पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान क्या है?
पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान वह है जो कोई समुदाय अपने आसपास के पर्यावरण के बारे में जानता है। लोग इसे सैकड़ों सालों में सीखते हैं। वे मौसम, पौधों और जीवों को देखते हैं। कुछ आज़माते हैं और जो काम करे, उसे रखते हैं।
यह बड़ों से छोटों तक कहानियों, गीतों, त्योहारों, नियमों और रोज़ के काम से पहुँचता है, किताबों से कम। इसे देशज ज्ञान या स्थानीय ज्ञान भी कहते हैं।
- यह स्थानीय है: एक जगह और उसकी जलवायु के लिए।
- यह समग्र है: लोग, ज़मीन, पानी और जीव एक ही तंत्र माने जाते हैं।
- यह जीवित है: हालात बदलें तो यह भी बदलता है।
प्रकृति बचाने वाली सामुदायिक परंपराएँ
पवित्र उपवन (देवबन)
जंगल के वे टुकड़े जो किसी स्थानीय देवता या पूर्वजों के नाम पर छोड़े जाते हैं। वहाँ पेड़ काटना मना है। भारत में ऐसे हज़ारों उपवन हैं (जैसे महाराष्ट्र में देवराई, केरल में कावु)। घाना जैसे देशों में भी हैं। ये दुर्लभ पौधों, झरनों और जीवों को बचाते हैं।
पेड़ों और जीवों की रक्षा
राजस्थान का बिश्नोई समुदाय हरे पेड़ काटने और जीवों को मारने से मना करने वाले नियम मानता है। चिपको आंदोलन (1970 का दशक, हिमालय) में गाँव वालों, ख़ासकर महिलाओं ने पेड़ों से लिपटकर उन्हें कटने से बचाया।
पानी बचाना
जोहड़, बावड़ी, तालाब (तमिलनाडु में एरी) और बाँस की नालियाँ (मेघालय) बारिश का पानी इकट्ठा करते हैं और भूजल भरते हैं।
प्रकृति के साथ खेती
खेत को आराम देना (परती), फ़सल चक्र और मिश्रित फ़सलें मिट्टी को स्वस्थ रखते हैं। अमेरिका महाद्वीप की "तीन बहनें" (मक्का, बीन्स, कद्दू) और अरुणाचल प्रदेश के आपातानी लोगों की धान-मछली खेती इसके उदाहरण हैं।
लेने के नियम
मछली पकड़ने या शिकार पर कुछ समय रोक, फ़सल का कुछ हिस्सा छोड़ना और छोटे जीवों को न मारना, इनसे संख्या बनी रहती है।
आज यह क्यों ज़रूरी है
जहाँ देशज लोग रहते हैं, वहाँ अक्सर प्रकृति अब भी समृद्ध है। यह ज्ञान जलवायु परिवर्तन (सूखे के शुरुआती संकेत), आपदा (ऑस्ट्रेलिया में बड़ी जंगल की आग रोकने के लिए धीमी आग) और नई दवाओं और फ़सलों में मदद करता है।
पर इस ज्ञान का सम्मान ज़रूरी है। दूसरे इसका उपयोग करें तो पहले समुदाय की सहमति लें और लाभ में उसे हिस्सा दें। जैव विविधता सम्मेलन और उसका नागोया प्रोटोकॉल (2010) यही कहते हैं।
सीमाएँ और परियोजना कैसे करें
हर पुरानी परंपरा आज के लिए सही नहीं होती। कुछ को विज्ञान से जाँचना पड़ता है, और पहले कुछ समूहों को फ़ैसलों से बाहर रखा गया था। सबसे अच्छा है दोनों साथ: स्थानीय ज्ञान + विज्ञान।
परियोजना के चरण: 1) अपने पास की एक परंपरा चुनें; 2) बुज़ुर्गों से बात करें और अनुमति लेकर लिखें; 3) पता करें यह क्या बचाती है और क्यों काम करती है; 4) विज्ञान क्या कहता है, देखें; 5) सुझाएँ कि यह कैसे जारी रहे; 6) बताने वालों को श्रेय दें।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान = स्थानीय + पीढ़ी दर पीढ़ी + लंबे समय से परखा
- चार रक्षित चीज़ें: पेड़ (देवबन), पानी, मिट्टी, मछली/जीव
- सही उपयोग = सम्मान + सहमति + लाभ में हिस्सा
- सबसे अच्छा = स्थानीय ज्ञान + विज्ञान
हल किए गए उदाहरण
1. एक गाँव में जंगल का ऐसा हिस्सा है जहाँ कोई पेड़ नहीं काटता क्योंकि वह स्थानीय देवता का है। इस परंपरा का नाम और एक लाभ बताइए।
यह पवित्र उपवन (देवबन) है। लाभ: दुर्लभ पौधे और जीव बचते हैं, और झरने साफ़ रहते हैं।
2. एक साल खेत को आराम देने से बाद में किसान को क्या फ़ायदा होता है?
मिट्टी में पोषक तत्व लौट आते हैं और कीट कम होते हैं। अगले साल कम खाद में बेहतर फ़सल होती है।
3. एक कंपनी किसी जनजाति के पौधों के ज्ञान से दवा बेचना चाहती है। पहले क्या होना चाहिए?
कंपनी समुदाय से सहमति ले और लाभ बाँटने (पैसा या दूसरी मदद) का समझौता करे, जैसा जैव विविधता के अंतरराष्ट्रीय नियम कहते हैं।
आम गलतियाँ
- यह मानना कि पारंपरिक ज्ञान अपने आप "अवैज्ञानिक" है। इसका बड़ा हिस्सा सदियों से परखा गया ध्यानपूर्ण अवलोकन है।
- यह मानना कि हर पुरानी परंपरा हमेशा सही है। कुछ को जाँचना या बदलना पड़ता है।
- समुदाय से पूछे या श्रेय दिए बिना उसका ज्ञान इस्तेमाल करना।
- यह मानना कि यह केवल भारत का है। हर महाद्वीप के समुदायों के पास ऐसा ज्ञान है।