देनदार, उधार की शर्तें और बिक्री छूट
देनदार (प्राप्य खाता) वह पैसा है जो ग्राहकों पर उधार बिक्री के कारण बकाया है। यह चालू परिसंपत्ति है।
बिक्री की शर्तें बताती हैं कब चुकाना है:
- नकद / COD: अभी या डिलीवरी पर।
- n/30: पूरी रक़म 30 दिन में।
- 2/10, n/30: 10 दिन में चुकाओ तो 2% छूट; वरना 30 दिन में पूरी रक़म।
- EOM: महीने के अंत तक।
प्रविष्टियाँ (विक्रेता):
- उधार बिक्री: Dr देनदार, Cr बिक्री।
- छूट-अवधि में भुगतान: Dr नकद, Dr बिक्री छूट, Cr देनदार।
- बाद में भुगतान: Dr नकद, Cr देनदार (पूरी रक़म)।
- माल वापसी: Dr बिक्री वापसी, Cr देनदार।
बिक्री में से छूट और वापसी घटाकर शुद्ध बिक्री मिलती है। (GST/VAT हो तो छूट आमतौर पर कर से पहले की क़ीमत पर।)
उप-खाताबही और नियंत्रण खाता
मुख्य खाताबही में एक देनदार नियंत्रण खाता होता है। हर ग्राहक का ब्योरा देनदार उप-खाताबही (ग्राहक खाताबही) में, हर एक का अलग पन्ना। ऐसे ही लेनदार उप-खाताबही में हर सप्लायर का पन्ना।
हर उधार बिक्री या वसूली दो जगह जाती है: ग्राहक के पन्ने पर और (कुल के रूप में) नियंत्रण खाते में। महीने के अंत में सब ग्राहकों के शेष की सूची बनाओ; उसका जोड़ नियंत्रण खाते के बराबर होना चाहिए। नहीं तो कुछ छूटा या ग़लत गया।
लेनदारों की जानकारी सही और ताज़ा क्यों? समय पर भुगतान और छूट पाने को, विलंब शुल्क से बचने को, एक बिल दो बार न चुकाने को, नकद की योजना को, अच्छी साख के लिए और सप्लायरों के सवालों का जल्दी जवाब देने को। लेखा सॉफ़्टवेयर दोनों जगह अपने-आप पोस्ट करता है और “एज्ड पेयेबल्स” रिपोर्ट दिखाता है।
डूबत ऋण: न वसूल होने वाली रक़म का अनुमान
कुछ ग्राहक कभी नहीं चुकाते। प्रावधान विधि में (मिलान सिद्धांत के अनुसार) नुक़सान का अनुमान बिक्री वाली अवधि में ही लगाते हैं:
- बिक्री का प्रतिशत: जैसे उधार बिक्री का 1% डूबत ऋण ख़र्च।
- देनदारों का प्रतिशत / आयु-विश्लेषण (एजिंग): शेषों को इस हिसाब से बाँटो कि कितने दिन से बकाया हैं (0–30, 31–60, 61–90, 90 से ज़्यादा) और पुराने समूह पर बड़ा % लगाओ। जोड़ = प्रावधान का ज़रूरी शेष।
प्रविष्टि: Dr डूबत ऋण ख़र्च, Cr संदिग्ध ऋण प्रावधान। तुलन-पत्र में: देनदार − प्रावधान = शुद्ध वसूली योग्य मूल्य।
जब पता चले कि कोई ख़ास ग्राहक नहीं देगा: बट्टे खाते डालना: Dr प्रावधान, Cr देनदार। शुद्ध मूल्य नहीं बदलता। ग्राहक बाद में दे दे तो पहले राइट-ऑफ़ उलटो, फिर नकद दर्ज करो। (प्रत्यक्ष राइट-ऑफ़ विधि में डूबने पर सीधे ख़र्च डेबिट होता है; सरल है पर मिलान सिद्धांत टूटता है।)
प्राप्य विपत्र, लेनदार और क्रय छूट
प्राप्य विपत्र (नोट रिसीवेबल) ग्राहक का लिखित वादा है कि तय तारीख़ को तय रक़म, आमतौर पर ब्याज सहित, देगा। ब्याज = मूलधन × दर × समय (समय सालों में)। नोट मिलने पर: Dr प्राप्य विपत्र, Cr देनदार। परिपक्वता पर: Dr नकद, Cr प्राप्य विपत्र, Cr ब्याज आय। ग्राहक न दे (अनादृत नोट) तो रक़म और ब्याज वापस देनदार में डालो।
लेनदार (ख़रीदार की तरफ़):
- उधार ख़रीद: Dr क्रय (या स्टॉक), Cr लेनदार।
- छूट-अवधि में भुगतान: Dr लेनदार, Cr नकद, Cr क्रय छूट (सतत प्रणाली में स्टॉक)।
- सप्लायर को वापसी: Dr लेनदार, Cr क्रय वापसी।
20 दिन पहले चुकाने पर 2% छूट, साल भर के हिसाब से लगभग 36% कमाने जैसा है, इसलिए व्यवसाय इसे लेने की पूरी कोशिश करते हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- छूट = बिल की रक़म × छूट % (सिर्फ़ छूट-अवधि में भुगतान पर)
- मिला नकद = बिल − छूट
- शुद्ध वसूली योग्य मूल्य = देनदार − संदिग्ध ऋण प्रावधान
- विपत्र पर ब्याज = मूलधन × वार्षिक दर × समय (साल)
- परिपक्वता मूल्य = मूलधन + ब्याज
हल किए गए उदाहरण
1. 10,000 का माल 2/10, n/30 पर बेचा। बिक्री की प्रविष्टि लिखो।
Dr देनदार 10,000; Cr बिक्री 10,000।
2. ग्राहक ने 8वें दिन चुकाया। प्रविष्टि लिखो।
छूट = 2% × 10,000 = 200। Dr नकद 9,800; Dr बिक्री छूट 200; Cr देनदार 10,000।
3. ग्राहक पन्ने: आशा 20,000, बेन 18,000, चेन 12,000। नियंत्रण खाता 51,000 दिखाता है। क्या निष्कर्ष?
उप-खाताबही का जोड़ 50,000, नियंत्रण खाते से 1,000 कम। कोई पोस्टिंग छूटी या ग़लत है; महीने की प्रविष्टियाँ जाँचो।
4. देनदार 50,000। अनुमान: 4% नहीं मिलेगा। प्रावधान का शेष शून्य है। समायोजन लिखो और शुद्ध वसूली योग्य मूल्य निकालो।
Dr डूबत ऋण ख़र्च 2,000; Cr प्रावधान 2,000। शुद्ध मूल्य = 50,000 − 2,000 = 48,000।
5. 6,000 का, 8%, 3 महीने का प्राप्य विपत्र परिपक्वता पर वसूल हुआ। ब्याज और प्रविष्टि?
ब्याज = 6,000 × 0.08 × 3/12 = 120। Dr नकद 6,120; Cr प्राप्य विपत्र 6,000; Cr ब्याज आय 120।
6. 5,000 का माल 2/10, n/30 पर ख़रीदा और 7वें दिन चुकाया (आवधिक प्रणाली)। दोनों प्रविष्टियाँ?
ख़रीद: Dr क्रय 5,000; Cr लेनदार 5,000। भुगतान: Dr लेनदार 5,000; Cr नकद 4,900; Cr क्रय छूट 100।
आम गलतियाँ
- छूट-अवधि के बाद छूट लेना। 2/10, n/30 में 25वें दिन पूरी रक़म देनी है।
- प्रावधान विधि में बट्टे खाते की रक़म को ख़र्च में डालना। राइट-ऑफ़ प्रावधान के सामने होता है; ख़र्च अनुमान के समय दर्ज हो चुका।
- नियंत्रण खाते के साथ ग्राहक के उप-खाताबही पन्ने पर पोस्ट करना भूलना।
- कुछ महीनों के विपत्र पर पूरे साल का ब्याज लगाना।