थे; एक को बनने में 100 साल से ज़्यादा लग सकते थे।
पांडुलिपियाँ, रंगीन काँच और पुनर्जागरण की ओर
सचित्र पांडुलिपियाँ: चर्मपत्र पर हाथ से लिखी किताबें, सोने और रंगों से सजी, बड़े सजे पहले अक्षर और किनारे। उदाहरण: बुक ऑफ़ केल्स (आयरलैंड, लगभग 800), त्रे रिश औरे (फ़्रांस, लगभग 1415)।
रंगीन काँच: सीसे की पट्टियों से जुड़े रंगीन काँच के टुकड़े, जिन पर बारीक चित्र भी बनाए जाते।
उत्तर गोथिक चित्रकला: जॉटो (पादुआ, लगभग 1305) ने आकृतियों में वज़न, भाव और गहराई दिखाई। यथार्थ की ओर यह क़दम पुनर्जागरण तक ले गया।
इसी दौर में इस्लामी कला (ज्यामितीय नमूने, अलहम्ब्रा) और भारतीय मंदिर मूर्तिकला भी फली-फूली; अलग क्षेत्रों के कलाकार विचारों का लेन-देन करते थे।
करके देखो
कार्ड की दो पट्टियाँ काटो। एक को गोल मेहराब और दूसरी को उतनी ही चौड़ाई के नुकीले मेहराब में मोड़ो। मेज़ पर खड़ा करके ऊपर हल्का दबाओ। किसके पैर ज़्यादा फैलते हैं? यही फैलाव क्षैतिज दाब (thrust) है, और इसी से गोथिक दीवारें पतली हो सकीं। फिर 3D का स्लाइडर चलाओ।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- बेसिलिका: नेव, गलियारे और एप्स वाला लंबा हॉल
- मोज़ेक: काँच/पत्थर के छोटे टुकड़ों से बना चित्र
- रोमनेस्क = गोल मेहराब + ढोलाकार छत + मोटी दीवार + छोटी खिड़की
- गोथिक = नुकीला मेहराब + पसलीदार छत + उड़ता पुश्ता + रंगीन काँच
- क्षैतिज दाब (thrust): मेहराब का बगल का धक्का; पुश्ते उसे रोकते हैं
- टिम्पेनम: चर्च के दरवाज़े के ऊपर नक़्क़ाशीदार अर्धवृत्त
- सचित्र पांडुलिपि: सोने और रंगों से सजी हाथ से लिखी किताब
हल किए गए उदाहरण
1. एक चर्च में गोल मेहराब, 2 मीटर मोटी दीवारें और छोटी खिड़कियाँ हैं। शैली बताओ और दीवारें समझाओ।
रोमनेस्क। गोल मेहराब और पत्थर की ढोलाकार छत बाहर की ओर ज़ोर से धकेलते हैं, इसलिए दीवारें मोटी बनाई गईं और उन्हें कमज़ोर न करने के लिए खिड़कियाँ छोटी रखी गईं।
2. तीनों गोथिक आविष्कार मिलकर बड़ी खिड़कियाँ कैसे संभव करते हैं?
नुकीला मेहराब ज़्यादा भार नीचे भेजता है; पसलीदार छत छत का भार कुछ बिंदुओं पर इकट्ठा करती है; बाहर के उड़ते पुश्ते बचा हुआ बगल का धक्का ज़मीन तक ले जाते हैं। इन बिंदुओं के बीच की दीवार पर कम भार रहता है, इसलिए उसमें काँच भरा जा सकता है।
3. बाइज़ेंटाइन मोज़ेक की आकृति और जॉटो की उत्तर गोथिक पेंटिंग की तुलना करो।
बाइज़ेंटाइन: सपाट, सामने देखती, सुनहरी पृष्ठभूमि, प्रतीकात्मक और कालातीत। जॉटो: आकृतियों में वज़न और छाया, असली भाव, गहराई वाली जगह में। कला प्रतीक से यथार्थ की ओर बढ़ती है।
आम गलतियाँ
- रोमनेस्क और गोथिक को मिलाना: गोल मेहराब = रोमनेस्क, नुकीला मेहराब = गोथिक।
- उड़ते पुश्तों को सिर्फ़ सजावट समझना। वे दीवारों को धक्के से बचाते हैं।
- यह सोचना कि मध्यकालीन कलाकार यथार्थ चित्र नहीं बना सकते थे। सपाट शैली पवित्र, कालातीत विचार दिखाने के लिए चुनी गई थी।
- यह सोचना कि 'गोथिक' नाम निर्माताओं ने दिया। यह बाद में पुनर्जागरण लेखकों का दिया ताना था।