आग्नेय चट्टान क्या है?
आग्नेय का अर्थ है 'आग से बना'। जब पिघली हुई चट्टान ठंडी होकर ठोस बनती है, तो आग्नेय चट्टान बनती है।
ज़मीन के अंदर पिघली चट्टान को मैग्मा कहते हैं। बाहर सतह पर आने पर वही लावा कहलाती है। पदार्थ एक ही है, बस जगह अलग है।
मैग्मा ठंडा होने पर उसके परमाणु एक क्रम में जुड़कर खनिजों के क्रिस्टल बनाते हैं, जैसे क्वार्ट्ज़, फ़ेल्डस्पार, अभ्रक (माइका), पाइरॉक्सीन और ओलिवीन। आग्नेय चट्टानों में परतें और जीवाश्म नहीं होते, क्योंकि वे कभी पूरी तरह पिघली थीं।
समुद्र की तली का ज़्यादातर हिस्सा और महाद्वीपों की गहरी परत आग्नेय चट्टानों से बनी है। ये चट्टान चक्र की शुरुआत भी हैं: अपक्षय से ये तलछट बनती हैं और ताप-दाब से कायांतरित चट्टान।
मैग्मा कैसे बनता है? (प्लेट सीमाओं पर मैग्मा)
मेंटल गरम है पर ज़्यादातर ठोस, क्योंकि ऊँचा दबाव उसे पिघलने नहीं देता। चट्टान तीन मुख्य तरीकों से पिघलती है:
- दबाव घटना: अपसारी सीमा (मध्य-महासागरीय कटक) और हवाई जैसे हॉट स्पॉट पर गरम मेंटल ऊपर उठता है, दबाव घटता है और वह पिघल जाता है। इससे कम सिलिका वाला बेसाल्टी मैग्मा बनता है।
- पानी मिलना: अधःपतन (सबडक्शन) क्षेत्र में नीचे धँसती समुद्री प्लेट ऊपर के मेंटल में पानी छोड़ती है। पानी गलनांक घटा देता है, चट्टान पिघलती है। इससे मध्यम सिलिका वाला एंडेसाइटी मैग्मा बनता है, जैसे एंडीज़ और जापान में।
- गर्मी मिलना: ऊपर उठता गरम मैग्मा महाद्वीपीय परत को ही पिघला सकता है। इससे ज़्यादा सिलिका वाला रायोलाइटी (ग्रेनाइटी) मैग्मा बनता है।
मैग्मा का बदलना: ठंडा होते मैग्मा में खनिज एक तय क्रम में जमते हैं। लोहे वाले गहरे खनिज (ओलिवीन, पाइरॉक्सीन) पहले जमकर नीचे बैठ जाते हैं। बचा हुआ द्रव सिलिका में ज़्यादा अमीर हो जाता है। इसे प्रभाजी क्रिस्टलन (fractional crystallisation) कहते हैं। आसपास की चट्टान घुलने से भी मैग्मा बदलता है।
अंतर्वेधी और बहिर्वेधी चट्टानें: ठंडा होने की गति और क्रिस्टल का आकार
क्रिस्टल का आकार बताता है कि मैग्मा कितनी जल्दी ठंडा हुआ।
- अंतर्वेधी (पातालीय) चट्टानें परत के अंदर हज़ारों-लाखों साल में धीरे ठंडी होती हैं। क्रिस्टल आँख से दिखने लायक बड़े होते हैं। उदाहरण: ग्रेनाइट (हल्का, ज़्यादा सिलिका), डायोराइट (मध्यम), गैब्रो (गहरा, कम सिलिका)। बड़े पिंड बैथोलिथ कहलाते हैं; परतों को काटती पट्टी डाइक और परतों के बीच फैली पट्टी सिल।
- बहिर्वेधी (ज्वालामुखीय) चट्टानें सतह पर घंटों से सालों में जल्दी ठंडी होती हैं। क्रिस्टल बहुत छोटे होते हैं। उदाहरण: बेसाल्ट, एंडेसाइट, रायोलाइट। लगभग तुरंत ठंडा हो तो क्रिस्टल नहीं बनते, काँच बनता है: ओब्सीडियन। गैस के बुलबुलों से भरा लावा प्यूमिस (झाँवा) बनता है।
- कुछ बड़े क्रिस्टल महीन पृष्ठभूमि में हों तो चट्टान पॉर्फ़िरिटिक है: पहले अंदर धीरे ठंडी हुई, फिर बाहर आकर जल्दी।
| सिलिका | अंतर्वेधी (धीरे) | बहिर्वेधी (जल्दी) |
|---|---|---|
| कम (गहरा रंग) | गैब्रो | बेसाल्ट |
| मध्यम | डायोराइट | एंडेसाइट |
| ज़्यादा (हल्का रंग) | ग्रेनाइट | रायोलाइट, ओब्सीडियन, प्यूमिस |
मैग्मा के प्रकार, उद्गार के प्रकार और ज्वालामुखीय स्थलरूप
श्यानता (viscosity) यानी द्रव कितना गाढ़ा है (शहद पानी से ज़्यादा श्यान है)। सिलिका की कड़ियाँ मैग्मा को गाढ़ा बनाती हैं।
- बेसाल्टी मैग्मा (लगभग 45–52% सिलिका, 1000–1200 °C): पतला। गैस आसानी से निकलती है, उद्गार शांत होता है, लावा दूर तक बहता है। चौड़े, कम ढलान वाले शील्ड ज्वालामुखी (मौना लोआ, हवाई) और लावा पठार (दक्कन ट्रैप) बनते हैं।
- एंडेसाइटी मैग्मा (52–63% सिलिका): मध्यम। लावा और राख बारी-बारी निकलते हैं, खड़ी ढलान वाले परतदार मिश्रित (स्ट्रैटो) ज्वालामुखी बनते हैं, जैसे माउंट फ़ूजी।
- रायोलाइटी मैग्मा (63% से ज़्यादा सिलिका, 700–850 °C): बहुत गाढ़ा। गैस फँसी रहती है, फिर राख, प्यूमिस और पायरोक्लास्टिक प्रवाह (गरम गैस-चट्टान के तेज़ बादल) के साथ विस्फोट होता है। लावा गुंबद या विशाल धँसा हुआ गड्ढा काल्डेरा बन सकता है (येलोस्टोन)।
अन्य स्थलरूप: ढीले टुकड़ों से बने छोटे सिंडर शंकु, शंकु घिसने के बाद बचा ज्वालामुखी गर्दन, और पानी के नीचे बना तकिया लावा।
करके देखो: घर पर क्रिस्टल बढ़ाओ
गरम पानी के कप में जितनी हो सके उतनी चीनी या नमक घोलो (किसी बड़े की मदद लो)। आधा घोल एक तश्तरी में गरम, शांत जगह पर कई दिन धीरे सूखने दो। बाकी आधा फ़्रिज या हवादार जगह पर जल्दी सूखने दो। आवर्धक लेंस से देखो: धीरे सूखने पर बड़े क्रिस्टल बनते हैं, बिल्कुल अंतर्वेधी चट्टान की तरह। 3D में स्लाइडर को 'गहराई' और फिर 'सतह' पर करो और क्रिस्टल घन को बदलते देखो।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- आग्नेय चट्टान = ठंडा होकर जमा मैग्मा या लावा
- धीरे ठंडा (गहराई में) → बड़े क्रिस्टल → अंतर्वेधी / पातालीय
- जल्दी ठंडा (सतह पर) → छोटे क्रिस्टल या काँच → बहिर्वेधी / ज्वालामुखीय
- ज़्यादा सिलिका → हल्का रंग, गाढ़ा मैग्मा, कम तापमान, ज़्यादा विस्फोटक
- गैब्रो ↔ बेसाल्ट (कम सिलिका); डायोराइट ↔ एंडेसाइट; ग्रेनाइट ↔ रायोलाइट (ज़्यादा सिलिका)
- दबाव घटा (कटक, हॉट स्पॉट) → बेसाल्टी; सबडक्शन का पानी → एंडेसाइटी; पिघली परत → रायोलाइटी
हल किए गए उदाहरण
1. एक चट्टान में क्वार्ट्ज़ और फ़ेल्डस्पार के हल्के रंग के लगभग 5 mm के क्रिस्टल हैं। नाम बताओ और कैसे बनी?
बड़े क्रिस्टल = अंदर धीरे ठंडा होना, यानी अंतर्वेधी। हल्का रंग और क्वार्ट्ज़ = ज़्यादा सिलिका। यह ग्रेनाइट है, जो सिलिका-समृद्ध मैग्मा के परत के अंदर धीरे ठंडा होने से बना।
2. समुद्र की तली ज़्यादातर बेसाल्ट की क्यों है?
मध्य-महासागरीय कटक पर प्लेटें दूर हटती हैं, मेंटल ऊपर उठता है और दबाव घटने से पिघलता है। इससे कम सिलिका वाला बेसाल्टी मैग्मा बनता है, जो ठंडे पानी में जल्दी ठंडा होकर महीन बेसाल्ट (अक्सर तकिया लावा) बनाता है।
3. ज्वालामुखी A की ढलान कम है और लावा दूर तक बहा; B खड़ा है और उसमें राख वाले तेज़ विस्फोट हुए। मैग्मा की तुलना करो।
A में कम सिलिका वाला, गरम, पतला बेसाल्टी मैग्मा है; गैस निकल जाती है, शांत उद्गार, शील्ड ज्वालामुखी। B में ज़्यादा सिलिका वाला, कम गरम, गाढ़ा मैग्मा है; गैस फँसती है, दबाव बढ़ता है, विस्फोट होता है, खड़ा मिश्रित ज्वालामुखी बनता है।
4. एक गहरे रंग की चट्टान में महीन पृष्ठभूमि के बीच कुछ बड़े हरे ओलिवीन क्रिस्टल हैं। इससे क्या पता चलता है?
यह पॉर्फ़िरिटिक है। बड़े क्रिस्टल पहले अंदर धीरे ठंडा होते समय बने; फिर मैग्मा बाहर आया और बाकी हिस्सा जल्दी ठंडा होकर महीन बना। गहरा रंग और ओलिवीन = कम सिलिका, यानी पॉर्फ़िरिटिक बेसाल्ट।
आम गलतियाँ
- मैग्मा और लावा को अलग पदार्थ समझना। दोनों एक ही पिघली चट्टान हैं: अंदर मैग्मा, बाहर लावा।
- क्रिस्टल का आकार उल्टा याद करना: धीरे ठंडा = बड़े क्रिस्टल, जल्दी ठंडा = छोटे क्रिस्टल या काँच।
- पूरे मेंटल को द्रव मान लेना। वह ज़्यादातर ठोस है; सिर्फ़ वहाँ पिघलता है जहाँ दबाव घटे, पानी मिले या गर्मी बढ़े।
- पतले लावे को सबसे खतरनाक मानना। गाढ़ा, ज़्यादा सिलिका वाला मैग्मा गैस फँसाने के कारण आमतौर पर ज़्यादा विस्फोटक होता है।