ज़रूरी अंतरिक्ष शब्द
- रॉकेट / प्रक्षेपण यान: चीज़ों को अंतरिक्ष तक ले जाने वाली मशीन।
- पेलोड (नीतभार): जो रॉकेट ले जाता है (उपग्रह, यान, इंसान)।
- उपग्रह: जो भी किसी ग्रह के चारों ओर घूमे। चाँद प्राकृतिक उपग्रह है; मौसम उपग्रह कृत्रिम।
- कक्षा: ग्रह या तारे के चारों ओर घुमावदार रास्ता।
- अंतरिक्ष यान (probe): दूसरी दुनियाओं को जाँचने भेजा गया रोबोट यान (जैसे वॉयजर, मंगलयान)।
- लैंडर / रोवर: लैंडर सतह पर उतरता है, रोवर सतह पर चलता है।
- अंतरिक्ष स्टेशन: कक्षा में बड़ा यान जहाँ लोग रहते और काम करते हैं।
- अंतरिक्ष यात्री: अंतरिक्ष यात्रा के लिए प्रशिक्षित व्यक्ति (कॉस्मोनॉट, टाइकोनॉट, व्योमनॉट भी कहते हैं)।
रॉकेट कैसे उड़ता है
रॉकेट ईंधन को ऑक्सीकारक के साथ जलाता है (उसे अपनी ऑक्सीजन साथ ले जानी पड़ती है, क्योंकि अंतरिक्ष में हवा नहीं)। गरम गैस नोज़ल से नीचे निकलती है। न्यूटन के तीसरे नियम से गैस रॉकेट को ऊपर धकेलती है। इस धक्के को प्रणोद (thrust) कहते हैं।
रॉकेट ख़ाली टंकियाँ रास्ते में गिरा देता है। इन हिस्सों को चरण (stages) कहते हैं। भार घटने से बाक़ी हिस्सा और तेज़ चलता है। कुछ नए रॉकेट पहला चरण वापस उतारकर दोबारा इस्तेमाल करते हैं, जिससे प्रक्षेपण सस्ता होता है।
कक्षाएँ और उपग्रहों के काम
गेंद फेंको: वह मुड़कर नीचे गिरती है। और तेज़ फेंको: और दूर गिरती है। लगभग 7.9 km/s पर (ज़मीन के पास, हवा को छोड़कर) वह पृथ्वी की गोलाई के साथ-साथ हमेशा गिरती रहेगी। यही कक्षा है। 11.2 km/s (पलायन चाल) पर यान हमेशा के लिए पृथ्वी छोड़ देता है।
| कक्षा | ऊँचाई | उपयोग |
|---|---|---|
| निम्न पृथ्वी कक्षा | 160–2,000 km | अंतरिक्ष स्टेशन (≈ 400 km, ≈ 90 मिनट में एक चक्कर), पृथ्वी की फ़ोटो, इंटरनेट उपग्रह |
| मध्यम कक्षा | ≈ 20,000 km | नेविगेशन: GPS, Galileo, GLONASS, BeiDou |
| भूस्थिर कक्षा | 35,786 km | TV, मौसम, संचार; 24 घंटे में एक चक्कर, इसलिए एक ही जगह के ऊपर टिका दिखता है |
पूरी भौतिकी पलायन वेग और कक्षीय वेग पाठ में है।
पड़ाव: पहले उपग्रह से आज तक
- 1957 स्पुतनिक 1 (सोवियत संघ), पहला कृत्रिम उपग्रह।
- 1961 यूरी गागरिन (सोवियत संघ), अंतरिक्ष में पहले इंसान। 1963 वेलेंटीना तेरेश्कोवा, पहली महिला।
- 1969 अपोलो 11 (अमेरिका): नील आर्मस्ट्रांग और बज़ एल्ड्रिन चाँद पर चले।
- 1969 भारत ने इसरो बनाया। 1975 आर्यभट, भारत का पहला उपग्रह। 1984 राकेश शर्मा अंतरिक्ष गए।
- 1990 हबल अंतरिक्ष दूरबीन। 1998 अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) का पहला हिस्सा।
- 2003 यांग लिवेई, चीन के पहले अंतरिक्ष यात्री। 2008 चंद्रयान-1 को चाँद पर पानी के संकेत मिले।
- 2014 मंगलयान (भारत) पहली ही कोशिश में मंगल पहुँचा। 2019 चांग'ई 4 (चीन) चाँद के दूर वाले हिस्से पर उतरा।
- 2021 जेम्स वेब अंतरिक्ष दूरबीन छोड़ी गई। 2022 चीन का तियांगोंग स्टेशन पूरा हुआ।
- 2023 चंद्रयान-3 चाँद के दक्षिणी ध्रुव के पास उतरा; आदित्य-L1 सूर्य का अध्ययन करने निकला।
अंतरिक्ष में होड़ और सहयोग
शीत युद्ध के समय अमेरिका और सोवियत संघ ने अपनी ताक़त दिखाने के लिए अंतरिक्ष में होड़ लगाई। वही रॉकेट हथियार भी ले जा सकते थे, इसलिए अंतरिक्ष विज्ञान के साथ सुरक्षा का मामला भी था।
बाद में विरोधी साथ काम करने लगे: ISS को अमेरिका, रूस, यूरोप, जापान और कनाडा मिलकर चलाते हैं। आज बहुत से देश और निजी कंपनियाँ रॉकेट छोड़ती हैं। चीन का अपना स्टेशन और चाँद-मंगल मिशन हैं। भारत दूसरे देशों को सस्ते प्रक्षेपण देता है।
गहरे समुद्रों की तरह अंतरिक्ष भी “आख़िरी सीमांत” है: यह किसी एक देश का नहीं। बाह्य अंतरिक्ष संधि (1967) कहती है कि कोई देश चाँद या दूसरे पिंडों का मालिक नहीं बन सकता, और कक्षा में परमाणु हथियार नहीं रखे जाएँगे। नए सवाल बाक़ी हैं: चाँद पर खनन कौन करे, और मलबा कौन साफ़ करे?
फ़ायदे, ख़तरे और भविष्य
फ़ायदे: मौसम और चक्रवात की चेतावनी, नेविगेशन, फ़ोन और TV संपर्क, फ़सल, जंगल और बाढ़ के नक्शे, जलवायु के आँकड़े, और अंतरिक्ष के लिए बने आविष्कार (बेहतर पानी फ़िल्टर, मेमोरी फ़ोम, छोटे कैमरे)।
ख़तरे और लागत: प्रक्षेपण महँगे हैं; रॉकेट गैसें छोड़ते हैं; अंतरिक्ष मलबा (पुराने उपग्रह और टुकड़े) लगभग 7–8 km/s से चलता है, इसलिए छोटा टुकड़ा भी उपग्रह तोड़ सकता है। अंतरिक्ष यात्रियों को विकिरण और मांसपेशी-हड्डी कमज़ोर होने का ख़तरा है।
भविष्य: चाँद पर लौटकर अड्डे बनाना, मंगल तक इंसानी यात्रा, दूसरे तारों के ग्रह खोजने वाली दूरबीनें, भारत की गगनयान मानव उड़ानें, और दोबारा इस्तेमाल होने वाले रॉकेट। बड़ा नियम: ऐसे खोजो कि अंतरिक्ष सबके काम का बना रहे।
करके देखो: गुब्बारा रॉकेट
कमरे में एक लंबा धागा बाँधो और उसमें स्ट्रॉ पिरोओ। फूले हुए गुब्बारे को स्ट्रॉ पर चिपकाओ और छोड़ दो। हवा एक ओर भागती है, गुब्बारा दूसरी ओर: यही प्रणोद है। पहले अनुमान लगाओ: बड़ा गुब्बारा ज़्यादा दूर जाएगा? फिर जाँचो। उसके बाद 3D में चाल वाले स्लाइडर से वह सबसे कम चाल ढूँढो जिस पर कक्षा बनती है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- रॉकेट प्रणोद: गैस पीछे धकेली ⇒ रॉकेट आगे धकेला गया (न्यूटन का तीसरा नियम)
- पृथ्वी के पास कक्षीय चाल ≈ 7.9 km/s
- पृथ्वी से पलायन चाल ≈ 11.2 km/s
- निम्न कक्षा: 160–2,000 km; ISS ≈ 400 km, ≈ 90 मिनट में एक चक्कर
- भूस्थिर कक्षा: भूमध्य रेखा से 35,786 km ऊपर, आवर्तकाल 24 घंटे
- पेलोड = रॉकेट जो ले जाता है; चरण = रास्ते में गिराए जाने वाले हिस्से
हल किए गए उदाहरण
1. रॉकेट को ऑक्सीकारक साथ क्यों ले जाना पड़ता है, हवाई जहाज़ को क्यों नहीं?
ईंधन जलने के लिए ऑक्सीजन चाहिए। हवाई जहाज़ हवा से ऑक्सीजन लेता है। अंतरिक्ष में हवा नहीं, इसलिए रॉकेट को अपनी ऑक्सीजन साथ रखनी पड़ती है।
2. ISS लगभग 90 मिनट में पृथ्वी का एक चक्कर लगाता है। एक दिन में कितने चक्कर?
1 दिन = 24 × 60 = 1,440 मिनट। 1,440 ÷ 90 = 16 चक्कर।
3. TV उपग्रह आसमान में रुका हुआ दिखना चाहिए। कौन-सी कक्षा और क्यों?
भूस्थिर कक्षा, भूमध्य रेखा से 35,786 km ऊपर। यह 24 घंटे में एक चक्कर लगाता है, जितने में पृथ्वी घूमती है, इसलिए एक ही जगह के ऊपर रहता है और डिश घुमानी नहीं पड़ती।
4. एक यान बग़ल में 6 km/s, 9 km/s और 12 km/s से छोड़ा गया। हर बार क्या होगा?
6 km/s, 7.9 से कम — वापस गिरेगा। 9 km/s, 7.9 और 11.2 के बीच — कक्षा में (अंडाकार) घूमेगा। 12 km/s, 11.2 से ज़्यादा — पृथ्वी से निकल जाएगा।
5. अंतरिक्ष दौड़ और आज की अंतरिक्ष गतिविधि में दो अंतर बताओ।
अंतरिक्ष दौड़ (1957–1970 का दशक) में मुख्यतः दो विरोधी सरकारें थीं; आज बहुत से देश और निजी कंपनियाँ हैं। तब ज़्यादातर होड़ थी; आज सहयोग भी है, जैसे ISS।
आम गलतियाँ
- सोचना कि ISS पर गुरुत्व नहीं है। वहाँ गुरुत्व ज़मीन का लगभग 90% है; यात्री इसलिए तैरते हैं क्योंकि वे स्टेशन के साथ-साथ पृथ्वी के चारों ओर गिर रहे हैं।
- कहना कि रॉकेट हवा को धकेलता है। वह अपनी ही गैस को धकेलता है, इसीलिए ख़ाली अंतरिक्ष में भी चलता है।
- सोचना कि सारे उपग्रह एक ही ऊँचाई पर हैं। अलग काम के लिए अलग कक्षा चाहिए।
- मानना कि कोई देश चाँद पर दावा कर सकता है। अंतरराष्ट्रीय क़ानून कहता है कोई देश इसका मालिक नहीं।