शुद्ध जल और पीने योग्य जल
शुद्ध जल में सिर्फ़ पानी के अणु (H₂O) होते हैं, और कुछ नहीं। पीने योग्य जल (potable water) का मतलब है जो पीने के लिए सुरक्षित हो। ये दोनों एक नहीं हैं।
पीने योग्य पानी में थोड़े घुले लवण रहते हैं। इससे कोई नुक़सान नहीं, इन्हीं से पानी का स्वाद आता है। पर इसमें हानिकारक कीटाणु नहीं होने चाहिए और लवण कम मात्रा में होने चाहिए।
हमारा पानी कहाँ से आता है?
- मीठा पानी: बारिश का पानी झीलों, नदियों और ज़मीन के नीचे (भूजल) जमा होता है। यह सबसे आसान स्रोत है।
- समुद्री पानी: धरती का ज़्यादातर पानी यही है, पर यह पीने के लिए बहुत खारा है।
धरती का बहुत छोटा हिस्सा ही मीठा और आसानी से मिलने वाला पानी है। इसे बर्बाद या गंदा न करना सतत विकास (sustainable development) का हिस्सा है: आज की ज़रूरत ऐसे पूरी करना कि कल के लोगों का हक़ न छिने।
मीठे पानी को सुरक्षित बनाना: बैठाना, छानना, कीटाणु मारना
जल-संयंत्र पानी को कुछ चरणों में साफ़ करता है:
- स्रोत चुनना: जितना हो सके साफ़ स्रोत।
- जाली और अवसादन (sedimentation): जाली टहनियाँ और पत्ते रोकती है। बड़ी टंकियों में पानी स्थिर रहता है तो रेत और भारी कण नीचे बैठ जाते हैं। कभी-कभी फिटकरी जैसा रसायन डालते हैं ताकि छोटे कण आपस में जुड़कर जल्दी बैठें।
- निस्पंदन (filtration): पानी रेत और बजरी की परतों से गुज़रता है। ये बचे हुए बारीक ठोस कण रोक लेती हैं।
- अधिशोषण (adsorption): सक्रिय कार्बन (लाखों छोटे छेदों वाला कोयला) अपनी सतह पर रंग और गंध वाले रसायन चिपका लेता है। अधिशोषण = सतह पर चिपकना।
- रोगाणुनाशन (sterilisation): क्लोरीन, ओज़ोन या पराबैंगनी (UV) प्रकाश से कीटाणु मारे जाते हैं।
छानने से सिर्फ़ वे चीज़ें रुकती हैं जिन्हें पकड़ा जा सके। घुले लवण नहीं रुकते, और कई कीटाणु इतने छोटे हैं कि निकल जाते हैं। इसीलिए आख़िरी चरण में कीटाणु मारे जाते हैं।
विलवणीकरण: समुद्री पानी से पीने का पानी
जब मीठा पानी कम हो, तो समुद्री पानी से नमक हटाया जा सकता है। इसे विलवणीकरण (desalination) कहते हैं।
- आसवन (distillation): खारे पानी को उबालो। पानी भाप बनकर उड़ता है और नमक पीछे रह जाता है। भाप को संघनित्र (condenser) में ठंडा करके फिर पानी बनाया जाता है। यह पानी बहुत शुद्ध होता है।
- रिवर्स ऑस्मोसिस (RO): खारे पानी को बहुत दबाव से एक झिल्ली (बहुत पतली परत, छोटे-छोटे छेद) से धकेला जाता है। पानी निकल जाता है, ज़्यादातर नमक नहीं।
दोनों तरीक़ों में बहुत ऊर्जा लगती है, इसलिए ये महँगे हैं। ये उन सूखी जगहों पर काम आते हैं जहाँ समुद्र पास हो और ऊर्जा सस्ती हो।
प्रयोगशाला में पानी की जाँच
शुद्ध पानी सामान्य वायुदाब पर ठीक 100 °C पर उबलता है। एक नमूने को तश्तरी में वाष्पित करो: शुद्ध पानी कोई ठोस नहीं छोड़ता। pH भी देख सकते हो (शुद्ध पानी का pH 7)।
अपशिष्ट जल उपचार
घर, फ़ैक्टरी और खेत में इस्तेमाल के बाद पानी अपशिष्ट जल (सीवेज) बन जाता है। इसमें खाने के टुकड़े, साबुन, मल, कीटाणु और कभी-कभी ज़हरीले रसायन होते हैं। नदी या समुद्र में छोड़ने से पहले इसे साफ़ करना ज़रूरी है।
- जाली और ग्रिट हटाना: कपड़े, प्लास्टिक और कंकड़ निकाले जाते हैं।
- अवसादन: बड़ी टंकियों में भारी कीचड़ (sludge) नीचे बैठता है। ऊपर का हल्का द्रव बहिःस्राव (effluent) कहलाता है।
- बहिःस्राव का वायवीय (aerobic) उपचार: हवा के बुलबुले डाले जाते हैं ताकि अच्छे बैक्टीरिया बचा हुआ कचरा पचा लें।
- कीचड़ का अवायवीय (anaerobic) पाचन: बिना हवा के दूसरे बैक्टीरिया कीचड़ तोड़ते हैं। इससे बायोगैस (ईंधन) और खाद बनती है।
फ़ैक्टरी के पानी से ज़हरीले रसायन हटाने के लिए और चरण लगते हैं। सीवेज साफ़ करना मीठा पानी साफ़ करने से कठिन है, पर इससे नदियाँ और हमारी सेहत बचती है।
कठोर जल और मृदु जल
मृदु जल (soft water) में साबुन आसानी से झाग देता है। कठोर जल (hard water) में झाग कम बनता है और भूरा-सा मैल (scum) बनता है।
जब पानी चूना-पत्थर या खड़िया जैसी चट्टानों पर बहता है, तो उसमें कैल्शियम (Ca²⁺) और मैग्नीशियम (Mg²⁺) आयन घुल जाते हैं। यही कठोरता है।
- अस्थायी कठोरता: कैल्शियम हाइड्रोजनकार्बोनेट से। उबालने से हट जाती है; केतली के अंदर की सफ़ेद पपड़ी (scale) इसी से बनती है।
- स्थायी कठोरता: कैल्शियम या मैग्नीशियम सल्फ़ेट से। उबालने से नहीं हटती।
मृदु बनाने के तरीक़े: उबालना (सिर्फ़ अस्थायी), धावन सोडा (सोडियम कार्बोनेट) डालना, या आयन-विनिमय स्तंभ जो Ca²⁺ और Mg²⁺ को सोडियम आयनों से बदल देता है। आसवन दोनों तरह की कठोरता हटाता है।
कठोर जल में कैल्शियम है, जो दाँत-हड्डियों के लिए अच्छा है, पर पपड़ी पाइप जाम करती है और गीज़र-केतली में ऊर्जा बर्बाद होती है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- पीने योग्य जल = पीने के लिए सुरक्षित (कम लवण, कोई हानिकारक कीटाणु नहीं) ≠ शुद्ध जल (सिर्फ़ H₂O)
- उपचार का क्रम: जाली → अवसादन → निस्पंदन → (कार्बन अधिशोषण) → रोगाणुनाशन (क्लोरीन / ओज़ोन / UV)
- विलवणीकरण: आसवन (उबालना + संघनन) या रिवर्स ऑस्मोसिस (झिल्ली + दबाव)
- अपशिष्ट जल: जाली → अवसादन (कीचड़ + बहिःस्राव) → बहिःस्राव का वायवीय उपचार → कीचड़ का अवायवीय पाचन
- कठोर जल = घुले Ca²⁺ और Mg²⁺; अस्थायी उबालने से हटती है, स्थायी नहीं
- शुद्ध जल की जाँच: 100 °C पर उबलता है, वाष्पन पर कोई ठोस नहीं छोड़ता
हल किए गए उदाहरण
1. एक गाँव मटमैली नदी से पानी लेता है। इसे पीने योग्य बनाने के चरण क्रम से बताओ।
1) पानी को टंकी में रोको ताकि मिट्टी बैठ जाए (अवसादन)। 2) रेत-बजरी से छानो ताकि बारीक कण हटें (निस्पंदन)। 3) क्लोरीन डालकर या घर पर उबालकर कीटाणु मारो (रोगाणुनाशन)। अब पानी पीने योग्य है, भले ही उसमें कुछ घुले लवण बचे हों।
2. रेत का फ़िल्टर समुद्री पानी को पीने लायक क्यों नहीं बना सकता?
समुद्री पानी में नमक घुला हुआ है: उसके कण आयन बनकर पानी के अणुओं के बीच फैले हैं। ये रेत के छेदों से सीधे निकल जाते हैं। नमक हटाने के लिए आसवन (पानी भाप बनकर जाता है, नमक रुकता है) या रिवर्स ऑस्मोसिस (झिल्ली पानी को जाने देती है, ज़्यादातर आयनों को नहीं) चाहिए।
3. एक छात्रा 50 cm³ नल का पानी और 50 cm³ आसुत जल दो तश्तरियों में वाष्पित करती है। उसे क्या दिखेगा और इससे क्या पता चलता है?
नल के पानी वाली तश्तरी पर पतली सफ़ेद परत बचेगी: ये घुले लवण हैं। आसुत जल वाली तश्तरी साफ़ रहेगी। यानी नल का पानी पीने योग्य है पर शुद्ध नहीं, जबकि आसुत जल शुद्ध है।
आम गलतियाँ
- यह मानना कि साफ़ दिखने वाला पानी सुरक्षित है। कीटाणु और घुले लवण दिखते नहीं; साफ़ पानी भी बीमार कर सकता है।
- कहना कि छानने से घुला नमक हट जाता है। फ़िल्टर सिर्फ़ ठोस कण रोकता है; घुले लवण निकल जाते हैं।
- 'पीने योग्य' और 'शुद्ध' को एक समझना। पीने योग्य पानी में थोड़े घुले पदार्थ रहते हैं।
- कहना कि उबालने से सारी कठोरता हट जाती है। उबालने से सिर्फ़ अस्थायी कठोरता हटती है।