सिरेमिक में आयन: आयनिक त्रिज्या और समन्वय संख्या
ज़्यादातर सिरेमिक आयनों से बने होते हैं: छोटे आवेशित कण। धातु इलेक्ट्रॉन छोड़कर छोटे धनात्मक धनायन बनती है। ऑक्सीजन जैसे परमाणु इलेक्ट्रॉन लेकर बड़े ऋणात्मक ऋणायन बनते हैं। विपरीत आवेश खींचते हैं, इसलिए आयन गेंदों की तरह सटकर बैठते हैं।
आयनिक त्रिज्या आयन का आकार है। समन्वय संख्या (CN) वह गिनती है कि एक आयन को विपरीत आवेश के कितने आयन छूते हैं। धनायन ज़्यादा से ज़्यादा ऋणायन चाहता है, पर सबको उसे छूना है और आपस में दबना नहीं है।
इसीलिए एक संख्या सब तय करती है: त्रिज्या अनुपात = r(धनायन) ÷ r(ऋणायन)।
| त्रिज्या अनुपात | CN | पड़ोसियों का आकार |
|---|---|---|
| 0.155 से 0.225 | 3 | त्रिकोण |
| 0.225 से 0.414 | 4 | चतुष्फलक |
| 0.414 से 0.732 | 6 | अष्टफलक |
| 0.732 से 1.0 | 8 | घन के कोने |
उदाहरण: NaCl में अनुपात लगभग 0.56 है, इसलिए CN = 6। CsCl में लगभग 0.9, इसलिए CN = 8। MgO में लगभग 0.51, इसलिए CN = 6। यह अंगूठे का नियम है, कानून नहीं: जहाँ सहसंयोजी बंध ज़्यादा हों वहाँ यह चूक सकता है।
क्रिस्टल संरचना और उसके गुण
क्रिस्टल में आयन ऐसे पैटर्न में बैठते हैं जो हर दिशा में दोहराता है। दोहराने वाला सबसे छोटा खंड इकाई कोष्ठिका (unit cell) है। हर आयन की अपनी तय जगह होने से क्रिस्टल का गलनांक तीखा होता है और वह सपाट तलों पर टूटता है।
क्रिस्टल विषमदैशिक (anisotropic) हो सकते हैं: अलग दिशाओं में गुण अलग, क्योंकि हर दिशा में आयन अलग ढंग से बैठे होते हैं।
सिरेमिक कठोर और ताप-सह क्यों हैं? आयनिक और सहसंयोजी बंध बहुत मज़बूत हैं, इसलिए आयनों को हिलाने या अलग करने में बहुत ऊर्जा लगती है। भंगुर क्यों? अगर एक परत एक जगह खिसक जाए तो धन के सामने धन और ऋण के सामने ऋण आ जाता है। वे धकेलते हैं और दरार चल पड़ती है। धातुओं में इलेक्ट्रॉन परतों को जोड़े रखते हैं, इसलिए वे ऐसे नहीं टूटतीं।
सिरेमिक अच्छे विद्युतरोधी क्यों हैं? सारे इलेक्ट्रॉन आयनों या बंधों में बंधे हैं। मुक्त इलेक्ट्रॉन नहीं, तो धारा नहीं।
काँच की संरचना और गुण
काँच में ईंटें वही होती हैं जो क्रिस्टल में, पर दोहराता पैटर्न नहीं होता। हर आयन के पड़ोसी अब भी वैसे ही होते हैं (लघु-परास क्रम), पर कुछ आयनों के बाद पैटर्न बेतरतीब हो जाता है (दीर्घ-परास क्रम नहीं)। काँच तब बनता है जब पिघला पदार्थ इतनी तेज़ी से ठंडा हो या इतना गाढ़ा हो कि आयन क्रिस्टल में अपनी जगह पाने से पहले ही अटक जाएँ।
सिलिका काँच में हर सिलिकॉन 4 ऑक्सीजन के छोटे चतुष्फलक के भीतर होता है, और ये चतुष्फलक कोने साझा करके बेतरतीब जाल बनाते हैं।
काँच के गुण: तीखा गलनांक नहीं (वह काँच संक्रमण में धीरे-धीरे नरम होता है), सब दिशाओं में एक जैसे गुण (समदैशिक), टूटने पर मुड़ी चमकदार सतहें, और पारदर्शी, क्योंकि रोशनी बिखेरने वाले क्रिस्टल-किनारे नहीं हैं।
| क्रिस्टल | काँच | |
|---|---|---|
| पैटर्न | दोहराता है | बेतरतीब |
| पिघलना | तीखा बिंदु | धीरे नरम |
| दिशा | अलग हो सकते हैं | सब जगह एक |
| टूटना | सपाट तल | मुड़ी सतह |
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- त्रिज्या अनुपात = r(धनायन) ÷ r(ऋणायन)
- 0.225 से 0.414: CN 4; 0.414 से 0.732: CN 6; 0.732 से 1: CN 8
- 1 nm = 10⁻⁹ m = 10 Å; 1 Å = 100 pm
- मुख्य शब्द: धनायन, ऋणायन, समन्वय संख्या, इकाई कोष्ठिका, दीर्घ-परास क्रम, काँच संक्रमण
हल किए गए उदाहरण
1. Na⁺ की त्रिज्या 0.102 nm और Cl⁻ की 0.181 nm है। त्रिज्या अनुपात और CN ज्ञात करें।
अनुपात = 0.102 ÷ 0.181 = 0.56। यह 0.414 और 0.732 के बीच है, इसलिए CN = 6 (अष्टफलकीय)।
2. 0.06 nm त्रिज्या का धनायन 0.14 nm त्रिज्या के ऋणायनों के साथ है। कितने ऋणायन उसे छू सकते हैं?
अनुपात = 0.06 ÷ 0.14 = 0.43। यह 0.414 से ज़रा ऊपर है, इसलिए CN = 6।
3. नमक का क्रिस्टल सपाट तलों पर टूटता है पर खिड़की का काँच मुड़कर क्यों?
नमक के आयन परतों में हैं जो फटने के लिए सपाट तल देते हैं। काँच के आयन बेतरतीब हैं, कोई तल नहीं, इसलिए दरार मुड़ती है।
4. Cs⁺ = 0.167 nm और Cl⁻ = 0.181 nm। नियम से CN कितना?
अनुपात = 0.167 ÷ 0.181 = 0.92, जो 0.732 से ऊपर है, इसलिए CN = 8।
आम गलतियाँ
- अनुपात उलटा निकालना। हमेशा छोटे धनायन को बड़े ऋणायन से भाग दें, इसलिए अनुपात 1 से कम आता है।
- सोचना कि काँच में कोई क्रम ही नहीं। हर आयन के पड़ोसी वही रहते हैं; सिर्फ लंबा पैटर्न नहीं होता।
- कहना कि काँच बहुत धीमा द्रव है जो पुरानी खिड़कियों में बहता है। पुराने शीशे अपने बनने के ढंग से ऊबड़-खाबड़ हैं; काँच ठोस है।
- कहना कि बंध कमज़ोर होने से सिरेमिक भंगुर हैं। बंध मज़बूत हैं; आयन बस बिना समान आवेश सामने आए फिसल नहीं सकते।