पहाड़ी चित्रकला क्या है?
पहाड़ी का अर्थ है "पहाड़ों का"। 1600 के दशक के अंत से 1800 के मध्य तक पश्चिमी हिमालय की तलहटी के कई छोटे राज्य, जैसे बसोहली, जम्मू, जसरोटा, गुलेर, कांगड़ा, चंबा, मंडी, कुल्लू और गढ़वाल, दरबारी चित्रकार रखते थे।
- चित्र छोटे, काग़ज़ पर, सेट में कपड़े की पोटलियों में रखे जाते और खास दिनों पर दिखाए जाते थे।
- प्रिय विषय: कृष्ण और राधा (गीत गोविंद, भागवत पुराण), रसमंजरी (प्रेमियों पर कविताएँ), रागमाला, रामायण, शिव-पार्वती और स्थानीय राजाओं के व्यक्ति-चित्र।
- दो मुख्य शैलियाँ: शुरुआती बसोहली (चटक) और बाद की कांगड़ा (कोमल), बीच का पुल गुलेर।
बसोहली शैली (17वीं सदी का अंत से 18वीं सदी की शुरुआत)
- चटक, सपाट रंग: लाल, पीला, गहरा नीला, अक्सर सादी पीली या हरी पृष्ठभूमि।
- चित्र के चारों ओर लाल किनारी।
- चेहरे: नाक की सीध में ढलवाँ माथा, बहुत बड़ी कमल जैसी आँखें, तेज़ भाव।
- भृंग-पंख के टुकड़े: पन्ने के गहनों जैसे दिखने के लिए चमकीले हरे भृंगों के पंखों के टुकड़े चिपकाए जाते थे।
- सरल इमारतें और सजावटी पेड़।
चित्र: देवीदास का रसमंजरी सेट (1694), और मनकू का गीत गोविंद सेट (1730), जिसमें गोपियों के साथ कृष्ण जैसे दृश्य हैं।
गुलेर परिवार: मनकू और नैनसुख
गुलेर के पंडित सेउ चित्रकार थे। उनके बेटे मनकू और नैनसुख महान उस्ताद बने।
- मनकू चटक बसोहली परंपरा के पास रहे, तेज़ रंग और नाटकीयता के साथ।
- नैनसुख ने मुग़ल ढंग का यथार्थ सीखा। उन्होंने जसरोटा के राजा बलवंत सिंह के लिए काम किया और उन्हें रोज़मर्रा के जीवन में बनाया: संगीत सुनते, हजामत बनवाते, पत्र लिखते, नर्तकियाँ देखते। उनका काम शांत, सच्चा, हल्के रंगों और खुली जगह वाला है।
- मनकू और नैनसुख के बेटे-भतीजे यह पारिवारिक शैली कांगड़ा और दूसरे दरबारों तक ले गए, जिससे गुलेर-कांगड़ा शैली बनी।
कांगड़ा शैली (18वीं सदी का अंत से 19वीं सदी)
कांगड़ा चित्रकला राजा संसार चंद (शासन 1775–1823) के समय शिखर पर पहुँची।
- हल्के, ठंडे रंग: हल्का हरा, गुलाबी, नीला।
- सुंदर आकृतियाँ: अंडाकार चेहरे, सीधी नाक और कोमल आँखों वाली पतली स्त्रियाँ।
- भाव वाली प्रकृति: नदियाँ, लहराते पहाड़, फूलों वाले पेड़, बादल, बिजली और चाँदनी प्रेम और विरह का मूड दिखाते हैं।
- बारीक, बहती रेखाएँ; किनारी अक्सर गहरी नीली या गुलाबी, सोने के साथ।
- चित्र: गीत गोविंद, भागवत पुराण (जैसे वृंदावन जाते नंद, यशोदा और कृष्ण अपने संबंधियों के साथ), बिहारी सतसई, और राग मेघ जैसे रागमाला चित्र।
करके देखिए
एक ही चेहरा दो बार बनाइए। पहले बसोहली: एक सपाट चटक रंग, मोटी लाल किनारी, बहुत बड़ी आँख। फिर कांगड़ा: हल्के रंग, पतली रेखा, छोटी स्वाभाविक आँख और पीछे एक पेड़। कौन-सा ज़्यादा ज़ोर से बोलता लगता है?
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- मुख्य शब्द: पहाड़ी = पहाड़ों का; रसमंजरी = प्रेमियों पर कविताएँ
- बसोहली = चटक सपाट रंग, लाल किनारी, बड़ी कमल-आँख, भृंग-पंख की चमक
- कांगड़ा = हल्के रंग, सुंदर आकृतियाँ, भरपूर प्रकृति, चाँदनी
- गुलेर परिवार: पंडित सेउ → मनकू और नैनसुख → कांगड़ा के चित्रकार
हल किए गए उदाहरण
1. एक चित्र में मोटी लाल किनारी, सपाट पीली पृष्ठभूमि और बड़ी कमल-आँख वाला चेहरा है। कौन-सी शैली?
बसोहली: चटक सपाट रंग, लाल किनारी और बड़ी आँखें इसकी पहचान हैं।
2. एक चित्र में रात को नदी किनारे फूलों वाले पेड़ के नीचे प्रतीक्षा करती राधा, हल्के हरे और गुलाबी रंगों में है। कौन-सी शैली?
कांगड़ा: हल्के रंग, सुंदर आकृतियाँ और भाव दिखाने वाली प्रकृति।
3. नैनसुख क्यों महत्वपूर्ण हैं?
उन्होंने जसरोटा के राजा बलवंत सिंह के चित्रों से पहाड़ी चित्रकला में शांत, सच्चा रेखांकन लाया, और उनके परिवार ने कांगड़ा शैली बनाने में मदद की।
आम गलतियाँ
- पहाड़ी और राजस्थानी को मिलाना। पहाड़ी हिमालय की तलहटी के पहाड़ी दरबारों की है; राजस्थानी राजस्थान के मैदानों की।
- कहना कि कांगड़ा में चटक, सपाट लाल-पीला है। वह बसोहली है; कांगड़ा कोमल है।
- यह सोचना कि मनकू और नैनसुख अलग जगहों के प्रतिद्वंद्वी थे। वे भाई थे, गुलेर के पंडित सेउ के बेटे।
- यह सोचना कि भृंग-पंख रंग से बनाए गए। वे असली चमकीले पंखों के टुकड़े थे जो काग़ज़ पर चिपकाए गए।