लघु चित्र क्या है?
लघु चित्र एक छोटा, बहुत बारीक चित्र है, आमतौर पर काग़ज़ पर। ज़्यादातर किताब के पन्ने जितने या उससे छोटे होते हैं। ये पांडुलिपियों (हाथ से लिखी किताबों) और एल्बमों (मुरक़्क़ा) के लिए बनते थे और दीवार पर टाँगने के बजाय कुछ लोग पास से देखते थे।
सामग्री और विधि
- सतह: पहले ताड़पत्र; बाद में हाथ का बना काग़ज़, कई परतें चिपकाकर बना कड़ा कार्ड जिसे वसली कहते हैं।
- रंग: खनिजों और पौधों से पीसे गए: लाजवर्द (नीला), गेरू और सिंदूर (लाल), पीली मिट्टी, मैलाकाइट (हरा), खड़िया या सफ़ेदा, काजल (काला)। असली सोना-चाँदी भी लगाया जाता था।
- ब्रश: गिलहरी के बालों के बहुत बारीक ब्रश।
- परतें: रेखांकन → पतला सफ़ेद आधार → सपाट रंग → घिसाई (बर्निशिंग), यानी पीछे से चिकने पत्थर से रगड़ना ताकि रंग चमकें → बारीक रेखाएँ, नमूने और सोना।
- मिलकर काम: बड़ी कार्यशालाओं में एक कलाकार रेखांकन करता, दूसरा रंग भरता और उस्ताद चेहरे बनाता।
भारतीय लघु चित्रकला की मुख्य शैलियाँ
- पाल (पूर्वी भारत, 11वीं–12वीं सदी): ताड़पत्रों पर बौद्ध ग्रंथ, कोमल घुमावदार रेखाएँ।
- पश्चिम भारतीय / जैन (12वीं–16वीं सदी): कल्पसूत्र जैसे जैन ग्रंथ, सपाट लाल पृष्ठभूमि, नुकीले चेहरे जिनमें दूर वाली आँख बाहर निकली दिखती है।
- मुग़ल (16वीं–19वीं सदी): फ़ारसी और भारतीय मेल, यथार्थ, व्यक्ति-चित्र, इतिहास और प्रकृति के अध्ययन।
- राजस्थानी या राजपूत (16वीं–19वीं सदी): चटक रंग, कृष्ण, रागमाला और दरबारी जीवन।
- पहाड़ी (17वीं–19वीं सदी): पहाड़ी दरबार; बसोहली (चटक) और कांगड़ा (कोमल, काव्यमय)।
- दक्कनी (16वीं–19वीं सदी): बीजापुर, गोलकुंडा, अहमदनगर, हैदराबाद; गहरे रंग और सोना।
इस साइट पर हर शैली का अलग पाठ है।
राजस्थानी शैली: उत्पत्ति और विशेषताएँ
राजस्थानी शैली लगभग 16वीं सदी से राजपूत राजाओं के दरबारों में बढ़ी। यह पुरानी स्थानीय और पश्चिम भारतीय चित्रकला से निकली और बाद में मुग़ल कला से कुछ बातें लीं, पर अपनी आत्मा बनाए रखी।
मुख्य विशेषताएँ
- चटक, सपाट रंग: लाल, पीला, हरा, गहरा नीला; अक्सर एक ही तेज़ रंग की पृष्ठभूमि।
- विषय: कृष्ण और राधा (भागवत पुराण और गीत गोविंद से), रागमाला (संगीत के रागों के चित्र), बारहमासा (12 महीने), रामायण, राजा, शिकार और त्योहार।
- चेहरे: ज़्यादातर एक ओर से (सवाचश्म/प्रोफ़ाइल), बड़ी भावपूर्ण आँखें।
- भाव वाली प्रकृति: बादल, बिजली, मोर और पेड़ कहानी का मूड दिखाते हैं।
राजस्थानी उपशैलियाँ और प्रसिद्ध चित्र
- मेवाड़ (उदयपुर): सबसे पुराना केंद्र, चटक लाल-पीला, सरल मज़बूत आकृतियाँ। साहिबदीन की रागमाला का चित्र मारू रागिनी (लगभग 1628) ऊँट पर सवार राजकुमार-राजकुमारी दिखाता है।
- बूँदी और कोटा: घने हरे जंगल, झीलें, चमकता आकाश; कोटा शिकार के दृश्यों के लिए प्रसिद्ध। दौड़ते घोड़े पर राजा अनिरुद्ध सिंह हाड़ा का चित्र बूँदी का जाना-माना चित्र है।
- किशनगढ़: लंबी, सुंदर आकृतियाँ, कमल-पंखुड़ी जैसी लंबी आँखें, नुकीली नाक और ठोड़ी। कवि-राजा सावंत सिंह के समय निहालचंद की राधा (बणी-ठणी) (18वीं सदी के मध्य) सबसे प्रसिद्ध है।
- मारवाड़ (जोधपुर): गहरा पीला, बड़ी मूँछों वाले पुरुष, घोड़े और दरबार, जैसे दलचंद का चौगान खिलाड़ी (पोलो खेलती स्त्रियाँ)।
- बीकानेर: मुग़ल और दक्कनी काम के पास बारीक, नाज़ुक रेखांकन, मुग़ल कार्यशालाओं से आए कलाकारों का; नूरुद्दीन का झूले पर कृष्ण।
- जयपुर (आमेर): बड़े व्यक्ति-चित्र, बहुत सोना और सजावट; गुमान का चित्रकूट में भरत का राम से मिलन।
करके देखिए
काग़ज़ मोड़कर 10 × 15 सेमी का छोटा कार्ड बनाइए। एक सपाट पृष्ठभूमि रंग, बड़ी आँख वाला एक ओर से दिखता चेहरा और सुनहरी (पीली) किनारी बनाइए। फिर पीछे से चिकने चम्मच से हल्के-हल्के रगड़कर रंग की चमक देखिए।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- मुख्य शब्द: लघु चित्र = किताबों और एल्बम के लिए छोटा बारीक चित्र
- वसली = चिपके काग़ज़ का कार्ड; घिसाई (बर्निशिंग) = पत्थर से रंग चमकाना
- रागमाला = संगीत के रागों के चित्र; बारहमासा = 12 महीनों के चित्र
- राजस्थानी केंद्र: मेवाड़, बूँदी–कोटा, किशनगढ़, मारवाड़ (जोधपुर), बीकानेर, जयपुर
हल किए गए उदाहरण
1. एक चित्र में बहुत लंबी, धनुषाकार आँखों और नुकीली नाक वाली लंबी स्त्री है। यह किस राजस्थानी केंद्र का होगा?
किशनगढ़। लंबी धनुषाकार आँखें और लंबी, सुंदर आकृतियाँ इसकी पहचान हैं, जैसे निहालचंद की बणी-ठणी में।
2. लघु चित्र इतने छोटे क्यों बनाए जाते थे?
ये हाथ में पकड़ी जाने वाली किताबों और एल्बम के लिए थे, जिन्हें कुछ लोग पास से देखते थे, इसलिए छोटी जगह में बारीकी दिखाई जा सकती थी।
3. लघु चित्र में काम का क्रम बताइए।
रेखांकन → पतला सफ़ेद आधार → सपाट रंग → पत्थर से घिसाई → बारीक रेखाएँ, नमूने और सोना।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि लघु चित्र दीवार चित्र थे। ये किताबों और एल्बम के लिए बनते थे।
- राजस्थानी और पहाड़ी को एक समझना। राजस्थानी मैदानी राजपूत दरबारों की है; पहाड़ी हिमालय की तलहटी के पहाड़ी दरबारों की।
- यह सोचना कि रंग ट्यूब में खरीदे जाते थे। इन्हें पत्थरों, मिट्टी और पौधों से हाथ से पीसा जाता था।
- बणी-ठणी को मेवाड़ का चित्र बताना। यह किशनगढ़ का है, निहालचंद का।