Netherlands HAVO 5 (eindexamenjaar) Economics
अध्याय: 4
1. Cooperation and bargaining
Game theory · Cooperating and bargaining · Market failure in games
- खेल सिद्धांत: जब दूसरे भी चुनें, तब सबसे अच्छा फ़ैसला – खेल सिद्धांत (game theory) ऐसे फ़ैसलों का अध्ययन है जिनमें आपका नतीजा दूसरों के चुनाव पर भी निर्भर हो। पे-ऑफ़ मैट्रिक्स हर चुनाव-जोड़ी पर हर खिलाड़ी का लाभ दिखाता है। अधीन (dominated) रणनीति हमेशा बदतर होती है, उसे हटा दो। नैश संतुलन वह जोड़ी है जहाँ कोई खिलाड़ी अकेले बदलकर फ़ायदा नहीं ले सकता; कैदी की दुविधा दिखाती है कि यह सबके लिए सहयोग से बुरा भी हो सकता है। शून्य-योग खेल में सुरक्षित (मैक्सिमिन/मिनिमैक्स) रणनीतियाँ बराबर हों तो सैडल बिंदु मिलता है; नहीं तो खिलाड़ी मिश्रित रणनीति अपनाते हैं, जो ग्राफ़ की निचली किनारी के सबसे ऊँचे बिंदु से मिलती है।
- बाज़ार विफलता (Market Failure) – जब खुला बाज़ार अपने-आप समाज के लिए सबसे अच्छा नतीजा नहीं देता, तो उसे बाज़ार विफलता कहते हैं। कुछ चीज़ें ज़रूरत से ज़्यादा बनती हैं (प्रदूषण, सिगरेट) और कुछ कम (स्ट्रीट लाइट, टीके, शिक्षा)। मुख्य कारण: बाहरी प्रभाव, सार्वजनिक वस्तुएँ, मेरिट और डिमेरिट वस्तुएँ, अधूरी जानकारी, बाज़ार शक्ति और असमानता। सरकार कर, सब्सिडी, नियम, सीधी सेवा और जानकारी से इसे सुधारती है, पर सरकार भी चूक सकती है।
2. Risk and information
Risk and insurance · Asymmetric information · Risk and interest
- बीमा: सिद्धांत और प्रकार – बीमा कुछ लोगों के नुकसान को उन बहुत से लोगों में बाँट देता है जो एक साझा कोष में छोटा प्रीमियम देते हैं। यह छह सिद्धांतों पर चलता है: परम सद्विश्वास, बीमा-योग्य हित, क्षतिपूर्ति, अंशदान, प्रत्यासन और निकटतम कारण (साथ में हानि कम करना)। मुख्य प्रकार हैं जीवन, स्वास्थ्य, अग्नि और समुद्री बीमा।
- असमान सूचना: जब एक पक्ष ज़्यादा जानता है – सूचना तब असमान (असममित) होती है जब सौदे के एक पक्ष को दूसरे से ज़्यादा पता हो। पुरानी कार का विक्रेता कार की ख़राबियाँ जानता है, ख़रीदार नहीं। बीमा लेने वाला अपनी आदतें बीमा कंपनी से बेहतर जानता है। जानकारी जुटाने में पैसा और समय लगता है (लेन-देन की लागत), इसलिए कुछ जानकारी छिपी रह जाती है। सौदे से पहले छिपी जानकारी प्रतिकूल चयन (adverse selection) पैदा करती है: ख़रीदार औसत दाम ही दे पाता है, अच्छे विक्रेता चले जाते हैं और बाज़ार में घटिया माल बचता है। सौदे के बाद छिपा व्यवहार नैतिक जोखिम (moral hazard) पैदा करता है: जब नुक़सान कोई और भरता है, तो इंसान कम सावधानी बरतता है। यही समस्या कंपनी के अंदर प्रिंसिपल-एजेंट समस्या के रूप में दिखती है, जहाँ मालिक (प्रिंसिपल) देख नहीं सकता कि प्रबंधक या कर्मचारी (एजेंट) असल में क्या करता है, और वित्त में भी, जहाँ ऋणदाता को उधार लेने वाले का जोखिम नहीं दिखता। उपाय हैं: ज़्यादा जानकारी (जाँच, रिपोर्ट, रेटिंग), संकेत (वारंटी, प्रमाणपत्र, साख), छँटाई, गिरवी (collateral), जोखिम बाँटने वाले अनुबंध (एक्सेस या कटौती), प्रोत्साहन वाला वेतन और निगरानी।
- ब्याज दर: बचत, उधार और निवेश – ब्याज दर पैसा उधार लेने की कीमत है, जो हर साल के प्रतिशत में लिखी जाती है। बचत करने वाले को इंतज़ार और जोखिम का इनाम मिलता है, उधार लेने वाला इसे चुकाता है। दर केंद्रीय बैंक की आधार दर, जोखिम, समय और गिरवी पर निर्भर करती है। ऊँची दर बचत बढ़ाती है और उधार, खर्च व निवेश घटाती है।
3. Welfare and growth
Circular flow, national income and welfare · Economic growth · Inequality and redistribution · Labour market and unemployment
- आय का चक्रीय प्रवाह और राष्ट्रीय आय मापने की तीन विधियाँ – दो-क्षेत्रक अर्थव्यवस्था में परिवार फर्मों को साधन सेवाएँ देते हैं और साधन भुगतान (किराया, मज़दूरी, ब्याज, लाभ) पाते हैं; यह आय वे फर्मों की वस्तुओं पर खर्च करते हैं। पैसा वस्तुओं के वास्तविक प्रवाह की उलटी दिशा में घूमता है। क्योंकि वही पैसा तीन जगहों से गुज़रता है, राष्ट्रीय आय तीन तरह से मापी जा सकती है: उत्पादकों का मूल्य वर्धन (उत्पाद विधि), साधनों को दी गई आय (आय विधि), और अंतिम वस्तुओं पर खर्च (व्यय विधि)। तीनों का जोड़ बराबर आता है।
- आर्थिक संवृद्धि: देश हर साल ज़्यादा कैसे बनाता है – आर्थिक संवृद्धि यानी देश के वास्तविक GDP में बढ़त: एक साल में बनी सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य, कीमत-वृद्धि का असर हटाकर। संवृद्धि दर वास्तविक GDP का प्रतिशत बदलाव है। प्रति व्यक्ति GDP बताता है कि औसतन हर व्यक्ति के हिस्से कितना उत्पादन आया। व्यापार चक्र में संवृद्धि प्रवृत्ति के ऊपर-नीचे होती है, जिससे उत्पादन अंतर बनता है। संवृद्धि ज़्यादा और बेहतर साधनों (मज़दूर, कौशल, मशीनें, तकनीक) से आती है; इससे आय और नौकरियाँ बढ़ती हैं, पर प्रदूषण, असमानता और महँगाई भी आ सकती है।
- आय असमानता – आय असमानता का मतलब है कि लोगों के बीच आय बराबर नहीं बँटी है। अर्थशास्त्री लोगों को सबसे ग़रीब से सबसे अमीर तक क्रम में रखकर 20-20% के पाँच समूहों (पंचमक, quintiles) में बाँटते हैं और उनके हिस्से की तुलना करते हैं। लॉरेंज़ वक्र लोगों के संचयी % के सामने आय का संचयी % दिखाता है; यह समानता की सीधी रेखा से जितना ज़्यादा झुके, असमानता उतनी ज़्यादा। गिनी गुणांक = A ÷ (A + B) इसे 0 (पूरी समानता) से 1 (सारी आय एक व्यक्ति के पास) के बीच एक संख्या बना देता है। संपत्ति (जो तुम्हारे पास है) आमतौर पर आय (जो तुम कमाते हो) से ज़्यादा असमान होती है। सरकार प्रगतिशील कर, सहायता, न्यूनतम मज़दूरी और मुफ़्त शिक्षा-स्वास्थ्य से असमानता घटाती है।
- बेरोज़गारी: अर्थ, दर, प्रकार, नुकसान और उपाय – कोई व्यक्ति बेरोज़गार तब है जब उसके पास नौकरी नहीं, वह काम कर सकता है, और सक्रिय रूप से काम ढूँढ रहा है। श्रम बल यानी सभी रोज़गार वाले और सभी बेरोज़गार। बेरोज़गारी दर = बेरोज़गार ÷ श्रम बल × 100। अर्थशास्त्री कारण के हिसाब से इसे बाँटते हैं: घर्षणात्मक (नौकरियों के बीच), संरचनात्मक (कौशल या जगह नौकरियों से मेल नहीं खाती), चक्रीय (कुल माँग में मंदी) और मौसमी (कुछ ही महीने काम)। बेरोज़गारी से व्यक्ति की आय जाती है, देश का उत्पादन और कर घटता है, और सेहत व समाज को नुकसान होता है। चक्रीय के लिए सरकार ख़र्च और ब्याज दर का सहारा लेती है; बाक़ी के लिए प्रशिक्षण, जानकारी और आवागमन। कुछ बेरोज़गारी हमेशा रहती है; सबसे कम टिकाऊ स्तर को प्राकृतिक दर कहते हैं।
4. Good times, bad times
Business cycle · Government, central bank and the cycle
- व्यापार चक्र: तेज़ी, मंदी और नीति की भूमिका – वास्तविक GDP लंबे समय में एक रुझान पर बढ़ता है, पर थोड़े समय में उसके ऊपर-नीचे झूलता है। यही व्यापार चक्र है: विस्तार, शिखर (तेज़ी), संकुचन और गर्त (मंदी)। तेज़ी में बेरोज़गारी कम और महँगाई ज़्यादा; मंदी में नौकरियाँ जाती हैं और महँगाई घटती है। सरकार राजकोषीय नीति से और केंद्रीय बैंक मौद्रिक नीति से इन झूलों को छोटा करते हैं।
- मौद्रिक नीति (Monetary Policy) – मौद्रिक नीति वह है जिसमें केंद्रीय बैंक ब्याज दरों और मुद्रा आपूर्ति से कीमतें स्थिर रखता है और वृद्धि व रोज़गार को सहारा देता है। नीतिगत दर बढ़ाने से उधार महँगा, खर्च और समग्र माँग कम, और महँगाई कम होती है (संकुचनकारी)। दर घटाने से उलटा होता है (विस्तारकारी)। दूसरे औज़ार: खुले बाज़ार की क्रियाएँ, मात्रात्मक सहजता (QE), आरक्षित अनुपात और भावी मार्गदर्शन। ज़्यादातर केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति लक्ष्य रखते हैं और सरकार से स्वतंत्र होते हैं। इसका असर देर से आता है और दरें शून्य के पास हों तो कमज़ोर पड़ता है।