आंतरिक (जैविक) विकास
आंतरिक विकास में कंपनी अपने संसाधनों, प्रायः अपने लाभ से बढ़ती है।
- नई दुकानें या कारखाने: नए शहरों में शाखाएँ।
- ई-कॉमर्स: ऑनलाइन बेचकर दूर के ग्राहकों तक, कभी भी।
- फ़्रैंचाइज़िंग: दूसरे लोग फ़ीस और रॉयल्टी देकर आपकी दुकान जैसी दुकान खोलें।
- आउटसोर्सिंग: कुछ काम (डिलीवरी, सफ़ाई, कॉल सेंटर) दूसरी कंपनी से करवाना, ताकि मुख्य काम बढ़े।
- नए उत्पाद या नए बाज़ार (विदेश भी)।
फ़ायदा: कम जोखिम, नियंत्रण मालिक के पास। नुकसान: धीमा, लाभ जितना ही।
बाहरी विकास: विलय और अधिग्रहण
बाहरी विकास दूसरी कंपनियों से जुड़कर होता है। तेज़ है पर जोखिम भरा।
- विलय (merger): दो कंपनियाँ सहमति से मिलकर एक बनती हैं।
- अधिग्रहण (takeover): एक कंपनी दूसरी के 50% से ज़्यादा शेयर ख़रीदकर उस पर नियंत्रण पाती है।
प्रकार: क्षैतिज (एक ही उद्योग, एक ही चरण), ऊर्ध्वाधर (आपूर्तिकर्ता या विक्रेता के साथ), समूह (असंबंधित)।
फ़ायदे: तेज़ विकास, बड़ा बाज़ार हिस्सा, नए कौशल और ग्राहक, मितव्ययिता। समस्याएँ: ख़रीदने की लागत, संस्कृतियों का टकराव, नौकरियाँ जाना, सँभालना कठिन।
औसत इकाई लागत और पैमाने की मितव्ययिता
औसत इकाई लागत = कुल लागत ÷ बनी इकाइयाँ। यानी एक चीज़ बनाने की लागत।
पैमाने की मितव्ययिता (economies of scale) वे बचतें हैं जो बढ़ने से मिलती हैं, जिससे औसत लागत घटती है:
- क्रय मितव्ययिता: थोक में ख़रीदने पर आपूर्तिकर्ता छूट देते हैं।
- तकनीकी मितव्ययिता: बड़ी कंपनी बड़ी, तेज़, आधुनिक मशीनें ले सकती है जिनसे हर इकाई सस्ती बनती है।
- अन्य: बड़ी कंपनी को सस्ता ऋण (वित्तीय), प्रति इकाई कम विज्ञापन लागत (विपणन), विशेषज्ञ प्रबंधक (प्रबंधकीय)।
कम औसत लागत से कंपनी कम दाम पर भी लाभ कमा सकती है।
पैमाने की अमितव्ययिता और छँटनी
अमितव्ययिता (diseconomies of scale) तब होती है जब कंपनी बहुत बड़ी होकर औसत लागत बढ़ने लगती है:
- ख़राब संचार: संदेश कई परतों से गुज़रकर धीमे या उलझे हो जाते हैं।
- ख़राब तालमेल: कई विभागों और जगहों को साथ चलाना कठिन।
- कम प्रेरणा: कर्मचारी ख़ुद को बड़ी मशीन का छोटा पुर्ज़ा मानने लगते हैं।
इसलिए औसत लागत वक्र U आकार का है: घटता है, सबसे नीचे पहुँचता है, फिर बढ़ता है।
छँटनी (retrenchment) यानी कंपनी का आकार घटाना: शाखाएँ बंद करना, कर्मचारी घटाना या कुछ हिस्से बेचना, ताकि लागत घटे।
करके देखें
3D में उत्पादन 100 से 2,000 तक स्लाइड करें और 100, 500, 1,000, 2,000 पर औसत लागत लिखें। सबसे कम कहाँ है? घर पर: एक ही बिस्कुट के छोटे और बड़े पैकेट का प्रति 100 ग्राम दाम निकालें। बड़ा पैकेट प्रति ग्राम सस्ता क्यों है?
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- औसत इकाई लागत = कुल लागत ÷ उत्पादन (इकाइयाँ)
- कुल लागत = औसत इकाई लागत × उत्पादन
- मितव्ययिता → उत्पादन बढ़ने पर औसत लागत घटे
- अमितव्ययिता → बहुत बड़ी होने पर औसत लागत बढ़े
- आंतरिक = अपने दम पर विकास; विलय/अधिग्रहण = बाहरी विकास
हल किए गए उदाहरण
1. 3,000 इकाइयों की कुल लागत ₹60,000 है। औसत इकाई लागत?
60,000 ÷ 3,000 = ₹20 प्रति इकाई।
2. पहले 500 इकाइयाँ $4,000 में, बढ़ने के बाद 2,000 इकाइयाँ $10,000 में। दोनों औसत लागत निकालें। क्या यह मितव्ययिता है?
पहले $8, बाद में $5। औसत लागत घटी, इसलिए हाँ।
3. 1 टन से ज़्यादा आटे पर 15% छूट। आटा ₹40/किग्रा है। थोक दाम और मितव्ययिता का प्रकार?
₹40 × 0.85 = ₹34/किग्रा। क्रय मितव्ययिता।
4. 10,000 इकाइयों पर औसत लागत ₹12 और 15,000 पर ₹14। क्या हो रहा है? एक कारण।
उत्पादन बढ़ने पर औसत लागत बढ़ी: अमितव्ययिता। कारण: बहुत प्रबंधकों के बीच ख़राब संचार।
5. एक कैफ़े चेन अपने लाभ से 5 नए कैफ़े खोलती है और ऑनलाइन ऑर्डर शुरू करती है। कौन-सा विकास?
आंतरिक विकास: नई शाखाएँ और ई-कॉमर्स, अपने लाभ से।
6. स्थिर लागत ₹50,000, हर इकाई की लागत ₹30। 1,000 और 5,000 इकाइयों पर औसत लागत?
1,000 पर: (50,000 + 30,000) ÷ 1,000 = ₹80। 5,000 पर: (50,000 + 1,50,000) ÷ 5,000 = ₹40। स्थिर लागत ज़्यादा इकाइयों में बँटने से औसत घटी।
आम गलतियाँ
- मानना कि मितव्ययिता से कुल लागत घटती है। कुल लागत प्रायः बढ़ती है; प्रति इकाई लागत घटती है।
- अधिग्रहण को आंतरिक विकास कहना। दूसरी कंपनी ख़रीदना बाहरी विकास है।
- मानना कि बड़ा हमेशा सस्ता है। एक हद के बाद अमितव्ययिता लागत बढ़ाती है।
- क्रय और तकनीकी मितव्ययिता मिलाना: थोक ख़रीद = क्रय; बेहतर मशीन = तकनीकी।