दूर के संपर्क में मदद क्यों चाहिए
रेडियो तरंगें और माइक्रोवेव सीधी रेखा में चलती हैं। पृथ्वी गोल है, इसलिए एक टावर केवल सीमित दूरी तक "देख" पाता है। उसके आगे संकेत अंतरिक्ष में चला जाता है या ज़मीन उसे रोक देती है। दूर की जगहों को जोड़ने के लिए रिले या संकेत को राह दिखाने वाला रास्ता चाहिए।
उपग्रह संचार
संचार उपग्रह अंतरिक्ष में रिले स्टेशन है। ज़मीन का स्टेशन माइक्रोवेव की किरण ऊपर भेजता है (अपलिंक)। उपग्रह उसे प्रबल करके दूसरी आवृत्ति पर नीचे भेजता है (डाउनलिंक)। अलग आवृत्तियाँ इसलिए कि तेज़ जाने वाला संकेत कमज़ोर आने वाले संकेत को दबा न दे।
भूस्थिर उपग्रह भूमध्य रेखा के ऊपर लगभग 36 000 km की ऊँचाई पर घूमता है। उसे एक चक्कर में 24 घंटे लगते हैं, पृथ्वी जितना ही, इसलिए वह एक जगह के ऊपर टिका लगता है। एक स्थिर डिश उसकी ओर लगाई जा सकती है। उसका संकेत बहुत बड़े इलाक़े में पहुँचता है। क़ीमत है देरी: 36 000 km ऊपर और 36 000 km नीचे, यानी एक तरफ़ लगभग 0.24 s।
नीचे वाले उपग्रह (कुछ सौ km ऊपर) कम देरी देते हैं पर तेज़ चलते हैं, इसलिए बहुत से चाहिए।
ऑप्टिकल फ़ाइबर
ऑप्टिकल फ़ाइबर बाल जितना पतला काँच का धागा है, जिसके बीच में क्रोड (core) और बाहर आवरण (cladding) होता है। आवरण का काँच प्रकाश को क्रोड से थोड़ा ज़्यादा धीमा करता है। क्रोड में चलता प्रकाश दीवार से कम कोण पर टकराता है और हर बार वापस अंदर लौट जाता है। यह पूर्ण आंतरिक परावर्तन है: यह तब होता है जब प्रकाश सघन माध्यम से विरल माध्यम में क्रांतिक कोण से बड़े कोण पर पहुँचता है। इसलिए प्रकाश टेढ़ा-मेढ़ा चलता हुआ फ़ाइबर के मोड़ भी पार कर लेता है।
डेटा लेज़र या LED प्रकाश की बहुत तेज़ टिमटिमाहट के रूप में भेजा जाता है। फ़ाइबर में प्रकाश की हानि कम होती है, बिजली के शोर का असर नहीं होता और वह तांबे के तार से कहीं ज़्यादा डेटा ले जाता है। समुद्र के तल में फ़ाइबर केबल महासागर पार करते हैं। काँच में प्रकाश की चाल लगभग 2 × 108 m/s होती है।
उपग्रह या फ़ाइबर?
- उपग्रह: जहाज़, हवाई जहाज़ और दूर के पहाड़ों तक पहुँचता है, एक उपग्रह बड़ा इलाक़ा ढकता है, पर देरी ज़्यादा होती है और ख़राब मौसम संकेत कमज़ोर कर सकता है।
- फ़ाइबर: तेज़, बहुत ज़्यादा क्षमता, कम देरी, पर केबल जगह-जगह बिछाना पड़ता है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- समय = दूरी / चाल
- उपग्रह की देरी (एक तरफ़, भूस्थिर) = 2 × 36 000 km / (3 × 10^8 m/s) ≈ 0.24 s
- काँच में प्रकाश की चाल ≈ 2 × 10^8 m/s
- पूर्ण आंतरिक परावर्तन: प्रकाश सघन से विरल में, आपतन कोण > क्रांतिक कोण
हल किए गए उदाहरण
1. एक संकेत भूस्थिर उपग्रह तक 36 000 km ऊपर जाता है और 36 000 km नीचे आता है। कितना समय लगेगा?
दूरी = 72 000 km = 7.2 × 10^7 m। समय = 7.2 × 10^7 / (3 × 10^8) = 0.24 s।
2. फ़ाइबर केबल 6 000 km लंबा है। उसमें प्रकाश 2 × 10^8 m/s से चलता है। समय निकालिए।
दूरी = 6 × 10^6 m। समय = 6 × 10^6 / (2 × 10^8) = 0.03 s।
3. फ़ाइबर में आवरण क्यों ज़रूरी है?
आवरण क्रोड के चारों ओर हल्का (विरल) पदार्थ है। क्रोड का प्रकाश उससे पूर्ण परावर्तित होता है, इसलिए प्रकाश क्रोड में ही रहता है।
4. उपग्रह डाउनलिंक की आवृत्ति अपलिंक से अलग क्यों रखता है?
उपग्रह तेज़ किरण भेजता है और कमज़ोर किरण पाता है। अलग आवृत्तियाँ तेज़ किरण को कमज़ोर किरण दबाने से रोकती हैं।
आम गलतियाँ
- कहना कि उपग्रह संकेत को आईने की तरह "लौटाता" है। उपग्रह उसे लेता है, प्रबल करता है और दोबारा भेजता है।
- सोचना कि फ़ाइबर में प्रकाश सीधा जाता है। वह पूर्ण आंतरिक परावर्तन से टेढ़ा-मेढ़ा चलता है।
- भूलना कि संकेत ऊपर और नीचे दोनों जाता है: दूरी दुगुनी लेनी है।
- क्रोड और आवरण में गड़बड़ करना। क्रोड बीच में है; आवरण बाहर की परत है।