मुग़ल शैली की उत्पत्ति
मुग़ल बादशाहों को किताबें और चित्र बहुत पसंद थे। बाबर (शासन 1526–1530) ने अपनी आत्मकथा बाबरनामा लिखी। हुमायूँ फ़ारस (ईरान) में चित्रकार मीर सैयद अली और अब्दुस्समद से मिला और उन्हें भारत ले आया। उन्होंने भारतीय कलाकारों को सिखाया।
मुग़ल शैली एक मेल है:
- फ़ारस से: बारीक रेखाएँ, भरपूर सजावट, ऊँचा दृष्टिकोण, पन्ने पर सुंदर लिखावट (सुलेख)।
- भारत से: चटक रंग, जीवंत लोग, स्थानीय पौधे, पशु और पहनावा।
- यूरोप से (यात्रियों और पादरियों के लाए चित्रों से): गोलाई के लिए छाया और पास-बड़ा, दूर-छोटा वाली गहराई।
अकबर का काल (1556–1605): बड़ी कार्यशाला
अकबर ने सौ से ज़्यादा कलाकारों की शाही कार्यशाला (किताबख़ाना) बनाई, जिनमें गुजरात, ग्वालियर आदि के बहुत से हिंदू कलाकार थे। वह हर हफ़्ते उनका काम देखता और सबसे अच्छे को इनाम देता।
- टीम में काम: एक कलाकार रूपरेखा बनाता, दूसरा रंग भरता और उस्ताद चेहरे बनाता। कलाकारों के नाम अक्सर हाशिये में लिखे जाते थे।
- बड़ी परियोजनाएँ: हम्ज़ानामा (अमीर हम्ज़ा के साहसिक कारनामों पर कपड़े पर लगभग 1,400 बड़े चित्र), रज़्मनामा (फ़ारसी महाभारत), अकबरनामा (अकबर के शासन का इतिहास) और बाबरनामा।
- शैली: भीड़ भरी, ऊर्जा से भरी हलचल, नाटकीय गति, बहुत से लोग और पशु।
- कलाकार: दसवंत, बसावन, मिस्किन, लाल, केसू दास, जगन्नाथ।
- पढ़े जाने वाले चित्र: मिस्किन का गोवर्धन पर्वत उठाते कृष्ण; जगन्नाथ का सोन नदी पार करता बाबर।
जहाँगीर (1605–1627) और शाहजहाँ (1628–1658)
जहाँगीर: प्रकृति और व्यक्ति-चित्र
जहाँगीर प्रकृति को ध्यान से देखता था। उसे लंबी किताबों के बजाय एल्बम के लिए अलग-अलग चित्र (मुरक़्क़ा) और कम पर बेहतर कलाकार पसंद थे।
- उस्ताद मंसूर (उपाधि नादिर-उल-असर, "युग का अजूबा"): वैज्ञानिक सटीकता से बने पक्षी, पशु और फूल, जैसे पक्षी-अड्डे पर बाज़, ज़ेबरा और साइबेरियन सारस।
- अबुल हसन (नादिर-उज़-ज़माँ): व्यक्ति-चित्र और प्रतीकात्मक चित्र, जैसे मैडोना का चित्र पकड़े जहाँगीर।
- बिशनदास: हूबहू व्यक्ति-चित्रों के लिए प्रसिद्ध।
- बादशाहों के सिर के पीछे सुनहरा प्रभामंडल बनाया जाता था।
शाहजहाँ: भव्यता और औपचारिकता
- स्थिर, औपचारिक दरबारी दृश्य और व्यक्ति-चित्र; बहुत सोना, रत्न और महँगा नीला रंग।
- फूलों और सोने से सजी किनारियाँ (हाशिया)।
- फ़क़ीरुल्ला खान: कबीर और रैदास, काम करते दो संत-कवि। हाजी मदनी: दारा शिकोह की बारात। बिचित्र ने बारीक शाही व्यक्ति-चित्र बनाए।
पतन और फैलाव
औरंगज़ेब (1658–1707) ने कम सहारा दिया। कलाकार राजपूत, पहाड़ी और दक्कनी दरबारों में चले गए और मुग़ल कौशल साथ ले गए। बाद की मुग़ल कला से यूरोपीय लोगों के लिए कंपनी चित्रकला भी बनी।
मुग़ल चित्रकला की मुख्य विशेषताएँ
- यथार्थ: हूबहू चेहरे, सटीक पक्षी, पशु और पौधे।
- लौकिक विषय: कथाओं के साथ इतिहास, दरबारी जीवन, शिकार, व्यक्ति-चित्र, प्रकृति।
- गहराई और छाया: पास बड़ा, दूर छोटा, कोमल छाया; चेहरे अक्सर तीन-चौथाई मुड़े।
- बारीकी: बहुत पतली रेखाएँ, नक्काशीदार कालीन और कपड़े, सोना।
- चित्र के चारों ओर सजे हाशिये और सुलेख।
- शाही नियंत्रण में टीम कार्यशालाएँ।
करके देखिए
एक ही कप को एक रेखा पर तीन बार बनाइए: पास (बड़ा, नीचे), बीच में, और दूर (छोटा, ऊपर)। एक ओर गहरी छाया कीजिए। आपने गहराई की दो मुग़ल तरकीबें इस्तेमाल कर लीं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- मुख्य शब्द: किताबख़ाना = शाही किताब कार्यशाला; मुरक़्क़ा = एल्बम
- हाशिया = सजी किनारी; प्रभामंडल = बादशाह के सिर के पीछे सुनहरा घेरा
- अकबर = हलचल और टीम की किताबें; जहाँगीर = प्रकृति और व्यक्ति-चित्र; शाहजहाँ = औपचारिक भव्यता
- मुग़ल = फ़ारसी + भारतीय + कुछ यूरोपीय (छाया, गहराई)
हल किए गए उदाहरण
1. एक चित्र में अड्डे पर बैठा बहुत सटीक बाज़ है, हर पंख बना है। किसका शासन और कौन चित्रकार?
जहाँगीर का शासन, उस्ताद मंसूर (पक्षी-अड्डे पर बाज़)।
2. अकबर काल के कई चित्रों पर दो-तीन कलाकारों के नाम क्यों हैं?
अकबर की कार्यशाला टीम में काम करती थी: एक रूपरेखा, दूसरा रंग, उस्ताद चेहरे, इसलिए सबका नाम लिखा जाता था।
3. मुग़ल शैली राजस्थान और पहाड़ों तक कैसे पहुँची?
औरंगज़ेब के सहारा कम करने पर मुग़ल-प्रशिक्षित कलाकार राजपूत और पहाड़ी दरबारों में गए और वहाँ अपनी विधियाँ सिखाईं।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि मुग़ल चित्रकला पूरी तरह फ़ारसी है। यह फ़ारसी, भारतीय और कुछ यूरोपीय विचारों का मेल है।
- शासन-काल मिलाना: हलचल भरी किताबें अकबर की; प्रकृति अध्ययन और हूबहू व्यक्ति-चित्र जहाँगीर के।
- कहना कि मंसूर मुख्यतः राजाओं के चित्र बनाता था। वह पक्षियों, पशुओं और फूलों के लिए प्रसिद्ध है।
- यह सोचना कि मुग़ल चित्र बड़े दीवार चित्र थे। कपड़े के हम्ज़ानामा को छोड़कर ये किताब और एल्बम के पन्ने हैं।