स्वास्थ्य और बीमारी का सामाजिक निर्माण
जैव-चिकित्सीय मॉडल कहता है कि बीमारी शरीर की ख़राबी है। डॉक्टर विज्ञान से उसे ढूँढकर ठीक करते हैं। स्वास्थ्य यानी रोग का न होना।
समाजशास्त्री एक सामाजिक मॉडल जोड़ते हैं। उनके अनुसार स्वास्थ्य और बीमारी के विचार सामाजिक रूप से निर्मित हैं: इन्हें समाज गढ़ता है।
- संस्कृतियों में: कुछ समूह आवाज़ें सुनने को आध्यात्मिक वरदान मानते हैं; दूसरे बीमारी।
- समय के साथ: सोच बदलने पर कई स्थितियाँ बीमारियों की सरकारी सूची में जुड़ीं या हटीं।
- समूहों में: बुज़ुर्ग दर्द को "सामान्य" मान सकते हैं; युवा डॉक्टर के पास जा सकते हैं।
रोग, बीमारी और रुग्णता
- रोग (disease): जो डॉक्टर निदान करे।
- बीमारी (illness): व्यक्ति कैसा महसूस करता है।
- रुग्णता (sickness): दूसरों द्वारा दी गई सामाजिक भूमिका।
बीमार की भूमिका
टैल्कट पार्सन्स (प्रकार्यवादी) ने कहा कि बीमार होना एक सामाजिक भूमिका है। बीमार व्यक्ति को काम या स्कूल से छूट मिलती है और उसे दोषी नहीं माना जाता, पर उसे ठीक होना चाहना और डॉक्टरी मदद लेनी होती है। डॉक्टर इस भूमिका के द्वारपाल हैं (जैसे मेडिकल सर्टिफ़िकेट देना)।
चिकित्साकरण
चिकित्साकरण (medicalisation) यानी जीवन की सामान्य घटनाओं (उदासी, प्रसव, बुढ़ापा, शर्मीलापन) को इलाज वाली चिकित्सा समस्या बना देना।
असमान स्वास्थ्य अवसर
स्वास्थ्य बराबर नहीं बँटा। कई देशों में मिले पैटर्न:
- सामाजिक वर्ग / आय: ग़रीब समूह जल्दी मरते हैं और ज़्यादा साल बीमारी में बिताते हैं। हर सीढ़ी ऊपर स्वास्थ्य बेहतर, यानी सामाजिक ढलान।
- लिंग: स्त्रियाँ प्रायः ज़्यादा जीती हैं पर ज़्यादा बीमारी बताती हैं; पुरुष ज़्यादा जोखिम लेते और कम डॉक्टर के पास जाते हैं।
- नृजातीयता: कुछ अल्पसंख्यक समूहों में कुछ बीमारियाँ ज़्यादा, जो ग़रीबी, भेदभाव और पहुँच से जुड़ी हैं।
- क्षेत्र: ग्रामीण और ग़रीब इलाक़ों के नतीजे प्रायः बदतर।
चार स्पष्टीकरण
- कृत्रिम आँकड़ा (artefact): अंतर कुछ हद तक वर्ग और स्वास्थ्य को मापने के तरीके से बनता है। आलोचना: किसी भी माप से अंतर बना रहता है।
- सामाजिक चयन: ख़राब स्वास्थ्य लोगों को वर्ग-सीढ़ी से नीचे धकेलता है (काम छूटता है), यानी बीमारी से निम्न वर्ग।
- सांस्कृतिक / व्यवहारवादी: समूहों की जीवनशैली (धूम्रपान, आहार, व्यायाम, जाँच करवाना) अलग है। आलोचना: यह पीड़ित को दोष देता है।
- भौतिक / संरचनात्मक: कम आय से सीलन भरे घर, जोखिम भरे काम, प्रदूषण, ख़राब भोजन और तनाव। मार्क्सवादी कहते हैं पूँजीवाद स्वास्थ्य से ऊपर मुनाफ़ा रखता है।
ज़्यादातर समाजशास्त्री मानते हैं कि सबसे बड़ा हिस्सा भौतिक कारणों का है; संस्कृति और चयन छोटे हिस्से जोड़ते हैं।
स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच
उल्टा देखभाल नियम (inverse care law) (जूलियन ट्यूडर हार्ट, 1971) कहता है: अच्छी चिकित्सा की उपलब्धता ज़रूरत के उल्टे अनुपात में होती है। जिन्हें सबसे ज़्यादा चाहिए, उन्हें सबसे कम मिलती है।
पहुँच की बाधाएँ
- ख़र्च: फ़ीस, दवाएँ, किराया, कटी मज़दूरी।
- दूरी और उपलब्धता: ग़रीब या ग्रामीण इलाक़ों में कम डॉक्टर और अस्पताल।
- समय: असुरक्षित नौकरी वाले छुट्टी नहीं ले पाते।
- सांस्कृतिक पूँजी: मध्यम वर्ग के मरीज़ आत्मविश्वास से बोलते और ज़्यादा सवाल पूछते हैं, इसलिए उन्हें लंबा परामर्श मिल सकता है।
- भाषा, लिंग संबंधी मान्यताएँ और कलंक।
देश अलग ढंग से सेवा चलाते हैं: करों से चलने वाली मुफ़्त सरकारी व्यवस्था, बीमा-आधारित व्यवस्था, और फ़ीस वाली निजी सेवा। भारत में सरकारी अस्पताल और स्वास्थ्य बीमा योजनाएँ बड़े निजी क्षेत्र के साथ हैं; कई परिवार अब भी अपनी जेब से ख़र्च करते हैं।
मानसिक बीमारी
अंतःक्रियावादी (सामाजिक निर्माणवादी) मत
- मानसिक बीमारी कुछ हद तक सामाजिक नियम तोड़ने वाले व्यवहार पर लगाया गया ठप्पा (लेबल) है।
- ठप्पा लगने पर कलंक झेलना पड़ता है: लोग दूरी बनाते हैं, नौकरी जा सकती है, ख़तरनाक समझा जाता है।
- ठप्पा मुख्य पहचान (master status) और स्वतः पूर्ण भविष्यवाणी बन सकता है।
- अर्विंग गॉफ़मैन ने "संपूर्ण संस्थाओं" (पुराने मानसिक अस्पताल) का अध्ययन किया और पाया कि वहाँ मरीज़ अपनी पहचान खो देते थे।
- ठप्पे मरीज़ और डॉक्टर के वर्ग, लिंग और नृजातीयता से प्रभावित हो सकते हैं।
संरचनावादी (यथार्थवादी) मत
- मानसिक बीमारी वास्तविक है और असली पीड़ा देती है।
- इसके सामाजिक कारण हैं: ग़रीबी, बेरोज़गारी, भेदभाव, अकेलापन, परिवार का टूटना।
- इसीलिए अलग समूहों में दरें अलग हैं।
लेबलिंग के आलोचक कहते हैं यह असली पीड़ा को अनदेखा करता है; संरचनावादी मत के आलोचक कहते हैं कि निदान ख़ुद पक्षपाती हो सकता है।
चिकित्सा और स्वास्थ्य उद्योग
- प्रकार्यवादी: चिकित्सा समाज को स्वस्थ और कार्यरत रखती है। डॉक्टर भरोसेमंद विशेषज्ञ हैं जो मरीज़ को पहले रखते हैं, और पेशे को कौशल का इनाम मिलता है।
- मार्क्सवादी: स्वास्थ्य सेवा मुनाफ़ा कमाने वाला उद्योग है (दवा कंपनियाँ, निजी अस्पताल, बीमा कंपनियाँ)। चिकित्सा व्यक्ति का इलाज करती है और बीमारी के सामाजिक कारण, जैसे ग़रीबी और ख़राब काम की स्थितियाँ, छिपाती है।
- नारीवादी: चिकित्सा पर लंबे समय तक पुरुषों का नियंत्रण रहा; इसने स्त्रियों के शरीर (प्रसव, रजोनिवृत्ति) का चिकित्साकरण किया और दाइयों जैसी पारंपरिक महिला उपचारकों को किनारे किया।
- इवान इलिच: ज़रूरत से ज़्यादा चिकित्सा नुकसान करती है, जिसे आयट्रोजेनेसिस कहते हैं: नैदानिक (दुष्प्रभाव, संक्रमण), सामाजिक (हर बात के लिए डॉक्टर पर निर्भरता) और सांस्कृतिक (दर्द और मृत्यु से जूझने की क्षमता खोना)।
- उत्तर-आधुनिकतावादी: लोग अब इंटरनेट और वैकल्पिक चिकित्सा समेत कई स्रोतों से चुनते हैं, इसलिए डॉक्टरों का अधिकार कमज़ोर हुआ।
घर पर करके देखें
घर के दो बड़ों से पूछिए कि बचपन में बुख़ार होने पर वे क्या करते थे। आज आपका परिवार क्या करता है, उससे तुलना कीजिए। क्या बदला: बीमारी, या समाज का उससे निपटने का तरीका?
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- जैव-चिकित्सीय मॉडल: बीमारी = शरीर की ख़राबी; इलाज = डॉक्टर + विज्ञान।
- सामाजिक मॉडल: स्वास्थ्य और बीमारी सामाजिक रूप से निर्मित हैं।
- रोग (निदान) · बीमारी (अनुभव) · रुग्णता (सामाजिक भूमिका)।
- बीमार की भूमिका (पार्सन्स): कर्तव्यों से छूट, दोष नहीं; ठीक होना चाहे और मदद ले।
- स्वास्थ्य असमानता के स्पष्टीकरण: कृत्रिम आँकड़ा, सामाजिक चयन, सांस्कृतिक/व्यवहारवादी, भौतिक/संरचनात्मक।
- उल्टा देखभाल नियम: जहाँ ज़रूरत सबसे ज़्यादा, वहाँ सेवा सबसे कम।
- ठप्पा → कलंक → मुख्य पहचान → स्वतः पूर्ण भविष्यवाणी।
- आयट्रोजेनेसिस (इलिच) = चिकित्सा से हुई हानि।
हल किए गए उदाहरण
1. दो कामगारों को एक जैसा सीने का संक्रमण हुआ। एक बैंक मैनेजर है, दूसरा दिहाड़ी पर निर्माण मज़दूर। समाजशास्त्र से बताइए कि उनके स्वास्थ्य के नतीजे अलग क्यों हो सकते हैं।
1) भौतिक: मैनेजर को सवेतन छुट्टी, दवा के पैसे और सूखा घर मिलता है; मज़दूर आराम करे तो दिन की मज़दूरी जाती है और वह सीलन भरे, भीड़ वाले घर में रह सकता है। 2) पहुँच: मैनेजर जल्दी निजी डॉक्टर से मिल सकता है; मज़दूर को लंबी कतार (उल्टा देखभाल नियम)। 3) बीमार की भूमिका: मज़दूर यह भूमिका 'ले' नहीं पाता क्योंकि काम रोकना उसके बस में नहीं। इसलिए एक ही रोग के बहुत अलग नतीजे हो सकते हैं।
2. एक सरकार कहती है कि स्वास्थ्य अंतर इसलिए है क्योंकि ग़रीब ज़्यादा धूम्रपान करते और ख़राब खाते हैं। यह कौन-सा स्पष्टीकरण है? एक आलोचना दीजिए।
यह सांस्कृतिक/व्यवहारवादी स्पष्टीकरण है। आलोचना (भौतिक मत): लोगों की पसंद पैसे, तनाव और रहने की जगह से सीमित होती है। सस्ता, पेट भरने वाला भोजन अक्सर कम पौष्टिक होता है, और धूम्रपान तनाव से निपटने का तरीका हो सकता है। व्यक्तियों को दोष देना इन संरचनात्मक कारणों को अनदेखा करता है।
3. समझाइए कि मानसिक बीमारी का निदान स्वतः पूर्ण भविष्यवाणी कैसे बन सकता है।
1) व्यक्ति पर 'मानसिक रोगी' का ठप्पा लगता है। 2) दूसरे उससे अलग व्यवहार करने लगते हैं, जैसे दूरी बनाना या काम पर भरोसा न करना। 3) ठप्पा उसकी मुख्य पहचान बन जाता है, बाकी भूमिकाओं से बड़ा। 4) वह ख़ुद को ठप्पे की नज़र से देखने लगता है और उसके अनुसार व्यवहार कर सकता है। 5) तब उसका व्यवहार ठप्पे को 'सही साबित' करता दिखता है।
आम गलतियाँ
- कहना कि समाजशास्त्री बीमारी को 'असली नहीं' मानते। वे कहते हैं कि बीमारी का अर्थ और उस पर प्रतिक्रिया सामाजिक है, यह नहीं कि शरीर कभी बीमार नहीं होता।
- सामाजिक चयन (बीमारी से निम्न वर्ग) और भौतिक स्पष्टीकरण (निम्न वर्ग से बीमारी) को उलझाना।
- सोचना कि उल्टा देखभाल नियम का मतलब ग़रीबों को कभी इलाज नहीं मिलता। मतलब है ज़रूरत की तुलना में कम मिलता है।
- कहना कि बीमार की भूमिका में कोई भी आराम से काम छोड़ सकता है। बीमार को ठीक होने की कोशिश और डॉक्टरी मदद लेनी होती है।