South 고등학교 1학년 Common Mathematics 1
अध्याय: 4
1. Polynomials
Operations on polynomials · Identities and remainder theorem · Factorising polynomials
- बहुपद: शून्यक और गुणांक – ax² + bx + c जैसे बहुपद की एक घात (सबसे बड़ी घात) होती है। शून्यक x का वह मान है जिस पर बहुपद 0 हो जाए। ग्राफ पर शून्यक वे x-निर्देशांक हैं जहाँ वक्र y = p(x), x-अक्ष से मिलता है। घात n वाले बहुपद के अधिक से अधिक n शून्यक होते हैं। ax² + bx + c के शून्यक α, β हों तो α + β = −b/a और αβ = c/a.
- शेषफल प्रमेय और गुणनखंड प्रमेय – जब बहुपद p(x) को (x − a) से भाग देते हैं, तो शेषफल p(a) होता है। यानी लंबा भाग किए बिना, बस x = a रखो। अगर p(a) = 0 है, तो शेषफल 0 है और (x − a), p(x) का गुणनखंड है। इसे गुणनखंड प्रमेय कहते हैं।
2. Equations and inequalities
Complex numbers · Real and imaginary roots; discriminant · Roots and coefficients · Quadratic equations and functions · Parabola and line positions · Max and min of quadratics · Cubic and quartic equations · Simultaneous quadratic equations · Simultaneous linear inequalities · Absolute-value inequalities · Quadratic inequalities
- सम्मिश्र संख्याएँ और द्विघातीय समीकरण – x² + 1 = 0 जैसे समीकरण का कोई वास्तविक हल नहीं है, क्योंकि किसी वास्तविक संख्या का वर्ग ऋणात्मक नहीं होता। इसलिए एक नई संख्या i ली गई, जिसमें i² = −1। सम्मिश्र संख्या z = a + ib है: a वास्तविक भाग और b काल्पनिक भाग। जोड़, घटाव, गुणा साधारण बीजगणित जैसे होते हैं, बस i² की जगह −1 लिखें। भाग के लिए ऊपर-नीचे हर के संयुग्मी से गुणा करें। आर्गंड तल पर a + ib बिंदु (a, b) है। संयुग्मी a − ib वास्तविक अक्ष में उसका दर्पण प्रतिबिंब है और मापांक √(a² + b²) मूल बिंदु से दूरी है। जब D = b² − 4ac < 0 हो, तो द्विघात समीकरण के दोनों मूल सम्मिश्र और एक-दूसरे के संयुग्मी होते हैं।
- द्विघात समीकरण – जिस समीकरण में x की सबसे बड़ी घात 2 हो, वह द्विघात समीकरण है: ax² + bx + c = 0, जहाँ a ≠ 0। इसके ज़्यादा से ज़्यादा दो मूल होते हैं। मूल निकालने के दो तरीक़े: गुणनखंड (मध्य पद को तोड़कर) या सूत्र x = (−b ± √(b² − 4ac)) / 2a। विविक्तकर D = b² − 4ac बताता है: D > 0 तो दो अलग वास्तविक मूल, D = 0 तो दो बराबर मूल, D < 0 तो कोई वास्तविक मूल नहीं।
- द्विघात फलन और उनके ग्राफ़ – द्विघात फलन (quadratic function) y = ax² + bx + c है, जहाँ a ≠ 0। इसका ग्राफ़ U-आकार का वक्र होता है जिसे परवलय (parabola) कहते हैं। a > 0 हो तो वक्र ऊपर खुलता है और उसका एक सबसे निचला बिंदु होता है; a < 0 हो तो नीचे खुलता है और सबसे ऊँचा बिंदु होता है। यह मोड़ बिंदु शीर्ष (vertex) है, x = −b/2a पर। शीर्ष रूप y = a(x − h)² + k में शीर्ष (h, k) है।
- बहुपद और परिमेय समीकरण हल करना – बहुपद समीकरण p(x) = 0 हल करने का मतलब है: y = p(x) का वक्र x-अक्ष से कहाँ मिलता है। त्रिघात या चतुर्घात में: अचर पद के भाजकों से एक मूल अनुमान लगाओ, उससे भाग दो, फिर बचा हुआ हल करो। x⁴ − 5x² + 4 = 0 जैसे द्विवर्गी समीकरण t = x² से द्विघात बन जाते हैं। परिमेय समीकरण P(x)/Q(x) = 0 में P(x) = 0 और Q(x) ≠ 0 चाहिए। असमिकाओं के लिए चिह्न सारणी।
- युगपत समीकरण – युगपत समीकरण वे दो या ज़्यादा समीकरण हैं जो एक ही समय पर सही होने चाहिए। उनका हल वे मान हैं जो हर समीकरण में ठीक बैठें। ग्राफ़ पर हर हल वह बिंदु है जहाँ ग्राफ़ मिलते हैं। एक रेखा और एक वक्र हो तो रेखा को वक्र में रखें (प्रतिस्थापन); द्विघात समीकरण बनेगा, जिसका विविक्तकर बताएगा कि 2, 1 या 0 हल हैं। तीन रैखिक समीकरणों में एक-एक करके चर हटाएँ।
- एक चर वाली रैखिक असमिकाएँ – असमिका दो व्यंजकों की तुलना <, >, ≤ या ≥ से करती है। एक चर की रैखिक असमिका ax + b < c जैसी होती है। इसका हल आम तौर पर एक संख्या नहीं, बल्कि संख्याओं की पूरी श्रेणी होता है। इसे समीकरण की तरह हल करते हैं: दोनों ओर एक ही संख्या जोड़-घटा सकते हैं, और एक ही धनात्मक संख्या से गुणा-भाग कर सकते हैं। ऋणात्मक संख्या से गुणा या भाग करने पर चिह्न उलट जाता है। हल को संख्या रेखा पर दिखाते हैं: < या > के लिए खोखला गोला (सिरा शामिल नहीं), ≤ या ≥ के लिए भरा गोला (सिरा शामिल), और छायांकित भाग सारे हल दिखाता है। −1 ≤ x < 3 जैसी दोहरी असमिका रेखा का एक टुकड़ा देती है। यदि x प्राकृत या पूर्णांक हो, तो केवल उस श्रेणी की पूर्ण संख्याएँ हल हैं।
- द्विघात असमिकाएँ – द्विघात असमिका पूछती है कि ax² + bx + c कहाँ शून्य से ऊपर (> 0) या नीचे (< 0) है। मूल निकालें, परवलय की कल्पना करें और ग्राफ़ से उत्तर पढ़ें। a > 0 हो तो वक्र मूलों के बीच शून्य से नीचे और बाहर शून्य से ऊपर होता है। वास्तविक मूल न हों (D < 0) तो वक्र हमेशा x-अक्ष के एक ही ओर रहता है।
3. Counting
Sum and product rules · Permutations · Combinations
- क्रमचय और संचय – इस अध्याय का मूल है: बिना सूची बनाए गिनना। गणना का मूल सिद्धांत कहता है: यदि एक काम m तरीकों से और उसके बाद दूसरा n तरीकों से हो सकता है, तो दोनों मिलकर m × n तरीकों से होते हैं। n! (n क्रमगुणित) = 1 × 2 × … × n, और 0! = 1। क्रमचय एक व्यवस्था है, जिसमें क्रम मायने रखता है: n भिन्न वस्तुओं में से r को व्यवस्थित करने के तरीके ⁿPᵣ = n!/(n − r)!। संचय एक चयन है, जिसमें क्रम मायने नहीं रखता: ⁿCᵣ = n!/(r!(n − r)!)। हर चयन को r! तरीकों से सजा सकते हैं, इसलिए ⁿPᵣ = ⁿCᵣ × r!। उपयोगी तथ्य: ⁿCᵣ = ⁿCₙ₋ᵣ और ⁿCᵣ + ⁿCᵣ₋₁ = ⁿ⁺¹Cᵣ। कुछ वस्तुएँ समान हों तो हर दोहराव की संख्या के क्रमगुणित से भाग दें।
4. Matrices
What a matrix is · Matrix operations
- आव्यूह (Matrices): कोटि, प्रकार, परिवर्त, संक्रियाएँ और व्युत्क्रम – आव्यूह संख्याओं का एक डिब्बा है जिसमें संख्याएँ पंक्तियों और स्तंभों में रखी होती हैं। इसकी कोटि = पंक्तियाँ × स्तंभ। शून्य, तत्समक, विकर्ण, अदिश, पंक्ति, स्तंभ और वर्ग आव्यूह इसके खास प्रकार हैं। परिवर्त में पंक्तियाँ स्तंभ बन जाती हैं। Aᵀ = A हो तो सममित, Aᵀ = −A हो तो विषम-सममित। योग जगह-जगह करते हैं, गुणन पंक्ति × स्तंभ से। आव्यूह गुणन क्रमविनिमेय नहीं है (AB प्रायः BA नहीं)। यदि AB = BA = I हो तो B, A का व्युत्क्रम है और वह एक ही (अद्वितीय) होता है।