National Year 10 Business
अध्याय: 4
1. 3.1 Business in the real world
3.1.1 Purpose and nature of business · 3.1.2 Business ownership · 3.1.3 Business aims and objectives · 3.1.4 Stakeholders · 3.1.5 Business location · 3.1.6 Business planning · 3.1.7 Expanding a business
- व्यवसाय का उद्देश्य और प्रकृति – व्यवसाय ग्राहकों को वस्तुएँ (चीज़ें) या सेवाएँ (काम) देता है जिनकी उन्हें ज़रूरत या चाह है, आमतौर पर लाभ के लिए। लोग लाभ, आज़ादी, बाज़ार की किसी कमी को पूरा करने या दूसरों की मदद के लिए व्यवसाय शुरू करते हैं। हर व्यवसाय चार उत्पादन साधन लगाता है: भूमि, श्रम, पूँजी और उद्यम। साधन सीमित हैं, इसलिए हर चुनाव की अवसर लागत होती है: छोड़ा गया अगला सबसे अच्छा विकल्प। व्यवसाय प्राथमिक (कच्चा माल), द्वितीयक (निर्माण) और तृतीयक (सेवा) क्षेत्र में होते हैं। उद्यमी साधन जोड़ता और जोखिम उठाता है; इनाम है लाभ। लक्ष्य हैं: टिके रहना, लाभ, विस्तार, बाज़ार हिस्सा, ग्राहक संतुष्टि और सामाजिक-नैतिक लक्ष्य, जो दुनिया बदलने के साथ बदलते हैं।
- व्यवसाय स्वामित्व के प्रकार – एकल व्यापारी का मालिक एक व्यक्ति है: शुरू करना आसान, सारा लाभ अपना, पर असीमित दायित्व और कम पैसा। साझेदारी में दो या ज़्यादा मालिक पैसा, हुनर, फ़ैसले और लाभ बाँटते हैं, आमतौर पर समझौते (डीड) के साथ, और दायित्व प्रायः असीमित होता है। लिमिटेड कंपनियों के मालिक शेयरधारक हैं और दायित्व सीमित है: वे सिर्फ़ लगाया पैसा खो सकते हैं। प्राइवेट लिमिटेड शेयर निजी तौर पर (परिवार, दोस्त) बेचती है; पब्लिक लिमिटेड स्टॉक एक्सचेंज पर जनता को शेयर बेचती है, बहुत पैसा जुटा सकती है पर खाते सार्वजनिक करने पड़ते हैं और टेकओवर का ख़तरा है। ग़ैर-लाभकारी संस्थाएँ बची रक़म अपने उद्देश्य पर लगाती हैं। ढाँचा आकार, जोखिम, ज़रूरी पैसे और नियंत्रण देखकर चुना जाता है।
- व्यवसाय के लक्ष्य और उद्देश्य – लक्ष्य (aim) एक सामान्य इच्छा है; उद्देश्य (objective) एक साफ़, मापने लायक निशाना है जिसकी समय-सीमा हो। मिशन बताता है कि व्यवसाय क्यों है। आम उद्देश्य हैं: बने रहना, लाभ, विकास और बाज़ार हिस्सा। नई कंपनी पहले टिकना चाहती है; जमी हुई कंपनी लाभ और विकास चाहती है। आकार, अर्थव्यवस्था, प्रतियोगिता और मालिकों की इच्छा के साथ उद्देश्य बदलते हैं। सफलता सिर्फ़ लाभ से नहीं, ग्राहक संतोष, कर्मचारियों की भलाई और पर्यावरण से भी मापी जाती है।
- व्यवसाय के हितधारक – हितधारक (stakeholder) वह व्यक्ति या समूह है जिस पर व्यवसाय का असर पड़ता है या जो व्यवसाय पर असर डाल सकता है। आंतरिक हितधारक (मालिक, प्रबंधक, कर्मचारी) कंपनी के अंदर होते हैं; बाहरी (ग्राहक, आपूर्तिकर्ता, स्थानीय समुदाय, सरकार, ऋणदाता) बाहर। हर समूह कुछ अलग चाहता है, इसलिए एक फ़ैसला किसी को खुश और किसी को नाराज़ करता है: यही टकराव है। कंपनियाँ शक्ति और रुचि के आधार पर मानचित्रण करती हैं और बातचीत व सलाह से संबंध सँभालती हैं।
- व्यवसाय की स्थिति (स्थान) – स्थिति वह जगह है जहाँ व्यवसाय चलता है। सही जगह लागत घटाती है और ग्राहक लाती है। मुख्य कारक हैं: बाज़ार (ग्राहकों) के पास होना, श्रम (सही कौशल वाले लोग, उचित मज़दूरी), कच्चा माल, परिवहन, ज़मीन-किराया-मज़दूरी की लागत, और पास के प्रतियोगी। दुकानें और सेवाएँ ग्राहकों के पास; भारी और वज़न घटाने वाले उद्योग कच्चे माल के पास। ऑनलाइन कंपनियाँ ज़्यादा आज़ाद हैं, पर उन्हें भी सस्ती जगह, इंटरनेट और डिलीवरी चाहिए।
- बिज़नेस प्लान: नया व्यवसाय कैसे प्लान करें – बिज़नेस प्लान (व्यवसाय योजना) एक लिखित दस्तावेज़ है। इसमें लिखा होता है कि व्यवसाय क्या बेचेगा, ग्राहक कौन हैं, उन तक कैसे पहुँचेंगे, कौन चलाएगा और पैसे का हिसाब कैसा होगा। मालिक इससे साफ़ सोच पाता है, खतरे पहले देख लेता है, और बैंक या निवेशक को पैसा देने के लिए राज़ी कर पाता है। आम तौर पर इसके हिस्से हैं: सार (एग्ज़ीक्यूटिव समरी), विचार और लक्ष्य, बाज़ार अनुसंधान, प्रतियोगी, मार्केटिंग (4 P), संचालन और टीम, और वित्त। वित्त में कुछ आसान हिसाब हैं। स्थिर लागत बिक्री से नहीं बदलती (किराया)। परिवर्ती लागत हर इकाई के साथ बढ़ती है (कच्चा माल)। कुल लागत = स्थिर + परिवर्ती। आय = कीमत × बिक्री। लाभ = आय − कुल लागत (उत्तर ऋण में हो तो हानि)। ब्रेक-ईवन बिंदु = स्थिर लागत ÷ (कीमत − प्रति इकाई परिवर्ती लागत)। योजना भविष्य का अनुमान है, इसलिए इसे बार-बार जाँचना और बदलना चाहिए।
- व्यवसाय का विकास और पैमाने की मितव्ययिता – कंपनी आंतरिक रूप से (नई दुकानें, ऑनलाइन बिक्री, फ़्रैंचाइज़िंग, आउटसोर्सिंग) या बाहरी रूप से (विलय, अधिग्रहण) बढ़ती है। बढ़ने से औसत इकाई लागत (कुल लागत ÷ उत्पादन) पैमाने की मितव्ययिता से घटती है: क्रय (थोक छूट) और तकनीकी (बड़ी, अच्छी मशीनें)। बहुत बड़ी होने पर अमितव्ययिता आती है: संचार, तालमेल और प्रेरणा की कमी से लागत फिर बढ़ती है। तब कुछ कंपनियाँ छँटनी (retrenchment) करके छोटी होती हैं।
2. 3.2 Influences on business
3.2.1 Technology · 3.2.2 Ethical and environmental considerations · 3.2.3 The economic climate · 3.2.4 Globalisation · 3.2.5 Legislation · 3.2.6 Competitive environment
- ई-व्यवसाय: अर्थ, क्षेत्र और लाभ – ई-व्यवसाय का अर्थ है व्यवसाय की सारी गतिविधियाँ (ख़रीद, बिक्री, उत्पादन, वित्त, कर्मचारी, आपूर्ति) कंप्यूटर नेटवर्क और इंटरनेट से करना। ई-कॉमर्स, यानी ऑनलाइन ख़रीद-बिक्री, इसका सिर्फ़ एक हिस्सा है। इसके क्षेत्र हैं B2B, B2C, C2C और इंट्रा-B। यह शुरू करने में सस्ता, 24 × 7 खुला, तेज़ और वैश्विक है, पर इसमें मानवीय संपर्क कम है और सुरक्षा का जोखिम है।
- व्यवसाय में नैतिक और पर्यावरणीय विचार – नैतिकता यानी जो सही है वह करना। व्यवसाय को अक्सर चुनना पड़ता है: सस्ता रास्ता ज़्यादा लाभ देता है, उचित रास्ता ज़्यादा लागत माँगता है। व्यवसाय प्रदूषण, कचरे और सड़कों पर भीड़-जाम से पर्यावरण पर असर डालते हैं। पुनर्चक्रण, कम पैकिंग और डिलीवरी की योजना से नुकसान घटता है। टिकाऊपन (sustainability) यानी सीमित संसाधनों को उतनी ही तेज़ी से इस्तेमाल करना जितनी तेज़ी से वे वापस बनें। नैतिक और हरित फ़ैसले अभी लागत बढ़ाते हैं, पर आगे भरोसा, वफ़ादार ग्राहक और लाभ दिला सकते हैं।
- आर्थिक माहौल और व्यवसाय – आर्थिक माहौल यानी पूरी अर्थव्यवस्था कैसी चल रही है। व्यवसाय के लिए तीन चीज़ें सबसे अहम हैं। ब्याज दर: उधार की कीमत। यह बढ़े तो कर्ज़ महँगा, लोग और कंपनियाँ कम उधार लेते और कम ख़र्च करते हैं, बिक्री घटती है; घटे तो उल्टा। रोज़गार: ज़्यादा नौकरियाँ यानी ज़्यादा आय और ख़र्च; बेरोज़गारी बढ़े तो ख़र्च घटता है पर कर्मचारी आसानी से मिलते हैं। उपभोक्ता ख़र्च: आय और भरोसे पर निर्भर; आय घटने पर ज़रूरी चीज़ें टिकी रहती हैं, विलासिता पर सबसे ज़्यादा मार पड़ती है।
- अंतरराष्ट्रीय व्यवसाय – अंतरराष्ट्रीय व्यवसाय वह हर व्यावसायिक काम है जो देश की सीमा पार करता है: वस्तुओं और सेवाओं का व्यापार, लाइसेंसिंग, फ़्रैंचाइज़िंग, संयुक्त उद्यम और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI)। कंपनियाँ नए ग्राहक, सस्ता कच्चा माल और विकास पाने विदेश जाती हैं, पर जोखिम भी झेलती हैं: विनिमय दर में बदलाव, व्यापार बाधाएँ (टैरिफ़, कोटा, प्रतिबंध), सीमा-शुल्क के नियम, राजनीतिक-आर्थिक जोखिम और संस्कृति का फ़र्क़, जिसकी वजह से उत्पाद और बातचीत बदलनी पड़ सकती है। व्यापार समझौते और संगठन बाधाएँ घटाते हैं और देशों को एक-दूसरे पर निर्भर बनाते हैं; तकनीक और ई-कॉमर्स से छोटी कंपनियाँ भी दुनिया भर में बेच पाती हैं।
- व्यापार कानून: हर व्यापार को मानने वाले नियम – व्यापार कानून वे नियम हैं जो सरकार बनाती है और अदालतें लागू करती हैं, और जिन्हें हर व्यापार को मानना पड़ता है। ये तय करते हैं कि व्यापार का कानूनी रूप क्या है और उसका कर्ज़ कौन भरेगा (दायित्व), कोई वादा कब अनुबंध बनता है, कर्मचारियों के साथ कैसा व्यवहार हो (मज़दूरी, बराबरी, सुरक्षा), ग्राहक क्या माँग सकता है (ठीक चलने वाला और बताए जैसा सामान), और झगड़े कैसे सुलझें।
- प्रतिस्पर्धी वातावरण: प्रतिद्वंद्वी, जोखिम और पाँच बल – प्रतिस्पर्धी वातावरण वह बाज़ार है जो व्यवसाय अपने प्रतिद्वंद्वियों के साथ बाँटता है। फ़र्म प्रतिद्वंद्वियों की ताक़त और कमज़ोरी (कीमत, गुणवत्ता, सेवा, जगह, ब्रांड) परखकर अपनी बढ़त खोजती है। हर व्यवसाय के सामने जोखिम होता है, जिसकी संभावना का अंदाज़ा लग सकता है, और अनिश्चितता, जिसका नहीं लग सकता। उद्यमी संभावित इनाम के लिए जोखिम उठाते हैं: लाभ, आज़ादी और गर्व। पोर्टर के पाँच बल बताते हैं कि उद्योग में कितना लाभ संभव है: आपसी होड़, नए प्रवेशकों का ख़तरा, विकल्पों का ख़तरा, आपूर्तिकर्ताओं की ताक़त और ख़रीदारों की ताक़त। बल जितने तेज़, लाभ उतना कम।
3. 3.3 Business operations
3.3.1 Production processes · 3.3.2 Procurement · 3.3.3 Quality · 3.3.4 Customer service
- उत्पादन के तरीके – कंपनी कितनी चीज़ें बनानी हैं, उसी से तरीका चुनती है। एकल (जॉब) उत्पादन ऑर्डर पर एक चीज़ बनाता है; बैच उत्पादन एक-जैसी चीज़ों का समूह बनाकर फिर बदलता है; मास (फ़्लो) उत्पादन पट्टी पर बहुत बड़ी गिनती बनाता है; सतत उत्पादन बिना रुके चलता है। लीन उत्पादन और जस्ट-इन-टाइम बर्बादी और स्टॉक घटाते हैं। गुणवत्ता नियंत्रण हर चीज़ को लक्ष्य माप और टॉलरेंस (जैसे 50 ± 0.5 mm) से जाँचता है, और गुणवत्ता आश्वासन हर चरण में गुणवत्ता डालता है।
- आपूर्ति शृंखला और क्रय: आपूर्तिकर्ता, स्टॉक नियंत्रण और JIT – आपूर्ति शृंखला (supply chain) वे सभी व्यवसाय और कदम हैं जो किसी उत्पाद को कच्चे माल से अंतिम ग्राहक तक पहुँचाते हैं। माल आगे बढ़ता है; पैसा और जानकारी (ऑर्डर) पीछे जाते हैं। क्रय (procurement) यानी सही कीमत, गुणवत्ता और समय पर सही माल ख़रीदना। आपूर्तिकर्ता कीमत, गुणवत्ता, भरोसे और लचीलेपन पर चुने जाते हैं। स्टॉक के लिए या तो बफ़र स्टॉक रखते हैं (सुरक्षित पर महँगा) या जस्ट-इन-टाइम अपनाते हैं (भंडारण सस्ता पर देरी होने पर जोखिम)। पुनः आदेश स्तर = रोज़ का उपयोग × डिलीवरी समय + बफ़र स्टॉक। लॉजिस्टिक्स माल को सही जगह समय पर पहुँचाता है; आउटसोर्सिंग में काम दूसरी कंपनी को दिया जाता है।
- व्यवसाय में गुणवत्ता प्रबंधन – गुणवत्ता का मतलब है कि वस्तु या सेवा अपना काम ठीक करे और ग्राहक की उम्मीद पूरी करे। कंपनियाँ गुणवत्ता तीन तरह से संभालती हैं: अंत में बने माल की जाँच (गुणवत्ता नियंत्रण), हर चरण पर जाँच (गुणवत्ता आश्वासन), और हर कर्मचारी से छोटे लगातार सुधार (TQM और काइज़ेन)। अच्छी गुणवत्ता से बिक्री और नाम बढ़ते हैं और बर्बादी घटती है, पर इसमें पैसा और प्रशिक्षण लगता है।
- ग्राहक सेवा: ग्राहक को ख़ुश रखना – ग्राहक सेवा वह सारी मदद है जो व्यवसाय ग्राहक को ख़रीदने से पहले, ख़रीदते समय और बाद में देता है। अच्छी सेवा यानी मुस्कुराकर स्वागत, जल्दी जवाब, उत्पाद की सही जानकारी, परामर्श में ध्यान से सुनना, और बिक्री के बाद डिलीवरी, मरम्मत, गारंटी और वापसी की मदद। शिकायत ठीक से संभालें तो नाराज़ ग्राहक भी वफ़ादार बन सकता है। अच्छी सेवा से ग्राहक लौटते हैं, अच्छी समीक्षाएँ मिलती हैं और व्यवसाय ज़्यादा दाम ले सकता है; ख़राब सेवा ग्राहक और साख दोनों खोती है।
4. 3.4 Human resources
3.4.1 Organisational structures · 3.4.2 Recruitment and selection · 3.4.3 Motivating employees · 3.4.4 Training
- संगठन संरचना: पदानुक्रम, नियंत्रण का विस्तार और प्रत्यायोजन – संगठन संरचना बताती है कि कौन किसका प्रभारी है। पदानुक्रम अधिकार के स्तर हैं; आदेश की शृंखला वह रास्ता है जिससे आदेश नीचे और रिपोर्ट ऊपर जाती है। नियंत्रण का विस्तार यानी एक प्रबंधक को सीधे रिपोर्ट करने वाले लोगों की संख्या। ऊँची संरचना में कई स्तर और संकरा विस्तार होता है; समतल में कम स्तर और चौड़ा विस्तार। प्रत्यायोजन में काम और उसका अधिकार नीचे सौंपा जाता है। केंद्रीकृत व्यवसाय में बड़े निर्णय ऊपर होते हैं; विकेंद्रीकृत में स्थानीय प्रबंधकों तक बँटते हैं। संरचना तय करती है कि संचार कितनी जल्दी और साफ़ पहुँचता है।
- भर्ती और चयन (Recruitment and Selection) – भर्ती का मतलब है रिक्त पद के लिए लोगों को ढूँढना और उनसे आवेदन करवाना। चयन का मतलब है आवेदकों में से सबसे अच्छे व्यक्ति को चुनना। फ़र्म पहले कार्य विवरण (काम क्या है) और व्यक्ति विवरण (कैसा व्यक्ति चाहिए) लिखती है। भर्ती आंतरिक (फ़र्म के अंदर से) या बाहरी (बाहर से) हो सकती है। फिर आवेदन या CV, छँटाई, साक्षात्कार, परीक्षा या काम और संदर्भ जाँच से चयन होता है, और पूर्णकालिक, अंशकालिक, शून्य घंटे या अस्थायी अनुबंध दिया जाता है।
- निर्देशन: लोगों से उनका सबसे अच्छा काम करवाना – निर्देशन प्रबंध का वह काम है जिसमें लोगों को राह दिखाई जाती है, प्रेरित किया जाता है, नेतृत्व दिया जाता है और बात समझाई जाती है। इसके चार तत्व हैं: पर्यवेक्षण, अभिप्रेरणा, नेतृत्व और संप्रेषण। मैस्लो बताते हैं कि ज़रूरतें पाँच सीढ़ियों में आती हैं। प्रोत्साहन मौद्रिक या अमौद्रिक होते हैं। नेता निरंकुश, लोकतांत्रिक या निर्बाध हो सकता है। संप्रेषण औपचारिक या अनौपचारिक होता है, और उसकी बाधाएँ आसान उपायों से हटती हैं।
- नियुक्तिकरण: भर्ती, चयन और प्रशिक्षण – नियुक्तिकरण का मतलब है पदों को सही लोगों से भरना और उन्हें कुशल बनाए रखना। यह मानव संसाधन प्रबंधन का भाग है। इसकी प्रक्रिया मानव शक्ति के अनुमान से शुरू होकर भर्ती, चयन, स्थापन, प्रशिक्षण, मूल्यांकन, पदोन्नति और पारिश्रमिक तक जाती है। भर्ती आंतरिक या बाहरी स्रोतों से आवेदक लाती है। चयन परीक्षा, साक्षात्कार और जाँच से सबसे अच्छे को चुनता है। प्रशिक्षण कार्य पर (प्रवेश, शिक्षुता, इंटर्नशिप, कोचिंग) या कार्य से पृथक (प्रकोष्ठ, कक्षा, केस स्टडी) होता है।