तारे हमें क्या भेजते हैं?
अंतरिक्ष की हर चीज़ तरंगों के रूप में ऊर्जा देती है। प्रकाश उनमें से एक है। पूरे परिवार को वैद्युतचुंबकीय स्पेक्ट्रम कहते हैं: रेडियो तरंगें, सूक्ष्म तरंगें, अवरक्त, दृश्य प्रकाश, पराबैंगनी (UV), X-किरणें और गामा किरणें।
- रेडियो: ठंडे गैस बादल, घूमते न्यूट्रॉन तारे (पल्सर)।
- अवरक्त: बादलों में छिपे गर्म धूल और नए तारे।
- दृश्य: सूर्य जैसे चमकते तारे और ग्रह।
- UV और X-किरणें: बहुत गर्म गैस, ब्लैक होल में गिरती गैस।
- गामा किरणें: सबसे भयंकर विस्फोट।
जितनी गर्म चीज़, उतनी छोटी तरंगें। लंबी तरंगों में ऊर्जा कम, छोटी में ज़्यादा।
ऑप्टिकल टेलीस्कोप: अपवर्तक और परावर्तक
ऑप्टिकल टेलीस्कोप दृश्य प्रकाश से काम करता है। इसका असली काम चीज़ों को बड़ा करना नहीं, ज़्यादा प्रकाश इकट्ठा करना और बारीकी दिखाना है।
- अपवर्तक (refractor): आगे एक बड़ा लेंस होता है। लेंस अपने वज़न से झुकता है और रंगों को अलग-अलग मोड़ता है, इसलिए बहुत बड़ा लेंस बनाना कठिन है।
- परावर्तक (reflector): घुमावदार दर्पण होता है। दर्पण को पीछे से सहारा दे सकते हैं, इसलिए बहुत बड़ा बन सकता है। सबसे बड़े टेलीस्कोप परावर्तक ही हैं।
प्रकाश संग्रह दर्पण के क्षेत्रफल पर निर्भर है: क्षेत्रफल = (चौड़ाई)²। पुतली से 10 गुना चौड़ा दर्पण 100 गुना ज़्यादा प्रकाश पकड़ता है।
बारीकी (विभेदन) चौड़े दर्पण और छोटी तरंगदैर्घ्य से बढ़ती है। डिजिटल कैमरा चिप (CCD) जैसे डिटेक्टर तस्वीर दर्ज करते हैं। लंबे एक्सपोज़र में हल्की रोशनी जुड़ती जाती है।
रेडियो टेलीस्कोप
रेडियो तरंगें एक मीटर तक लंबी हो सकती हैं, प्रकाश से बहुत लंबी। लंबी तरंगों से बारीकी पाने के लिए डिश बहुत चौड़ी चाहिए। इसलिए रेडियो टेलीस्कोप विशाल डिश होते हैं, अक्सर धातु की जाली के (जाली के छेद तरंग से छोटे हैं, इसलिए तरंग फिर भी लौटती है)।
डिश तरंगों को फ़ोकस पर लगे रिसीवर तक पहुँचाती है। संकेत कंप्यूटर पर अंक बन जाता है। रेडियो तरंगें बादलों से निकल जाती हैं, इसलिए ये दिन और खराब मौसम में भी काम करते हैं।
कई डिश जोड़कर ऐरे बनता है, जो उनके बीच की दूरी जितनी चौड़ी एक विशाल डिश जैसा काम करता है।
न्यूट्रिनो और गुरुत्व तरंग डिटेक्टर
अंतरिक्ष के कुछ संदेश प्रकाश की तरंगें हैं ही नहीं।
न्यूट्रिनो सूर्य, फटते तारों और नाभिकीय अभिक्रियाओं में बनने वाले नन्हे कण हैं। इनका द्रव्यमान लगभग शून्य और आवेश शून्य होता है, इसलिए ये पूरी पृथ्वी के आर-पार निकल जाते हैं। हर सेकंड खरबों आपके शरीर से गुज़रते हैं। कुछ पकड़ने के लिए वैज्ञानिक ज़मीन के बहुत नीचे पानी या बर्फ़ का विशाल टैंक लगाते हैं, ताकि दूसरे कण रुक जाएँ। जब कोई न्यूट्रिनो कभी-कभार टकराता है तो हल्की नीली चमक बनती है, जिसे प्रकाश सेंसर देखते हैं।
गुरुत्व तरंगें दिक्-काल (space and time) की लहरें हैं, जो दो ब्लैक होल जैसे भारी पिंड घूमते हुए मिलते हैं तब बनती हैं। डिटेक्टर में किलोमीटर लंबी दो सुरंगें और लेज़र किरणें होती हैं। तरंग गुज़रे तो एक सुरंग ज़रा-सी खिंचती और दूसरी सिकुड़ती है। लेज़र यह बदलाव नापते हैं, जो प्रोटॉन से भी बहुत छोटा होता है। अलग देशों के कई डिटेक्टर मिलकर बताते हैं कि तरंग किस दिशा से आई।
ज़मीन और अंतरिक्ष के टेलीस्कोप
हवा दृश्य प्रकाश, कुछ अवरक्त और रेडियो को निकलने देती है, पर UV, X-किरणें, गामा किरणें और ज़्यादातर अवरक्त रोक देती है। हवा तारों को टिमटिमाती भी है, जिससे चित्र धुँधले होते हैं।
- ज़मीन के टेलीस्कोप: बहुत बड़े बन सकते हैं, मरम्मत और सुधार आसान। ऊँचे, सूखे, अँधेरे पहाड़ों पर सबसे अच्छे।
- अंतरिक्ष टेलीस्कोप: हवा के ऊपर हैं। रुकी हुई सारी तरंगें दिखती हैं और चित्र साफ़ मिलते हैं, पर खर्च ज़्यादा और मरम्मत कठिन।
खगोलविद दोनों का इस्तेमाल करते हैं और तस्वीरें जोड़कर एक पिंड की पूरी कहानी पाते हैं।
वेधशालाएँ
वेधशाला वह जगह है जहाँ टेलीस्कोप, उपकरण और लोग होते हैं। अच्छी जगह ऊँची (ऊपर हवा कम), सूखी (जलवाष्प कम), अँधेरी (शहर की रोशनी कम) और शांत होती है। पहाड़ की चोटी, रेगिस्तान और ठंडे सूखे मैदान पसंद किए जाते हैं। रेडियो स्थानों पर फ़ोन और टीवी के संकेत कम होने चाहिए।
वेधशालाएँ आँकड़े खुले रूप में साझा करती हैं, ताकि कहीं के भी छात्र और वैज्ञानिक वही आसमान पढ़ सकें।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- प्रकाश संग्रह ∝ D² (D = दर्पण की चौड़ाई)
- प्रकाश अनुपात = (D1 / D2)²
- बारीकी ≈ तरंगदैर्घ्य ÷ D (छोटा मान = साफ़)
- टेलीस्कोप आवर्धक नहीं: मुख्यतः प्रकाश इकट्ठा करता है
- स्पेक्ट्रम (लंबी से छोटी तरंग): रेडियो, अवरक्त, दृश्य, UV, X-किरण, गामा
हल किए गए उदाहरण
1. टेलीस्कोप का दर्पण 2 m चौड़ा है और पुतली 0.005 m। दर्पण कितना गुना ज़्यादा प्रकाश पकड़ता है?
अनुपात = (2 / 0.005)² = 400² = 1,60,000। दर्पण 1,60,000 गुना ज़्यादा प्रकाश पकड़ता है।
2. टेलीस्कोप A 4 m और B 8 m चौड़ा है। B कितना ज़्यादा प्रकाश जुटाता है?
(8/4)² = 2² = 4। B चार गुना ज़्यादा जुटाता है, दो गुना नहीं।
3. X-किरण टेलीस्कोप पृथ्वी की कक्षा में क्यों होते हैं?
हवा X-किरणें सोख लेती है, इसलिए ज़मीन तक नहीं आतीं। हवा के ऊपर टेलीस्कोप उन्हें पकड़ सकता है।
4. समान बारीकी के लिए रेडियो डिश ऑप्टिकल दर्पण से बहुत चौड़ी क्यों?
बारीकी तरंगदैर्घ्य ÷ चौड़ाई पर निर्भर है। रेडियो तरंगें प्रकाश से लगभग दस लाख गुना लंबी हैं, इसलिए डिश बहुत चौड़ी चाहिए।
आम गलतियाँ
- टेलीस्कोप को मुख्यतः बड़ा करने वाला समझना। इसका मुख्य काम प्रकाश जुटाना और बारीकी दिखाना है।
- दोगुनी चौड़ाई से दोगुना प्रकाश मानना। मिलता है चार गुना, क्योंकि क्षेत्रफल चौड़ाई के वर्ग से बढ़ता है।
- सब टेलीस्कोप प्रकाश से काम करते हैं, यह मानना। रेडियो, X-किरण, न्यूट्रिनो और गुरुत्व तरंग डिटेक्टर दूसरे संकेत पकड़ते हैं।
- अंतरिक्ष टेलीस्कोप को तारों के पास मानना। तारे इतने दूर हैं कि कुछ सौ km से फ़र्क नहीं पड़ता; फ़ायदा हवा के ऊपर होने का है।