समाजशास्त्र में अवधारणाएँ और प्रतिमान
अवधारणा (concept) साफ़ अर्थ वाला मुख्य विचार है, जैसे भूमिका, मानदंड, प्रस्थिति या शक्ति। प्रतिमान (paradigm) या परिप्रेक्ष्य, समाज को देखने के जुड़े हुए विचारों और सवालों का पूरा समूह है।
संरचना और क्रिया
संरचनात्मक (मैक्रो) सिद्धांत पूरे समाज को और वह लोगों को कैसे ढालता है, यह देखते हैं। क्रिया (माइक्रो) सिद्धांत देखते हैं कि लोग रोज़ के अर्थों से समाज कैसे बनाते हैं। गिडेंस का संरचनाकरण (structuration) सिद्धांत कहता है दोनों ज़रूरी हैं।
सहमति और संघर्ष
- प्रकार्यवाद (दुर्खाइम, पार्सन्स, मर्टन): समाज शरीर जैसा; संस्थाएँ ज़रूरतें पूरी करती हैं; साझा मानदंड और मूल्य व्यवस्था बनाते हैं।
- मार्क्सवाद: समाज वर्गों में बँटा; शासक वर्ग उत्पादन के साधनों का मालिक है और अपने विचार (विचारधारा) फैलाता है।
- नारीवाद: समाज पितृसत्तात्मक है। उदार नारीवादी कानून से बराबर अधिकार चाहती हैं, उग्र (रेडिकल) नारीवादी पितृसत्ता को ही दोष देती हैं, मार्क्सवादी नारीवादी महिलाओं के शोषण को पूँजीवाद से जोड़ती हैं।
- अंतःक्रियावाद (मीड, बेकर): लोग अर्थों के आधार पर काम करते हैं; ठप्पे पहचान बनाते हैं।
- उत्तर-आधुनिकतावाद: आज का समाज इतना विविध है कि एक बड़ा सिद्धांत काफ़ी नहीं।
समाजीकरण पर अलग-अलग प्रतिमान
समाजीकरण यानी किसी समूह के मानदंड और मूल्य सीखना। हर प्रतिमान इसे अलग समझाता है:
- प्रकार्यवाद: परिवार और स्कूल साझा मूल्य देते हैं और बड़ों की भूमिकाओं के लिए तैयार करते हैं, जिससे समाज स्थिर रहता है।
- मार्क्सवाद: समाजीकरण असमानता स्वीकार करना सिखाता है; छिपा पाठ्यक्रम आज्ञाकारी मज़दूर बनाता है।
- नारीवाद: लैंगिक समाजीकरण (खिलौने, कपड़े, घर के काम, मीडिया) लड़कियों और लड़कों को अलग भूमिकाएँ सिखाता है।
- अंतःक्रियावाद: पहचान बातचीत से बनती है; हम खुद को दूसरों की नज़र से देखते हैं (कूली का "दर्पण में आत्म") और ठप्पे सच हो सकते हैं।
सिद्धांत और शोध विधि: प्रत्यक्षवाद और व्याख्यावाद
प्रत्यक्षवाद (कॉम्ट, दुर्खाइम) कहता है समाज को प्रकृति की तरह पढ़ा जा सकता है। यह मात्रात्मक तरीकों से पैटर्न और कारण ढूँढता है: प्रश्नावली, संरचित साक्षात्कार, सरकारी आँकड़े, प्रयोग। ताक़त: विश्वसनीय (दूसरे दोहरा सकें)। कमज़ोरी: अर्थ छूट सकता है।
व्याख्यावाद (वेबर का फ़र्स्टेहेन, यानी सहानुभूति से समझना) कहता है लोग अपने कामों को अर्थ देते हैं, तो उनका नज़रिया समझना होगा। यह गुणात्मक तरीके लेता है: खुले साक्षात्कार, सहभागी अवलोकन, निजी दस्तावेज़। ताक़त: वैध (सच्ची तस्वीर)। कमज़ोरी: दोहराना मुश्किल, छोटे नमूने।
प्रकार्यवादी और कई मार्क्सवादी संरचनात्मक, प्रत्यक्षवादी शोध की ओर झुकते हैं; अंतःक्रियावादी व्याख्यावादी शोध की ओर। यथार्थवादी और कई आधुनिक शोधकर्ता मिश्रित तरीके (त्रिकोणीकरण) अपनाते हैं।
क्या समाजशास्त्र विज्ञान है? वस्तुनिष्ठता और मूल्य-मुक्ति
क्या यह वैज्ञानिक है?
- प्रत्यक्षवादी: हाँ, अगर अवलोकन, परीक्षण और प्रमाण का उपयोग हो।
- पॉपर: विज्ञान विचारों को मिथ्या साबित (falsify) करने की कोशिश करता है। एक काला हंस "सब हंस सफ़ेद" को ग़लत कर देता है। मार्क्सवाद की भविष्यवाणियाँ परखना कठिन है, इसलिए पॉपर ने उसे अवैज्ञानिक कहा।
- कुन: विज्ञान एक साझा प्रतिमान के अंदर काम करता है; समाजशास्त्र में कई प्रतिमान आपस में होड़ करते हैं, इसलिए वह "पूर्व-प्रतिमानी" है।
- यथार्थवादी (सेयर): कई प्राकृतिक विज्ञान (जैसे मौसम विज्ञान) भी खुली, अनिश्चित व्यवस्थाएँ पढ़ते हैं, तो समाजशास्त्र भी उसी तरह वैज्ञानिक हो सकता है।
क्या समाजशास्त्र मूल्य-मुक्त हो सकता है?
- शुरुआती प्रत्यक्षवादी: मूल्यों की कोई जगह नहीं।
- वेबर: मूल्य तय करते हैं कि आप कौन सा विषय चुनें और नतीजे कैसे पढ़ें, पर आँकड़े जुटाते समय तटस्थ रहें।
- गूल्डनर: पूरी मूल्य-मुक्ति एक मिथक है; समाजशास्त्री खुलकर बताएँ वे किसके पक्ष में हैं।
- नारीवादी और मार्क्सवादी कहते हैं शोध को शोषितों की मदद करनी चाहिए।
समाजशास्त्र और सामाजिक नीति
सामाजिक समस्याएँ वे बातें हैं जो लोगों को नुकसान पहुँचाती हैं (गरीबी, अपराध)। समाजशास्त्रीय समस्याएँ कोई भी पैटर्न हैं जिसे समाजशास्त्री समझाना चाहें, सामान्य बातें भी।
- प्रत्यक्षवादी (कॉम्ट): शोध से बेहतर नीति बननी चाहिए।
- प्रकार्यवादी: नीति व्यवस्था के एक हिस्से को धीरे-धीरे, कदम दर कदम ठीक करती है।
- मार्क्सवादी: नीति ज़्यादातर पूँजीवाद की सेवा करती है और गहरी असमानता को सिर्फ़ ढकती है।
- नारीवादी: दिखाती हैं कि काम, भत्ते और बच्चों की देखभाल की नीतियाँ महिलाओं पर कैसे असर डालती हैं; कुछ शोध से बराबर वेतन और घरेलू हिंसा पर कानून बने।
- न्यू राइट विचारक कम सरकारी मदद चाहते हैं, कहते हैं इससे निर्भरता बढ़ती है।
शोध लागू होगा या नहीं, यह पैसे, राजनीति, जनमत और सरकार के मूल्यों पर निर्भर है। उदाहरण: भूखे बच्चे कम सीखते हैं, ऐसे शोध ने कई देशों में मुफ़्त स्कूल भोजन योजनाओं को सहारा दिया, जिसमें भारत की मध्याह्न भोजन योजना भी है।
करके देखें
अपने स्कूल की कोई एक चीज़ चुनिए, जैसे यूनिफ़ॉर्म। हर चश्मे के लिए एक वाक्य लिखिए: प्रकार्यवादी, मार्क्सवादी, नारीवादी और अंतःक्रियावादी इसके बारे में क्या कहेंगे? फिर तय कीजिए: आप इसे सर्वेक्षण से पढ़ेंगे या साक्षात्कार से, और क्यों? आख़िरी 3D चरण के चश्मा-बटनों से अपने जवाब मिलाइए।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- प्रतिमान: समाज को देखने के जुड़े विचारों का समूह
- सहमति (प्रकार्यवाद) बनाम संघर्ष (मार्क्सवाद, नारीवाद)
- संरचना / मैक्रो बनाम क्रिया / माइक्रो (अंतःक्रियावाद)
- प्रत्यक्षवाद → मात्रात्मक तरीके → विश्वसनीयता
- व्याख्यावाद → गुणात्मक तरीके → वैधता
- मिथ्याकरण (पॉपर): विचारों को ग़लत साबित करने की कोशिश से परखना
- मूल्य-मुक्ति: शोध से अपने निजी मूल्य दूर रखना
- सामाजिक नीति: सामाजिक समस्याओं से निपटने की सरकारी योजनाएँ और कदम
हल किए गए उदाहरण
1. एक शोधकर्ता 10 000 बच्चों के राष्ट्रीय सर्वेक्षण से पता करता है कि गरीब परिवारों के बच्चे जल्दी स्कूल क्यों छोड़ते हैं। यह कौन सा दृष्टिकोण है और क्यों?
प्रत्यक्षवादी। यह बड़े मात्रात्मक सर्वेक्षण से गिने जा सकने वाले, दोहराए जा सकने वाले पैटर्न और कारण ढूँढता है, ताकि नतीजे विश्वसनीय हों।
2. दूसरा शोधकर्ता छह महीने एक कक्षा में रहकर "कमज़ोर" कहे गए बच्चों को देखता और उनसे बात करता है। कौन सा दृष्टिकोण और तरीका?
व्याख्यावादी, सहभागी अवलोकन के साथ। लक्ष्य है बच्चों के अपने अर्थ और ठप्पों का उन पर असर समझना; इससे वैध, गहरे आँकड़े मिलते हैं।
3. एक ही परीक्षा व्यवस्था को मार्क्सवादी और प्रकार्यवादी अलग-अलग कैसे देखेंगे?
प्रकार्यवादी कहेगा परीक्षा प्रतिभा के अनुसार बच्चों को सही कामों के लिए निष्पक्ष रूप से छाँटती है (योग्यतातंत्र), जिससे समाज चलता है। मार्क्सवादी कहेगा परीक्षा मध्यवर्गीय बच्चों के पक्ष में है और असमानता को निष्पक्ष दिखाती है, इसलिए मज़दूर वर्ग के बच्चे खुद को दोष देते हैं।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि सारे संघर्ष सिद्धांत मार्क्सवादी हैं। नारीवाद भी संघर्ष सिद्धांत है, पर वर्ग की जगह लिंग पर।
- विश्वसनीयता और वैधता में गड़बड़। विश्वसनीय = दोहराने पर वही नतीजा; वैध = सच्ची तस्वीर।
- यह कहना कि वेबर चाहते थे समाजशास्त्र में कोई मूल्य ही न हो। उन्होंने कहा मूल्य विषय चुनने में दिशा देते हैं, पर आँकड़े जुटाना तटस्थ हो।
- मान लेना कि हर शोध नीति बन जाता है। पैसा, राजनीति और जनमत तय करते हैं क्या लागू होगा।